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अमानगढ़ वन रेंज में धड़ल्ले से चल रहे कोल्हू, वन्यजीवों को खतरा
Updated Sun, 19 Nov 2017 12:34 AM IST
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अफजलगढ़ (बिजनौर)। कार्बेट टाइगर रिजर्व और अमानगढ़ वन रेंज से सटे इलाके में बेरोकटोक कोल्हुओं का संचालन हो रहा है। एनजीटी के आदेश के बाद भी वन विभाग के अधिकारी वन्यजीव इलाकों में कोल्हुओं के संचालन पर रोक नहीं लगा पा रहे हैं। कोल्हुओं के चलने से वन्यजीवों को खतरा है।
कार्बेट टाइगर रिजर्व सहित नगीना और अमानगढ़ वन रेंज से सटे इलाकों में दो दर्जन से ज्यादा गुड़ बनाने के लिए कोल्हू चल रहे हैं। अधिकांश कोल्हू संचालक बाहर से आकर यहां कोल्हू लगाकर गन्ने की पेराई कर गुड़ बनाते हैं। कोल्हू चलने में पशुओं के चारे में प्रयोग की जाने वाली पुआल भट्टियों में झोंकी जाती है। इससे पशु चारे की किल्लत के साथ-साथ वन क्षेत्र में प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है। ग्रामीण जगतार सिंह, महेंद्र सिंह, विक्रम सिंह आदि का कहना है कि करीब डेढ़ दशक से वन क्षेत्र से सटे इलाके में कोल्हू चलते हैं। पूरा मामला संज्ञान में होने के बावजूद वन विभाग के अधिकारियों ने कभी कोल्हू संचालकों से पूछताछ तक की भी जहमत नहीं उठाई। अक्सर वन्यजीव वनों से निकलकर मैदान में आ जाते हैं। मैदान में आने के बाद वन्यजीव गन्ने के खेतों में अपना डेरा जमा लेते हैं। कोल्हुओं के शोरशराबा सुनकर वन्यजीवों के हिंसक होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। वन रेंज से सटे इलाके में कोल्हू चलने से जितना प्रदूषण का खतरा है, उससे कहीं ज्यादा खतरा वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर है। हालांकि एनजीटी के निर्देश के अनुसार कार्बेट टाइगर रिजर्व सहित अन्य वन क्षेत्रों के आसपास इस तरह गतिविधियां प्रतिबंधित है। उधर, अमानगढ़ रेंजर मोहम्मद इरफान का कहना है कि वन क्षेत्र से सटे इलाके में कितने कोल्हू चल रहे अभी जानकारी नहीं है। जांच कर कोल्हू संचालकों के खिलाफ नोटिस जारी किए जाएंगे।
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कार्बेट टाइगर रिजर्व सहित नगीना और अमानगढ़ वन रेंज से सटे इलाकों में दो दर्जन से ज्यादा गुड़ बनाने के लिए कोल्हू चल रहे हैं। अधिकांश कोल्हू संचालक बाहर से आकर यहां कोल्हू लगाकर गन्ने की पेराई कर गुड़ बनाते हैं। कोल्हू चलने में पशुओं के चारे में प्रयोग की जाने वाली पुआल भट्टियों में झोंकी जाती है। इससे पशु चारे की किल्लत के साथ-साथ वन क्षेत्र में प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है। ग्रामीण जगतार सिंह, महेंद्र सिंह, विक्रम सिंह आदि का कहना है कि करीब डेढ़ दशक से वन क्षेत्र से सटे इलाके में कोल्हू चलते हैं। पूरा मामला संज्ञान में होने के बावजूद वन विभाग के अधिकारियों ने कभी कोल्हू संचालकों से पूछताछ तक की भी जहमत नहीं उठाई। अक्सर वन्यजीव वनों से निकलकर मैदान में आ जाते हैं। मैदान में आने के बाद वन्यजीव गन्ने के खेतों में अपना डेरा जमा लेते हैं। कोल्हुओं के शोरशराबा सुनकर वन्यजीवों के हिंसक होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। वन रेंज से सटे इलाके में कोल्हू चलने से जितना प्रदूषण का खतरा है, उससे कहीं ज्यादा खतरा वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर है। हालांकि एनजीटी के निर्देश के अनुसार कार्बेट टाइगर रिजर्व सहित अन्य वन क्षेत्रों के आसपास इस तरह गतिविधियां प्रतिबंधित है। उधर, अमानगढ़ रेंजर मोहम्मद इरफान का कहना है कि वन क्षेत्र से सटे इलाके में कितने कोल्हू चल रहे अभी जानकारी नहीं है। जांच कर कोल्हू संचालकों के खिलाफ नोटिस जारी किए जाएंगे।
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