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किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पडे़ थे मंगू सिंह
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किरतपुर के ग्राम गाजीपुर के मंगू सिंह फाइल फोटो।
- फोटो : BIJNOR
किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पडे़ थे मंगू सिंह
बिजनौर। यूं तो जिले का स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा लंबा-चौड़ा इतिहास है, लेकिन आज बात उस स्वतंत्रता सेनानी की हो रही है, जो किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलनों में कूद पडे़। थाना क्षेत्र किरतपुर के गांव गाजीपुर निवासी मंगू सिंह ने किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया था। इन आंदोलन के कारण उन्हें दो बार जेल जाना पड़ा, लेकिन देश की आजादी के बाद उन्होंने कभी भी कोई सरकारी पेंशन या मदद नहीं ली।
थाना क्षेत्र किरतपुर के गांव गाजीपुर निवासी मंगू सिंह का जन्म सन् 1903 को हुआ था। मंगू सिंह के पिता डूंगर सिंह क्षेत्र के प्रतिष्ठित किसान थे। मंगू सिंह बचपन से ही क्रांतिकारियों के कार्यों से खुश रहते थे। वह भी देश की आजादी की लड़ाई लड़ना चाहते थे। गांधी जी के विचारों से वह बेहद प्रेरित थे। 1930 में दांडी यात्रा के दौरान उन्होंने नगीना में नमक बनाकर सत्याग्रह किया और नमक कानून तोड़ा। इसके अतिरिक्त वह क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन की धुरी बन गए थे। उनके संपर्क में सैकड़ों क्रांतिकारी थे। जब भी किसी क्रांतिकारी पर अंग्रेजी शासन का दबाव पड़ता, तब मंगू सिंह उन्हें अपने यहां रोकते थे।
उनके पौत्र ओमपाल सिंह बताते हैं कि उनके दादाजी बचपन से उन्हें गांधी जी तथा सुभाष चंद्र बोस की कहानियां सुनाया करते थे। मंगू सिंह की इच्छा आजाद हिंद फौज में शामिल होने की थी, लेकिन फौज में जाने से उन्हें उनके पिता ने रोक दिया था। क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण मंगू सिंह अंग्रेजी सरकार की आंख की किरकिरी बन गए थे। अंग्रेजी सरकार मंगू सिंह की गिरफ्तारी के लिए लगातार दबिश देती रही और एक दिन मंगू सिंह अंग्रेजी हुकूमत के हत्थे चढ़ गए। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 27 मार्च 1941 को न्यायालय ने उन्हें धारा 34/35 के अंतर्गत 6 माह का कारावास तथा 250 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई। छ: माह बाद जब मंगू सिंह जेल से छूट कर आए तब वह फिर से देश की सेवा में लग गए। देश की आजादी तक वह अंग्रेजों से लड़ते रहे।
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पेंशन लेने से कर दिया था इनकार
देश की आजादी के बाद सरकार की ओर से मंगू सिंह को पेंशन प्रदान की गई। उन्होंने सरकार से पेंशन नहीं ली तथा लिखित में पेंशन लेने से मना कर दिया। उनका मानना था कि उन्हें पेंशन की कोई आवश्यकता नहीं है। उनकी पेंशन का धन देश के विकास में काम आए ऐसी उनकी इच्छा थी। सन 1972 में उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने मंगू सिंह को ताम्रपत्र भेंट कर सम्मानित किया था। 1993 में मंगू सिंह का निधन हो गया।
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बिजनौर। यूं तो जिले का स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा लंबा-चौड़ा इतिहास है, लेकिन आज बात उस स्वतंत्रता सेनानी की हो रही है, जो किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलनों में कूद पडे़। थाना क्षेत्र किरतपुर के गांव गाजीपुर निवासी मंगू सिंह ने किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया था। इन आंदोलन के कारण उन्हें दो बार जेल जाना पड़ा, लेकिन देश की आजादी के बाद उन्होंने कभी भी कोई सरकारी पेंशन या मदद नहीं ली।
थाना क्षेत्र किरतपुर के गांव गाजीपुर निवासी मंगू सिंह का जन्म सन् 1903 को हुआ था। मंगू सिंह के पिता डूंगर सिंह क्षेत्र के प्रतिष्ठित किसान थे। मंगू सिंह बचपन से ही क्रांतिकारियों के कार्यों से खुश रहते थे। वह भी देश की आजादी की लड़ाई लड़ना चाहते थे। गांधी जी के विचारों से वह बेहद प्रेरित थे। 1930 में दांडी यात्रा के दौरान उन्होंने नगीना में नमक बनाकर सत्याग्रह किया और नमक कानून तोड़ा। इसके अतिरिक्त वह क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन की धुरी बन गए थे। उनके संपर्क में सैकड़ों क्रांतिकारी थे। जब भी किसी क्रांतिकारी पर अंग्रेजी शासन का दबाव पड़ता, तब मंगू सिंह उन्हें अपने यहां रोकते थे।
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उनके पौत्र ओमपाल सिंह बताते हैं कि उनके दादाजी बचपन से उन्हें गांधी जी तथा सुभाष चंद्र बोस की कहानियां सुनाया करते थे। मंगू सिंह की इच्छा आजाद हिंद फौज में शामिल होने की थी, लेकिन फौज में जाने से उन्हें उनके पिता ने रोक दिया था। क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण मंगू सिंह अंग्रेजी सरकार की आंख की किरकिरी बन गए थे। अंग्रेजी सरकार मंगू सिंह की गिरफ्तारी के लिए लगातार दबिश देती रही और एक दिन मंगू सिंह अंग्रेजी हुकूमत के हत्थे चढ़ गए। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 27 मार्च 1941 को न्यायालय ने उन्हें धारा 34/35 के अंतर्गत 6 माह का कारावास तथा 250 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई। छ: माह बाद जब मंगू सिंह जेल से छूट कर आए तब वह फिर से देश की सेवा में लग गए। देश की आजादी तक वह अंग्रेजों से लड़ते रहे।
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पेंशन लेने से कर दिया था इनकार
देश की आजादी के बाद सरकार की ओर से मंगू सिंह को पेंशन प्रदान की गई। उन्होंने सरकार से पेंशन नहीं ली तथा लिखित में पेंशन लेने से मना कर दिया। उनका मानना था कि उन्हें पेंशन की कोई आवश्यकता नहीं है। उनकी पेंशन का धन देश के विकास में काम आए ऐसी उनकी इच्छा थी। सन 1972 में उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने मंगू सिंह को ताम्रपत्र भेंट कर सम्मानित किया था। 1993 में मंगू सिंह का निधन हो गया।