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Bijnor News: कालागढ़ - प्रशिक्षित वनकर्मी ही रोक सकेंगे गुलदार के हमले
Tue, 01 Aug 2023 12:12 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर
Updated Tue, 01 Aug 2023 12:12 AM IST
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नांगलसोती के गांव सैदपुरी के खेतों में दिखा गुलदार। (स्रोत- वीडियोग्रैब)
- सामाजिक वानिकी के कर्मियों को जिम कार्बेट पार्क की तर्ज पर करने होंगे उपाय
- विशेषज्ञ बोले - वन्यजीव के व्यवहार का प्रशिक्षण न होने के कारण ही बढ़ रहे मामले
अथहर महमूद सिद्दीकी
कालागढ़। जनपद बिजनौर में मानव वन्यजीव संघर्ष पर लगाम लगाने के लिए सामाजिक वानिकी के कर्मियों को जिम कार्बेट नेशनल पार्क की तर्ज पर उपाय करने होंगे। वन्यजीव के व्यवहार का प्रशिक्षण न होने के कारण मानव और वन्य जीव दोनों की ही सुरक्षा खतरे में है। विशेषज्ञों का कहना है कि सामाजिक वानिकी के कर्मियों को भी यदि विशेष प्रशिक्षण मिले तो जिले में गुलदार के हमलों पर अंकुश लगाया जा सकता है।
जनपद में गुलदार के हमले दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं। वन विभाग के अधिकारी गुलदार को नरभक्षी घोषित कर उसकी तलाश में जुटे हैं। दुधवा नेशनल पार्क से आए दो हाथी गश्त कर रहे हैं। कार्बेट नेशनल पार्क के झिरना से भी दो हाथी बिजनौर भेजे जा रहे हैं। बिजनौर जनपद का बड़ा क्षेत्र सामाजिक वानिकी से आच्छादित है। यहां वाइल्ड लाइफ की सुविधाओं का अभाव है। जिसके चलते वन कर्मी से लेकर अधिकारी तक उपलब्ध संसाधनों से ही काम चला रहे हैं। जबकि कार्बेट नेशनल पार्क में ई-सर्विलांस के जरिए पूरे इलाके पर निगाह रखी जाती है। टास्क फोर्स, आधुनिक तकनीक, वन्यजीवों के व्यवहार का अध्ययन कर उनके बीच जाने की सूझबूझ मौजूद है।
कालागढ़, हल्द्वानी, अल्मोड़ा आदि में प्रत्येक वनरक्षक को वन एवं वन्यजीव प्रबंधन का व्यावहारिक प्रशिक्षण गश्त करने से पहले दिया जाता है। विभागीय विद्वान अधिकारी/विषय विशेषज्ञ अपने अनुभवों से हर परिस्थिति से निपटने का इन्हें प्रशिक्षण देते हैं। बिजनौर जिले में विशेष प्रशिक्षण के अभाव में सामाजिक वानिकी के कर्मी इन खुंखार वन्यजीवों से निपटने का प्रयास कर रहे हैं। जिसकी वजह से आए दिन लोगों की जान जा रही हैं। वन्यजीव भी अपनी जान गवां चुके हैं। ऐसे में यह संघर्ष नियंत्रण से बाहर होता प्रतीत हो रहा है। (संवाद)
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बिजनौर को भी मिलें सुविधाएं
कार्बेट नेशनल पार्क के वार्डन अमित ग्वासाकोटि का कहना है कि जिस प्रकार से हमारे यहां वैटनरी यूनिट, उपकरण आदि मौजूद हैं, बिजनौर में भी होने चाहिए। उनके अभाव में वन्यजीव नियंत्रण कठिन है। अरण्या व भारतीय वन्यजीव संरक्षण सोसायटी के सचिव नरेंद्र सिंह का कहना है कि वन विभाग के अधिकारियों व कर्मियों में कौशल विकास व कार्यक्षमता विकसित करने के लिए समय-समय व्यावहारिक प्रशिक्षण आवश्यक है। बिजनौर में ऐसे प्रशिक्षण की आवश्यकता हो सकती है। वन्यजीवों के व्यवहार का अध्ययन इसमें बहुत ही मददगार साबित हो सकता है।
शासन को भेजा है सुविधा देने का प्रस्ताव
बिजनौर के डीएफओ अरुण कुमार सिंह का कहना है बिजनौर को वाइल्डलाइफ डिविजन की सुविधा देने का प्रस्ताव भेजा जा चुका है। जो शासन में विचाराधीन है। बिजनौर में सामाजिक वानिकी का इलाका है। यहां गन्ने की फसल अधिक होने से गुलदार जैसे जीव उनमें अपना आसरा ढूंढ़ लेते हैं। यहां यह समस्या बड़ी है, उपलब्ध संसाधनों से समस्या का समाधान करने का प्रयास किया जा रहा है।
