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अमर उजाला एक्सक्लुसिव : फैक्टरी के जहरीले पानी से फसल सींचने की तैयारी
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बिजनौर के गांव चंदनपुरा में खेत मे पड़ा कारखाने का गंदा पानी।
- फोटो : BIJNOR
फैक्टरी के जहरीले पानी से फसल सींचने की तैयारी
बिजनौर। कृषि विभाग किसानों को जैविक खेती करने के लिए जागरूक कर रहा है और किसान उपज बढ़ाने के लिए खेतों में कारखानों का जहरीले पानी डलवा रहे हैं। इससे खेत और इंसानी सेहत दोनों से किसान खेल रहे हैं। किसान खेतों में आलू बोने से पहले ये पानी डलवा रहे हैं। इससे जमीन तो बंजर हो ही सकती है विषैली फसल खाने से अनेक गंभीर बीमारी भी हो सकती हैं। लेकिन कारखाने के कर्मचारियों की बातों में आकर किसान खेतों में गंदा पानी डलवा रहे हैं।
जिले में आलू की बुआई गंज क्षेत्र में प्रमुखता से होती है। किसान आलू की फसल बोकर मुनाफा कमाते हैं। इस साल तो आलू के दाम 40 रुपये प्रति किलोग्राम तक चल रहे हैं। दामों को देखकर किसानों को अगली फसल में भी मुनाफा ही नजर आ रहा है। किसान ज्यादा मुनाफा कमाने की आस में फसल उत्पादन बढ़ाने की कोशिश में लग गए हैं। गंज क्षेत्र की चंदनपुरा पंचायत के गांवों में आलू की फसल के लिए किसान खेत तैयार कर रहे हैं। किसान फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए कारखानों का गंदा पानी खेतों में डलवा रहे हैं। ठेकेदार किसानों को झांसा देकर कारखानों के गंदे पानी को उनके खेतों में ठिकाने लगा रहे हैं। किसानों को वे बता रहे हैं कि इससे कम लागत में उनके खेतों में ज्यादा पैदावार होगी। कुछ किसान तो बिना जांच के ही खेत में इतना पानी डलवा रहे हैं जैसे खेत में धान बोने की तैयारी की जा रही हो। किसान ऐसे में खुद का ही नुकसान कर रहे हैं। इससे खेतों की उर्वरा शक्ति धीरे धीरे कम होने लगती है। किसानों को लगता है कि ऊपर की परत में नमी है, लेकिन एक परत के बाद जमीन एकदम सूख जाती है।
गंदे पानी ने झुलसा दिए थे पेड़, पशुओं की हुई थी मौत
कुछ साल पहले कुछ किसानों के खेतों के पास कारखानों का पानी डाला गया था, जो खेतों में भी चला गया था। इससे वहां खड़ी फसलों के साथ साथ बड़े बड़े पेड़ तक झुलस गए थे। तब किसानों को जमीन का शोधन कराना पड़ा था। एक साल तक तो खेतों में फसल ही नहीं हुई थी। लेकिन तब हुए नुकसान की ओर किसान अब आंख मूंदकर बैठे हुए हैं। केमिकलयुक्त पानी के प्रयोग से तैयार की गई बाजरा चारे की फसल केे खाने से अब तक दर्जनों पशुओं की मौत हो चुकी है। गांव फतेहपुर कलां, छाछरीटीप व पुटठा गांव के पशुपालकों ने केमिकलयुक्त पानी डलवाने वाले किसानों से बाजरा चारा खरीदा था। जिसके खाने के सप्ताह भर में ही दर्जनों पशुओं की मौत हो गई थी।
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अपशिष्ट पानी में रहती है विषाक्त धातु
उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद परियोजना में शोध कर रहे मयंक मलिक के अनुसार डिस्टलरी के अपशिष्ट जल में कार्बनिक और अकार्बनिक प्रदूषक जैसे मेलेनोइडिन, डी-एन-ऑक्टाइल फेथलेट, डि-ब्यूटाइल फेथलेट, बेंजेनप्रोपानोइक एसिड आदि विषाक्त धातुओं का मिश्रण होता है। ये जीनोटॉक्सिक, कार्सिनोजेनिक, म्यूटोजेनिक के रूप में रिपोर्ट किए जाते हैं। बिना ट्रीटमेंट के सीधे खेतों में कारखानों का वेस्ट वाटर डालना प्रकृति और मानव दोनों के लिए ही खतरा है। यह मिट्टी की क्षारीयता को भी प्रभावित करता है और जीवों को भी नुकसान पहुंचाता है।
हो सकती है कैंसर जैसी घातक बीमारी
मयंक मलिक का कहना है कि पानी के हानिकारक तत्व यदि फसल में जाते हैं तो इस फसल के खाने से महिलाओं के गर्भ में पल रहे बच्चे के मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ता है। इससे त्वचा रोग व पेट संबंधी बीमारी होने का खतरा रहता है। लंबे समय से ऐसी फसल के प्रयोग से कैंसर भी हो सकता है। उनका कहना है कि किसान इस तरह की फसल उगाकर अपने खेतों की उर्वरा शक्ति को बर्बाद कर रहे हैं। साथ ही लोगों की सेहत के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं।
पानी की होगी जांच : जिला कृषि अधिकारी
कृषि वैज्ञानिक डॉ. केके सिंह का कहना है कि खेतों में डाले जा रहे पानी की जांच होनी चाहिए। अगर पानी में केमिकल हैं तो ये खेत को नुकसान देंगे। केमिकल के रसायन फसलों में भी जाएंगे। यह स्थिति बहुत खतरनाक होगी। आत्मा परियोजना प्रभारी योगेंद्रपाल योगी का कहना है कि केमिकल युक्त होने पर अपशिष्ट पानी फसल और मिट्टी दोनों को नुकसान पहुंचाता है। पानी की जांच होनी चाहिए। जिला कृषि अधिकारी के अनुसार खेतों में डाले जा रहे पानी के बारे में पता नहीं है। वे मामले को दिखवाएंगे। पानी की जांच कराई जाएगी।
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बिजनौर। कृषि विभाग किसानों को जैविक खेती करने के लिए जागरूक कर रहा है और किसान उपज बढ़ाने के लिए खेतों में कारखानों का जहरीले पानी डलवा रहे हैं। इससे खेत और इंसानी सेहत दोनों से किसान खेल रहे हैं। किसान खेतों में आलू बोने से पहले ये पानी डलवा रहे हैं। इससे जमीन तो बंजर हो ही सकती है विषैली फसल खाने से अनेक गंभीर बीमारी भी हो सकती हैं। लेकिन कारखाने के कर्मचारियों की बातों में आकर किसान खेतों में गंदा पानी डलवा रहे हैं।
जिले में आलू की बुआई गंज क्षेत्र में प्रमुखता से होती है। किसान आलू की फसल बोकर मुनाफा कमाते हैं। इस साल तो आलू के दाम 40 रुपये प्रति किलोग्राम तक चल रहे हैं। दामों को देखकर किसानों को अगली फसल में भी मुनाफा ही नजर आ रहा है। किसान ज्यादा मुनाफा कमाने की आस में फसल उत्पादन बढ़ाने की कोशिश में लग गए हैं। गंज क्षेत्र की चंदनपुरा पंचायत के गांवों में आलू की फसल के लिए किसान खेत तैयार कर रहे हैं। किसान फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए कारखानों का गंदा पानी खेतों में डलवा रहे हैं। ठेकेदार किसानों को झांसा देकर कारखानों के गंदे पानी को उनके खेतों में ठिकाने लगा रहे हैं। किसानों को वे बता रहे हैं कि इससे कम लागत में उनके खेतों में ज्यादा पैदावार होगी। कुछ किसान तो बिना जांच के ही खेत में इतना पानी डलवा रहे हैं जैसे खेत में धान बोने की तैयारी की जा रही हो। किसान ऐसे में खुद का ही नुकसान कर रहे हैं। इससे खेतों की उर्वरा शक्ति धीरे धीरे कम होने लगती है। किसानों को लगता है कि ऊपर की परत में नमी है, लेकिन एक परत के बाद जमीन एकदम सूख जाती है।
