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श्रद्धापूर्वक मनाया गया सकट का त्योहार
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श्रद्धापूर्वक मनाया गया सकट का त्योहार
बिजनौर। जनपद में सकट चौथ यानी संकष्टी चतुर्थी का त्योहार श्रद्धापूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने उपवास रखकर भगवान गणेश और भगवान शिव की पूजा-अर्चना की। इसके बाद रात्रि में चंद्र दर्शन कर भोजन प्राप्त किया।
हर साल माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सकट चौथ (संकष्टी चतुर्थी) का त्योहार मनाया जाता है। इसे तिलकुटा चौथ, संकटा चौथ, माघी चतुर्थी आदि के नाम से भी जाना जाता है। इस अवसर पर सुबह सवेरे ही श्रद्धालुओं ने स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान गणेश और शिव जी की पूजा-अर्चना की। पूरे दिन व्रत करने के बाद शाम के समय तिल से बने सामान लड्डू, गुड़, रेवड़ी, तिलकुट आदि अग्नि में जिमाकर उनसे अपने बच्चों की दीर्घायु और समस्त परिवार की सुख-समृद्धि की कामना का आशीर्वाद लिया। रात्रि में चंद्र दर्शन करने के बाद श्रद्धालुओं ने व्रत खोले। इससे पूर्व महिलाओं ने घरों में पकवान, गुड़ का तिलकुट, तिल के लड्डू आदि बनाए। शाम के समय भोजन और तिलकुट देवता महाराज को अर्पण करने के बाद श्रद्धालुओं ने अपने व्रतों का पारायण किया। इस दौरान महिलाओं ने बायना निकालकर बुजुर्गों को भेंट करते हुए उनके चरण स्पर्श किए और उनसे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद लिया।
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बिजनौर। जनपद में सकट चौथ यानी संकष्टी चतुर्थी का त्योहार श्रद्धापूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने उपवास रखकर भगवान गणेश और भगवान शिव की पूजा-अर्चना की। इसके बाद रात्रि में चंद्र दर्शन कर भोजन प्राप्त किया।
हर साल माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सकट चौथ (संकष्टी चतुर्थी) का त्योहार मनाया जाता है। इसे तिलकुटा चौथ, संकटा चौथ, माघी चतुर्थी आदि के नाम से भी जाना जाता है। इस अवसर पर सुबह सवेरे ही श्रद्धालुओं ने स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान गणेश और शिव जी की पूजा-अर्चना की। पूरे दिन व्रत करने के बाद शाम के समय तिल से बने सामान लड्डू, गुड़, रेवड़ी, तिलकुट आदि अग्नि में जिमाकर उनसे अपने बच्चों की दीर्घायु और समस्त परिवार की सुख-समृद्धि की कामना का आशीर्वाद लिया। रात्रि में चंद्र दर्शन करने के बाद श्रद्धालुओं ने व्रत खोले। इससे पूर्व महिलाओं ने घरों में पकवान, गुड़ का तिलकुट, तिल के लड्डू आदि बनाए। शाम के समय भोजन और तिलकुट देवता महाराज को अर्पण करने के बाद श्रद्धालुओं ने अपने व्रतों का पारायण किया। इस दौरान महिलाओं ने बायना निकालकर बुजुर्गों को भेंट करते हुए उनके चरण स्पर्श किए और उनसे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद लिया।
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