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- विशेषज्ञ बोले - वन्यजीव के व्यवहार का प्रशिक्षण न होने के कारण ही बढ़ रहे मामले
अथहर महमूद सिद्दीकी
कालागढ़। जनपद बिजनौर में मानव वन्यजीव संघर्ष पर लगाम लगाने के लिए सामाजिक वानिकी के कर्मियों को जिम कार्बेट नेशनल पार्क की तर्ज पर उपाय करने होंगे। वन्यजीव के व्यवहार का प्रशिक्षण न होने के कारण मानव और वन्य जीव दोनों की ही सुरक्षा खतरे में है। विशेषज्ञों का कहना है कि सामाजिक वानिकी के कर्मियों को भी यदि विशेष प्रशिक्षण मिले तो जिले में गुलदार के हमलों पर अंकुश लगाया जा सकता है।
जनपद में गुलदार के हमले दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं। वन विभाग के अधिकारी गुलदार को नरभक्षी घोषित कर उसकी तलाश में जुटे हैं। दुधवा नेशनल पार्क से आए दो हाथी गश्त कर रहे हैं। कार्बेट नेशनल पार्क के झिरना से भी दो हाथी बिजनौर भेजे जा रहे हैं। बिजनौर जनपद का बड़ा क्षेत्र सामाजिक वानिकी से आच्छादित है। यहां वाइल्ड लाइफ की सुविधाओं का अभाव है। जिसके चलते वन कर्मी से लेकर अधिकारी तक उपलब्ध संसाधनों से ही काम चला रहे हैं। जबकि कार्बेट नेशनल पार्क में ई-सर्विलांस के जरिए पूरे इलाके पर निगाह रखी जाती है। टास्क फोर्स, आधुनिक तकनीक, वन्यजीवों के व्यवहार का अध्ययन कर उनके बीच जाने की सूझबूझ मौजूद है।
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कालागढ़, हल्द्वानी, अल्मोड़ा आदि में प्रत्येक वनरक्षक को वन एवं वन्यजीव प्रबंधन का व्यावहारिक प्रशिक्षण गश्त करने से पहले दिया जाता है। विभागीय विद्वान अधिकारी/विषय विशेषज्ञ अपने अनुभवों से हर परिस्थिति से निपटने का इन्हें प्रशिक्षण देते हैं। बिजनौर जिले में विशेष प्रशिक्षण के अभाव में सामाजिक वानिकी के कर्मी इन खुंखार वन्यजीवों से निपटने का प्रयास कर रहे हैं। जिसकी वजह से आए दिन लोगों की जान जा रही हैं। वन्यजीव भी अपनी जान गवां चुके हैं। ऐसे में यह संघर्ष नियंत्रण से बाहर होता प्रतीत हो रहा है। (संवाद)
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बिजनौर को भी मिलें सुविधाएं
कार्बेट नेशनल पार्क के वार्डन अमित ग्वासाकोटि का कहना है कि जिस प्रकार से हमारे यहां वैटनरी यूनिट, उपकरण आदि मौजूद हैं, बिजनौर में भी होने चाहिए। उनके अभाव में वन्यजीव नियंत्रण कठिन है। अरण्या व भारतीय वन्यजीव संरक्षण सोसायटी के सचिव नरेंद्र सिंह का कहना है कि वन विभाग के अधिकारियों व कर्मियों में कौशल विकास व कार्यक्षमता विकसित करने के लिए समय-समय व्यावहारिक प्रशिक्षण आवश्यक है। बिजनौर में ऐसे प्रशिक्षण की आवश्यकता हो सकती है। वन्यजीवों के व्यवहार का अध्ययन इसमें बहुत ही मददगार साबित हो सकता है।
शासन को भेजा है सुविधा देने का प्रस्ताव
बिजनौर के डीएफओ अरुण कुमार सिंह का कहना है बिजनौर को वाइल्डलाइफ डिविजन की सुविधा देने का प्रस्ताव भेजा जा चुका है। जो शासन में विचाराधीन है। बिजनौर में सामाजिक वानिकी का इलाका है। यहां गन्ने की फसल अधिक होने से गुलदार जैसे जीव उनमें अपना आसरा ढूंढ़ लेते हैं। यहां यह समस्या बड़ी है, उपलब्ध संसाधनों से समस्या का समाधान करने का प्रयास किया जा रहा है।