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कार्बेट टाइगर रिजर्व मे लकड़बग्घा परियोजना की कवायद शुरू
Updated Fri, 29 Dec 2017 12:02 AM IST
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कालागढ़। कार्बेट टाइगर रिजर्व प्रशासन वनों में लकड़बग्घे के संरक्षण के लिए विशेष परियोजना चलाने की तैयारी कर रहा है। कार्बेट टाइगर रिजर्व के सीमावर्ती इलाके में इस जीव के दिखाई देने पर वन विभाग ने इसे गंभीरता से लिया है।
कार्बेट टाइगर रिजर्व में बाघों, हाथियों के बाद लकड़बग्घे के संरक्षण को लेकर अब नयी परियोजना चलाने जा रहा है। जिसके लिए वन विभाग के आला अधिकारी इस पर विचार विमर्श कर रहे है। 1973 में कालागढ़ से ही कार्बेट टाइगर रिजर्व में बाघों के संरक्षण के लिए बाघ परियोजना शुरू की गई थी। उसके बाद यहां एशियाई हाथियों के संरक्षण के लिए हाथी परियोजना चली। लगभग दो माह से सीमावर्ती इलाके में दिखाई दे रहे लकड़बग्घे जब कार्बेट के वनों में नजर आने लगे तो अब यहां लकड़बग्घा संरक्षण परियोजना चलाने की कवायद शुरू कर रहा है। कार्बेट टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक अमित वर्मा का कहना है कि लगभग पांच साल से यहां सीमावर्ती इलाके में लकड़बग्घा दिखाई देने शुरू हो गए थे। खारा गेट, मोरघाटी मे इनकी उपस्थिति का पता लगा था। जिसको लेकर वन विभाग ने लकड़बग्घा संरक्षण परियोजना चलाने का प्रस्ताव तैयार किया है। जिसका अनुमोदन प्रदेश के मुख्य वन्यजीव जंतु प्रतिपालक के यहां से आने पर इसे संचालित किया जाएगा। कालागढ़ क्षेत्र में लकड़बग्घे की पहचान के लिए वन विभाग ने कैमरा ट्रैप लगा दिए है। वन क्षेत्राधिकारी आरके भट्ट का कहना है कि हालांकि यह कैमरा ट्रैप में तो नजर नहीं आया है। अब इसके लिए रेडियो कालर लगाने की तैयारी है ।
अनुसूची तीन में दर्ज है लकड़बग्घा
वन्य जीवन परिरक्षण सोसायटी के राष्ट्रीय सचिव ओर पूर्व डीएफओ नरेंद्र सिंह का कहना है कि लकड़बग्घा वन्यजीव जंतु अधिनियम 1972 के अंतर्गत अनुसूची तीन में दर्ज है। जीवो को उनके वास्तविक स्तर के अनुसार अनुसूची में शामिल किया जाता है। लुप्त होने वाले जीवों को अनुसूची एक और दो में रखा गया है। ऐसे जीव जिनकी संख्या कुछ अधिक है जैसे हिरन आदि उन्हें अनुसूची तीन में रखा गया है। कार्बेट टाइगर रिजर्व में चलने जा रही लकड़बग्घा संरक्षण परियोजना पहली होगी। जिसमें इस जीव का संरक्षण किया जाएगा।
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कार्बेट टाइगर रिजर्व में बाघों, हाथियों के बाद लकड़बग्घे के संरक्षण को लेकर अब नयी परियोजना चलाने जा रहा है। जिसके लिए वन विभाग के आला अधिकारी इस पर विचार विमर्श कर रहे है। 1973 में कालागढ़ से ही कार्बेट टाइगर रिजर्व में बाघों के संरक्षण के लिए बाघ परियोजना शुरू की गई थी। उसके बाद यहां एशियाई हाथियों के संरक्षण के लिए हाथी परियोजना चली। लगभग दो माह से सीमावर्ती इलाके में दिखाई दे रहे लकड़बग्घे जब कार्बेट के वनों में नजर आने लगे तो अब यहां लकड़बग्घा संरक्षण परियोजना चलाने की कवायद शुरू कर रहा है। कार्बेट टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक अमित वर्मा का कहना है कि लगभग पांच साल से यहां सीमावर्ती इलाके में लकड़बग्घा दिखाई देने शुरू हो गए थे। खारा गेट, मोरघाटी मे इनकी उपस्थिति का पता लगा था। जिसको लेकर वन विभाग ने लकड़बग्घा संरक्षण परियोजना चलाने का प्रस्ताव तैयार किया है। जिसका अनुमोदन प्रदेश के मुख्य वन्यजीव जंतु प्रतिपालक के यहां से आने पर इसे संचालित किया जाएगा। कालागढ़ क्षेत्र में लकड़बग्घे की पहचान के लिए वन विभाग ने कैमरा ट्रैप लगा दिए है। वन क्षेत्राधिकारी आरके भट्ट का कहना है कि हालांकि यह कैमरा ट्रैप में तो नजर नहीं आया है। अब इसके लिए रेडियो कालर लगाने की तैयारी है ।
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अनुसूची तीन में दर्ज है लकड़बग्घा
वन्य जीवन परिरक्षण सोसायटी के राष्ट्रीय सचिव ओर पूर्व डीएफओ नरेंद्र सिंह का कहना है कि लकड़बग्घा वन्यजीव जंतु अधिनियम 1972 के अंतर्गत अनुसूची तीन में दर्ज है। जीवो को उनके वास्तविक स्तर के अनुसार अनुसूची में शामिल किया जाता है। लुप्त होने वाले जीवों को अनुसूची एक और दो में रखा गया है। ऐसे जीव जिनकी संख्या कुछ अधिक है जैसे हिरन आदि उन्हें अनुसूची तीन में रखा गया है। कार्बेट टाइगर रिजर्व में चलने जा रही लकड़बग्घा संरक्षण परियोजना पहली होगी। जिसमें इस जीव का संरक्षण किया जाएगा।
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