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नोटंबदी ने तोड़ी मूढ़ा उद्योग की कमर
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 30 Nov 2016 12:08 AM IST
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दयालपुर में तैयार मूढे देखते व्यापारी।
- फोटो : अमर उजाला
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बिजनौर में नोटबंदी से सूबे के सबसे बड़े दयालवाला के मूढ़े उद्योग की कमर टूट गई है। इस कारोबार से जुड़े करीब सैकड़ों परिवार के सामने रोजी-रोटी के लाले पड़ गए हैं। नोटबंदी के बाद से किसी भी प्रदेश से मूढ़ों को भेजने के लिए आर्डर नहीं मिला। परिवार के लोग इस इंतजार में है कि कब नोटबंदी के बाद व्यवसाय के बिगड़े हालत बदले आैर उन्हें राहत मिले।
जिले के मंडावर क्षेत्र के गांव दयालवाला में सूबे का सबसे बड़ा मूढ़ा उद्योग संचालित है।
इस गांव के घर-घर में मूढ़े बनते है। गांव के एक सौ से ज्यादा परिवार में मूढ़े बनाने का काम होता है। मूढ़ा कारोबार ही इन परिवारों के कमाई का साधन हैं। इसकी बदौलत ही इन परिवारों की आजीविका चलती है। मूढ़े के कारोबार से दयालवाला समेत जिले के करीब दो हजार लोग जुड़े हुए हैं। मूढ़े बनाने वालों के साथ कुछ लोग उन्हें बेचने का काम करते हैं। दयालवाला से जिले के अलावा दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश समेत कई प्रदेशों को मूढ़े बेचने के लिए जाते हैं।
जिले में भी मूढ़ों की बड़ी खपत होती है। नोटबंदी के बाद से कोई मूढ़ों को कोई नहीं खरीद रहा। मूढ़े बनाने वालों के घरों में बड़ी तादाद में तैयार मूढ़े भरे है। हालांकि कोई खरीदार नहीं। नोटबंदी ने मूढ़ा उद्योग की पूरी तरह कमर तोड़ दी है। मूढ़े के कारोबार से जुड़े लोगों को कमाई की चिंता सताने लगी है।
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कारोबार से जुड़े लोगों को डर हैं कि अगर ये ही हालत रहे तो उनके सामने रोजी रोटी के लाले पड़ जाएंगे। मूढ़ा कारोबार से जुड़े दयालवाला के 85 साल के गंगाराम के मुताबिक मूढ़े का एक जोड़ा 500 रुपये में बेचा जाता है। नोटबंदी के बाद कोई 300 रुपये में जोड़ा खरीदने को भी तैयार नहीं है।
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जिले के मंडावर क्षेत्र के गांव दयालवाला में सूबे का सबसे बड़ा मूढ़ा उद्योग संचालित है।
इस गांव के घर-घर में मूढ़े बनते है। गांव के एक सौ से ज्यादा परिवार में मूढ़े बनाने का काम होता है। मूढ़ा कारोबार ही इन परिवारों के कमाई का साधन हैं। इसकी बदौलत ही इन परिवारों की आजीविका चलती है। मूढ़े के कारोबार से दयालवाला समेत जिले के करीब दो हजार लोग जुड़े हुए हैं। मूढ़े बनाने वालों के साथ कुछ लोग उन्हें बेचने का काम करते हैं। दयालवाला से जिले के अलावा दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश समेत कई प्रदेशों को मूढ़े बेचने के लिए जाते हैं।
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जिले में भी मूढ़ों की बड़ी खपत होती है। नोटबंदी के बाद से कोई मूढ़ों को कोई नहीं खरीद रहा। मूढ़े बनाने वालों के घरों में बड़ी तादाद में तैयार मूढ़े भरे है। हालांकि कोई खरीदार नहीं। नोटबंदी ने मूढ़ा उद्योग की पूरी तरह कमर तोड़ दी है। मूढ़े के कारोबार से जुड़े लोगों को कमाई की चिंता सताने लगी है।
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कारोबार से जुड़े लोगों को डर हैं कि अगर ये ही हालत रहे तो उनके सामने रोजी रोटी के लाले पड़ जाएंगे। मूढ़ा कारोबार से जुड़े दयालवाला के 85 साल के गंगाराम के मुताबिक मूढ़े का एक जोड़ा 500 रुपये में बेचा जाता है। नोटबंदी के बाद कोई 300 रुपये में जोड़ा खरीदने को भी तैयार नहीं है।