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गंदे पानी ने झुलसा दिए थे पेड़, पशुओं की हुई थी मौत
कुछ साल पहले कुछ किसानों के खेतों के पास कारखानों का पानी डाला गया था, जो खेतों में भी चला गया था। इससे वहां खड़ी फसलों के साथ साथ बड़े बड़े पेड़ तक झुलस गए थे। तब किसानों को जमीन का शोधन कराना पड़ा था। एक साल तक तो खेतों में फसल ही नहीं हुई थी। लेकिन तब हुए नुकसान की ओर किसान अब आंख मूंदकर बैठे हुए हैं। केमिकलयुक्त पानी के प्रयोग से तैयार की गई बाजरा चारे की फसल केे खाने से अब तक दर्जनों पशुओं की मौत हो चुकी है। गांव फतेहपुर कलां, छाछरीटीप व पुटठा गांव के पशुपालकों ने केमिकलयुक्त पानी डलवाने वाले किसानों से बाजरा चारा खरीदा था। जिसके खाने के सप्ताह भर में ही दर्जनों पशुओं की मौत हो गई थी।
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अपशिष्ट पानी में रहती है विषाक्त धातु
उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद परियोजना में शोध कर रहे मयंक मलिक के अनुसार डिस्टलरी के अपशिष्ट जल में कार्बनिक और अकार्बनिक प्रदूषक जैसे मेलेनोइडिन, डी-एन-ऑक्टाइल फेथलेट, डि-ब्यूटाइल फेथलेट, बेंजेनप्रोपानोइक एसिड आदि विषाक्त धातुओं का मिश्रण होता है। ये जीनोटॉक्सिक, कार्सिनोजेनिक, म्यूटोजेनिक के रूप में रिपोर्ट किए जाते हैं। बिना ट्रीटमेंट के सीधे खेतों में कारखानों का वेस्ट वाटर डालना प्रकृति और मानव दोनों के लिए ही खतरा है। यह मिट्टी की क्षारीयता को भी प्रभावित करता है और जीवों को भी नुकसान पहुंचाता है।
हो सकती है कैंसर जैसी घातक बीमारी
मयंक मलिक का कहना है कि पानी के हानिकारक तत्व यदि फसल में जाते हैं तो इस फसल के खाने से महिलाओं के गर्भ में पल रहे बच्चे के मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ता है। इससे त्वचा रोग व पेट संबंधी बीमारी होने का खतरा रहता है। लंबे समय से ऐसी फसल के प्रयोग से कैंसर भी हो सकता है। उनका कहना है कि किसान इस तरह की फसल उगाकर अपने खेतों की उर्वरा शक्ति को बर्बाद कर रहे हैं। साथ ही लोगों की सेहत के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं।
पानी की होगी जांच : जिला कृषि अधिकारी
कृषि वैज्ञानिक डॉ. केके सिंह का कहना है कि खेतों में डाले जा रहे पानी की जांच होनी चाहिए। अगर पानी में केमिकल हैं तो ये खेत को नुकसान देंगे। केमिकल के रसायन फसलों में भी जाएंगे। यह स्थिति बहुत खतरनाक होगी। आत्मा परियोजना प्रभारी योगेंद्रपाल योगी का कहना है कि केमिकल युक्त होने पर अपशिष्ट पानी फसल और मिट्टी दोनों को नुकसान पहुंचाता है। पानी की जांच होनी चाहिए। जिला कृषि अधिकारी के अनुसार खेतों में डाले जा रहे पानी के बारे में पता नहीं है। वे मामले को दिखवाएंगे। पानी की जांच कराई जाएगी।