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कागजों में सिमटी ऑनलाइन पढ़ाई की योजनाएं
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कागजों में सिमटी ऑनलाइन पढ़ाई की योजनाएं
बिजनौर। यूपी बोर्ड के माध्यमिक विद्यालयों में ऑनलाइन पढ़ाई अब सिर्फ दिखावा बन गई है। अभिभावकों का कहना है कि बाजार में कोर्स की किताब मिल नहीं रही हैं। शासन की विद्यालयों में पाठ्य पुस्तक उपलब्ध कराने की योजना कागजों में है। कहा कि किताब है नहीं। कापी की जरूरत रही नहीं। ऐसे में बच्चे कैसे पढ़ें।
जिले में यूपी बोर्ड के 387 माध्यमिक विद्यालय संचालित हैं। इनमें एक लाख से अधिक विद्यार्थी पढ़ते हैं। कोरोना महामारी के कारण स्कूल चार माह से बंद हैं। शासन ने छात्रों की पढ़ाई के नुकसान की भरपाई के लिए 20 अप्रैल से ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की है। डीआईओएस दफ्तर के अनुसार करीब 60 हजार छात्र-छात्राएं ऑनलाइन पढ़ाई से जुड़े हैं। इस प्रकार करीब 50 हजार विद्यार्थी ऑनलाइन पढ़ाई से वंचित हैं। बताया गया कि इन छात्रों के पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जरूरी संसाधन एंड्रायड फोन आदि नहीं हैं। कहीं इंटरनेट की समस्या है। विभागीय दावों के अनुसार ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है। परंतु अभिभावकों का आरोप है कि सभी घोषणा कागजों में सिमटी हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि किताब है नहीं, पढ़ाई की चेकिंग हो नहीं रही है। फिर ऐसी पढ़ाई छात्रों के किस मतलब की है।
इस संबंध में अभिभावकों से बातचीत
राजीव कुमार नहटौर ब्लॉक के गांव लकड़ा के रहने वाले हैं। वे बताते है कि ऑनलाइन पढ़ाई ग्रामीण बच्चों के किसी मतलब की नहीं है। गरीब मजदूर किसी तरह से अपने परिवार का पेट पालता है। यूपी बोर्ड के स्कूलों ने भी ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर आर्थिक बोझ बढ़ा दिया है।
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हीमपुर क्षेत्र के गांव झाल निवासी शिव अवतार सिंह कहते हैं कि बाजार में किताब आ नहीं रही है। बच्चों को अभी तक यह नहीं पता है कि किस विषय में कौन से चैप्टर कम हुए हैं। सरकार जमीनी हकीकत देखे। गांवों में पढ़ाई में क्या-क्या परेशानी है।
उलैढा के लोकेश कुमार कहते है कि ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर कागजी घोड़े दौड़ रहे हैं। क्या किसी ने स्कूलों में जाकर यह जानने की कोशिश की है कि बगैर कोर्स की किताबों के पढ़ाई हो कैसे रही है।
मदन सिंह चांदपुर तहसील के गांव मंडौरा के है। बताते है कि यदि सरकार को वास्तव में बच्चों की पढ़ाई की चिंता है तो पहले गांवों में ऑनलाइन पढ़ाई की सुविधा मुहैया कराए। गांवों में इंटरनेट समस्या दूर करने के लिए टावर लगवाएं। छात्रों को कोर्स उपलब्ध कराएं।
सुक्खे सिंह निवासी नांगल जट का कहना है कि कोई भी पढ़ाई हो सबसे जरूरी है बच्चे के पास किताब कापी होना। ये दोनों हैं नहीं, तो फिर पढ़ेगा क्या।
फतहपुर कला के रहने वाले धर्मेंद्र सिंह के अनुसार सरकार को योजनाएं ग्रामीण बच्चों की परिस्थिति देखकर बनानी चाहिए। ऑनलाइन पढ़ाई का फायदा देने के लिए गांवों तक पहुंचाया जाए। प्रकाशकों पर किताबों के लिए दवाब बनाया जाए।
