बिजनौर : स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आनंद प्रकाश गुप्ता पंचतत्व में विलीन, सुभाष चंद्र बोस के थे अनुयायी
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मंगलवार को सुबह करीब दस बजे नई बस्ती स्थित उनके आवास से अंतिम यात्रा शुरु हुई। इससे शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का तांता लगा रहा। इस दौरान जिलाधिकारी उमेश मिश्रा एवं एसपी धर्मवीर सिंह सहित तमाम अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि आनंद भाई के आवास पर पहुंचे।
परिजनों के अनुसार आनंद भाई कुछ समय से बीमार चल रहे थे। तीन अगस्त को उन्हें पहले जिला अस्पताल और फिर निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां से बेहतर उपचार के लिए परिजन उन्हें गाजियाबाद ले गए और निजी अस्पताल में भर्ती कराया। वहां पर भी हालत में सुधार न होने पर चिकित्सकों ने उन्हें घर ले जाने की सलाह दी।
परिजन उन्हें 12 अगस्त को बिजनौर ले आए। इसका पता चलने पर जिलाधिकारी उमेश मिश्रा ने उन्हें जिला अस्पताल के आईसीयू में एडमिट कराया था। जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. अरुण पांडेय के निर्देशन में उनका उपचार चल रहा था। अंग्रेजों को नाकों चने चबाने वाले आनंद भाई सोमवार की रात लगभग 11ः15 बजे मौत से जंग हार गए।
रात में ही जिलाधिकारी ने परिजनों को सांत्वना दते हुए शोक संवेदना व्यक्त की। मंगलवार की सुबह डीएम और एसपी सहित कई अन्य अधिकारी एवं जनप्रतिनिधियों ने आनंद भाई को उनके घर पर पहुंचकर श्रद्धासुमन अर्पित किए। उनका पार्थिव शरीर रात भर परिजनों की राय पर अस्पताल में ही रहा।
सुबह लगभग सात बजे उनके आर्य नगर नई बस्ती स्थित आवास पर लाया गया। यहां श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों का तांता लगा रहा। आनंद भाई हमेशा सम्मान से दूर रहे। उन्होंने कभी भी स्वयं को किसी भी मंच से सम्मानित नहीं कराया और न ही कभी उन्होंने इसका अफसोस ही किया। उनका आवास आजादी के आंदोलन का केंद्र था।
ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत करने पर दोनों भाइयों को गिरफ्तार करने के लिए अंग्रेजों ने दबिश दी थी, लेकिन उनके बड़े भाई ज्ञानप्रकाश गुप्ता फरार हो गए थे और कभी भी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। उन्होंने भूमिगत होकर आजादी के आंदोलन में शिरकत की, जबकि आनंद भाई मोहल्ला बुखारा में ही किसी स्थान पर छिपे हुए थे। उन्हें मुखबिर की सूचना पर गिरफ्तार कर लिया गया।
आनंद भाई सुभाष चंद्र बोस के अनुयायी होने के कारण प्रचार-प्रसार और सम्मान से दूर रहे। उन्होंने बताया कि भारत छोड़ो आंदोलन से पहले वे महात्मा गांधी से मिले थे और उनकी प्रेरणा पर ही उन्होंने बिजनौर में इस आंदोलन की अगुवाई थी। दबंग और मजबूत कदकाठी के आनंद भाई देश आजाद होने बाद पीआरडी में कमांडेंट बन गए। जबकि उनके बड़े भाई स्व. ज्ञान प्रकाश गुप्ता पुनर्वास आयोग में लेखाकार के पद पर नौकरी पर लग गए थे।
आनंद भाई में देश की सेवा करने का जुनून बचपन से ही था। लिहाजा उन्होंने शादी नहीं की और अविवाहित रहे। पीआरडी में नौकरी के दौरान वह उत्तर प्रदेश के कई जिलों में रहे। सन् 1968 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और बिजनौर आकर बड़े भाई स्व. ज्ञान प्रकाश गुप्ता के परिवार के साथ रहने लगे। उनके बड़े भाई के परिवार में उनकी भाभी सरोज रानी और तीन बेटियां आशा मित्तल, संगीता गुप्ता, विनीता गुप्ता, दामाद मुकेश कुमार मित्तल, दीपक कुमार अग्रवाल और और नाती हैं।
शोक संवेदना व्यक्त करने वालों में जिलाधिकारी उमेश मिश्रा, एसपी डॉ. धर्मवीर सिंह, वरिष्ठ भाजपा नेता ऐश्वर्य चौधरी मौसम, व्यापारी नेता रजनीश अग्रवाल, वरिष्ठ सभासद घनश्यामदास गुप्ता, आरएसएस नेता मयंक मयूर, अशोक निर्दोष, नीरज शर्मा, डा. सुधांशु शर्मा आदि शामिल रहे।