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Bijnor News: दयालवाला की पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ा रहीं चौपालों की शान
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गांव में बने मूढ़ों की कई प्रदेशों और बड़े हाेटलों में है मांग
आशीष तोमर
मंडावर। मंडावर-बालावाली रोड पर स्थित ग्राम दयालवाला अपने मूढ़ों को लेकर प्रसिद्ध है। चार पीढि़यों से मूढ़े बनाने का काम हो रहा है। यहां के बने मूढ़े कई प्रदेशों के साथ बड़े होटलों तक आपूर्ति किए जाते हैं।
गांव दयालवाला में घुसते ही सड़क किनारे बने घरों के अहाते में बुजुर्गों के साथ युवा भी सरकंडों के मूढ़े बनाने में जुटे नजर आते हैं। इस गांव का यह पुश्तैनी काम है। ग्रामीण बताते हैं कि करीब चार पीढि़यों से गांव में मूढ़े बनाने का काम हो रहा है।
गांव निवासी 70 वर्षीय भोपाल सिंह बताते हैं उन्होंने जब मूढ़े बनाने शुरू किए थे तो एक मूढ़े की कीमत दो रुपये थी। वर्तमान में लगभग 500 रुपये में एक मूढ़ा बिकता है। बताते हैं कि मूढ़े बनाने के लिए गर्मी का मौसम उपयुक्त माना जाता है। एक मूढ़ा बनाने में एक कारीगर को लगभग आठ घंटे का समय लगता है l दयालवाला से हिमाचल, पंजाब, राजस्थान, उड़ीसा समेत अन्य राज्यों में मूढ़ों की आपूर्ति की जाती है।
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मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में सजे थे मूढ़े
ग्रामीण रामकिशन ने बताया कि बीते लोकसभा चुनाव से पहले नजीबाबाद में ग्राम चौपाल का आयोजन किया गया था। यहां पर मुख्यमंत्री के सामने मूढ़ों का प्रदर्शन किया गया था। मुख्यमंत्री ने भी इन मूढ़ों पर बैठकर इनकी तारीफ की थी।
आसपास के गांवों में भी बनते हैं मूढ़े
दयालवाला के आसपास के कुछ और गांवों में मूढ़े बनाने का काम होता है। दयालवाला के आलावा वीरूवाला, कोहरपुर के लगभग 500 परिवारों के लिए यही काम आजीविका का साधन है। मूढ़ों का निर्माण सरकंडे से किया जाता है। इन्हें बांधने के लिए फूस की रस्सी का इस्तेमाल होता है।
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आशीष तोमर
मंडावर। मंडावर-बालावाली रोड पर स्थित ग्राम दयालवाला अपने मूढ़ों को लेकर प्रसिद्ध है। चार पीढि़यों से मूढ़े बनाने का काम हो रहा है। यहां के बने मूढ़े कई प्रदेशों के साथ बड़े होटलों तक आपूर्ति किए जाते हैं।
गांव दयालवाला में घुसते ही सड़क किनारे बने घरों के अहाते में बुजुर्गों के साथ युवा भी सरकंडों के मूढ़े बनाने में जुटे नजर आते हैं। इस गांव का यह पुश्तैनी काम है। ग्रामीण बताते हैं कि करीब चार पीढि़यों से गांव में मूढ़े बनाने का काम हो रहा है।
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गांव निवासी 70 वर्षीय भोपाल सिंह बताते हैं उन्होंने जब मूढ़े बनाने शुरू किए थे तो एक मूढ़े की कीमत दो रुपये थी। वर्तमान में लगभग 500 रुपये में एक मूढ़ा बिकता है। बताते हैं कि मूढ़े बनाने के लिए गर्मी का मौसम उपयुक्त माना जाता है। एक मूढ़ा बनाने में एक कारीगर को लगभग आठ घंटे का समय लगता है l दयालवाला से हिमाचल, पंजाब, राजस्थान, उड़ीसा समेत अन्य राज्यों में मूढ़ों की आपूर्ति की जाती है।
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मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में सजे थे मूढ़े
ग्रामीण रामकिशन ने बताया कि बीते लोकसभा चुनाव से पहले नजीबाबाद में ग्राम चौपाल का आयोजन किया गया था। यहां पर मुख्यमंत्री के सामने मूढ़ों का प्रदर्शन किया गया था। मुख्यमंत्री ने भी इन मूढ़ों पर बैठकर इनकी तारीफ की थी।
आसपास के गांवों में भी बनते हैं मूढ़े
दयालवाला के आसपास के कुछ और गांवों में मूढ़े बनाने का काम होता है। दयालवाला के आलावा वीरूवाला, कोहरपुर के लगभग 500 परिवारों के लिए यही काम आजीविका का साधन है। मूढ़ों का निर्माण सरकंडे से किया जाता है। इन्हें बांधने के लिए फूस की रस्सी का इस्तेमाल होता है।