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किसानों ने की नारेबाजी
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ऊंज। केंद्रीय नेतृत्व के आह्वान पर भारतीय किसान यूनियन टिकैत ग्रुप ने बुधवार को काला झंडा हाथों में लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ कुरमैचा बाजार में प्रदर्शन कर नारेबाजी किया। इस दौरान अध्यक्ष अरुणेंद्र चौबे के नेतृत्व में जुटे किसानों ने कहा कि सरकार मनमानी ढंग से किसान विरोधी नीतियों को पारित कराना चाहती है जिसे कभी पूरा नहीं होने दिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार किसानों की हितैषी बनना चाहती है तो विरोधी नीतियों को वापस लेकर दिखाए। पंजाब से लेकर आजमगढ़ तक सड़कों पर बैठने वालों पर सरकार पूरी तरह से निर्दयी हो चुकी है। सिर्फ चुनावी स्टंट के लिए कभी डीएपी तो कभी यूरिया के नाम पर दाम घटाने-बढ़ाने में लग जाती है। नोट बंदी, लॉकडाउन, प्राकृतिक आपदाओं को झेलने वाले किसानों की कमर टूट रही है जिसकी क्षतिपूर्ति देने में पसीना छूट रहा है। जब-जब खेतीबारी का समय आता है कि नकली, मिलावटी खाद, बीज, रसायन की कालाबाजारी शुरू हो जाती है। सिंचाई के संसाधन जर्जर पड़े हैं, नालियां जर्जर होकर शासन-प्रशासन की कथनी-करनी का अंतर पेश कर रही है, बिजली दर आसमान छूने से किसान बर्बादी की कगार पर है, सहकारी समितियां खाली पड़ी है और सरकार किसानों की हितैषी बनकर छल रही है। एसी कमरों में बैठकर नीति बनाने वाले यह नहीं जानते हैं कि 80 फीसद का योगदान किसानों से मिलता है देश कृषि पर निर्भर है। सरकार की गलत नीतियों से गरीब, मजदूर, बेरोजगार किसान परिवार भुखमरी झेल रहा है जिनकी उपेक्षा महंगी पड़ेगी और विरोधी नीतियां हर हालत में वापस लेना ही पड़ेगा। इस अवसर पर आशीष राय, रामाश्रय बिंद, गोपाल सरोज,राकेश चतुर्वेदी, हर्ष, उत्कर्ष, देवांश समेत क्षेत्रीय किसान मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि यदि सरकार किसानों की हितैषी बनना चाहती है तो विरोधी नीतियों को वापस लेकर दिखाए। पंजाब से लेकर आजमगढ़ तक सड़कों पर बैठने वालों पर सरकार पूरी तरह से निर्दयी हो चुकी है। सिर्फ चुनावी स्टंट के लिए कभी डीएपी तो कभी यूरिया के नाम पर दाम घटाने-बढ़ाने में लग जाती है। नोट बंदी, लॉकडाउन, प्राकृतिक आपदाओं को झेलने वाले किसानों की कमर टूट रही है जिसकी क्षतिपूर्ति देने में पसीना छूट रहा है। जब-जब खेतीबारी का समय आता है कि नकली, मिलावटी खाद, बीज, रसायन की कालाबाजारी शुरू हो जाती है। सिंचाई के संसाधन जर्जर पड़े हैं, नालियां जर्जर होकर शासन-प्रशासन की कथनी-करनी का अंतर पेश कर रही है, बिजली दर आसमान छूने से किसान बर्बादी की कगार पर है, सहकारी समितियां खाली पड़ी है और सरकार किसानों की हितैषी बनकर छल रही है। एसी कमरों में बैठकर नीति बनाने वाले यह नहीं जानते हैं कि 80 फीसद का योगदान किसानों से मिलता है देश कृषि पर निर्भर है। सरकार की गलत नीतियों से गरीब, मजदूर, बेरोजगार किसान परिवार भुखमरी झेल रहा है जिनकी उपेक्षा महंगी पड़ेगी और विरोधी नीतियां हर हालत में वापस लेना ही पड़ेगा। इस अवसर पर आशीष राय, रामाश्रय बिंद, गोपाल सरोज,राकेश चतुर्वेदी, हर्ष, उत्कर्ष, देवांश समेत क्षेत्रीय किसान मौजूद रहे।
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