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बिजनौर। यूपी बोर्ड के माध्यमिक विद्यालयों में ऑनलाइन पढ़ाई अब सिर्फ दिखावा बन गई है। अभिभावकों का कहना है कि बाजार में कोर्स की किताब मिल नहीं रही हैं। शासन की विद्यालयों में पाठ्य पुस्तक उपलब्ध कराने की योजना कागजों में है। कहा कि किताब है नहीं। कापी की जरूरत रही नहीं। ऐसे में बच्चे कैसे पढ़ें।
जिले में यूपी बोर्ड के 387 माध्यमिक विद्यालय संचालित हैं। इनमें एक लाख से अधिक विद्यार्थी पढ़ते हैं। कोरोना महामारी के कारण स्कूल चार माह से बंद हैं। शासन ने छात्रों की पढ़ाई के नुकसान की भरपाई के लिए 20 अप्रैल से ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की है। डीआईओएस दफ्तर के अनुसार करीब 60 हजार छात्र-छात्राएं ऑनलाइन पढ़ाई से जुड़े हैं। इस प्रकार करीब 50 हजार विद्यार्थी ऑनलाइन पढ़ाई से वंचित हैं। बताया गया कि इन छात्रों के पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जरूरी संसाधन एंड्रायड फोन आदि नहीं हैं। कहीं इंटरनेट की समस्या है। विभागीय दावों के अनुसार ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है। परंतु अभिभावकों का आरोप है कि सभी घोषणा कागजों में सिमटी हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि किताब है नहीं, पढ़ाई की चेकिंग हो नहीं रही है। फिर ऐसी पढ़ाई छात्रों के किस मतलब की है।
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इस संबंध में अभिभावकों से बातचीत
राजीव कुमार नहटौर ब्लॉक के गांव लकड़ा के रहने वाले हैं। वे बताते है कि ऑनलाइन पढ़ाई ग्रामीण बच्चों के किसी मतलब की नहीं है। गरीब मजदूर किसी तरह से अपने परिवार का पेट पालता है। यूपी बोर्ड के स्कूलों ने भी ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर आर्थिक बोझ बढ़ा दिया है।
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हीमपुर क्षेत्र के गांव झाल निवासी शिव अवतार सिंह कहते हैं कि बाजार में किताब आ नहीं रही है। बच्चों को अभी तक यह नहीं पता है कि किस विषय में कौन से चैप्टर कम हुए हैं। सरकार जमीनी हकीकत देखे। गांवों में पढ़ाई में क्या-क्या परेशानी है।
उलैढा के लोकेश कुमार कहते है कि ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर कागजी घोड़े दौड़ रहे हैं। क्या किसी ने स्कूलों में जाकर यह जानने की कोशिश की है कि बगैर कोर्स की किताबों के पढ़ाई हो कैसे रही है।
मदन सिंह चांदपुर तहसील के गांव मंडौरा के है। बताते है कि यदि सरकार को वास्तव में बच्चों की पढ़ाई की चिंता है तो पहले गांवों में ऑनलाइन पढ़ाई की सुविधा मुहैया कराए। गांवों में इंटरनेट समस्या दूर करने के लिए टावर लगवाएं। छात्रों को कोर्स उपलब्ध कराएं।
सुक्खे सिंह निवासी नांगल जट का कहना है कि कोई भी पढ़ाई हो सबसे जरूरी है बच्चे के पास किताब कापी होना। ये दोनों हैं नहीं, तो फिर पढ़ेगा क्या।
फतहपुर कला के रहने वाले धर्मेंद्र सिंह के अनुसार सरकार को योजनाएं ग्रामीण बच्चों की परिस्थिति देखकर बनानी चाहिए। ऑनलाइन पढ़ाई का फायदा देने के लिए गांवों तक पहुंचाया जाए। प्रकाशकों पर किताबों के लिए दवाब बनाया जाए।

धर्मेंद्र सिंह।- फोटो : BIJNOR

शिव अवतार सिंह।- फोटो : BIJNOR