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आवासीय मदरसों में सुविधाओं का टोटा
ब्यूरो/ अमर उजाला, भदोही
Updated Fri, 04 Sep 2015 01:54 AM IST
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बिना अनुदानित की बात छोड़िए, शासन से अनुदानित आवासीय मदरसों में भी सामान्य सुविधाओं का टोटा है। शासन से मदरसों को अनुदान के नाम पर सिर्फ कर्मचारियों का वेतन दिया जाता है।
मदरसों में उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद के कोर्स मुंशी, मौलवी, आलिम, कामिल और फाजिल का अनौपचारिक संचालन होता है। जबकि अनौपचारिक रूप से आवासीय व्यवस्था के तहत हिफ्ज, किरअत, मौलवियत, आलमियत, फजिलत कोर्स संचालन होता है।
इसके लिए मदरसों में छात्रों को खान-पान, रहने आदि की सुविधा मदरसा प्रबंधन कौम के फितरे, जकात और चंदे से करता है। इसकी खासतौर से गरीब बच्चों को सुविधा मिलती है। संपन्न या सामान्य घर के बच्चों के अभिभावक यदि शुल्क के रूप में जो कुछ सहयोग कर दें, यह उनके ऊपर निर्भर करता है।
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आवासीय व्यवस्था में रहकर पढ़ाई करने वाले छात्रों के फारिग होकर निकलने के बाद नौकरी आदि के लिए भी समस्या होती है।
क्योंकि सरकारों ने हिफ्ज, किरअत आदि कोर्स करने वाले छात्रों को नौकरी के लिए विकल्प नहीं दिया है। इस तरह से मदरसों या अल्पसंख्यकों के हित और कल्याण करने का प्रचार प्रसार तो खूब होता है, लेकिन पटल पर इसका लाभ मदरसों और मुस्लिमों को मिलना सपना ही रहता है। मदरसा प्रबंधन के पास स्वास्थ्य की जांच को लेकर बजट है तो शिविर लगवा देते हैं। जहां बजट व्यवस्था नहीं वहां स्वास्थ्य की जांच नहीं हो पाती। ऐसे में छतरपुरा मदरसा जैसे घटना होने की आशंका बनी रहती है।
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मदरसों में उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद के कोर्स मुंशी, मौलवी, आलिम, कामिल और फाजिल का अनौपचारिक संचालन होता है। जबकि अनौपचारिक रूप से आवासीय व्यवस्था के तहत हिफ्ज, किरअत, मौलवियत, आलमियत, फजिलत कोर्स संचालन होता है।
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इसके लिए मदरसों में छात्रों को खान-पान, रहने आदि की सुविधा मदरसा प्रबंधन कौम के फितरे, जकात और चंदे से करता है। इसकी खासतौर से गरीब बच्चों को सुविधा मिलती है। संपन्न या सामान्य घर के बच्चों के अभिभावक यदि शुल्क के रूप में जो कुछ सहयोग कर दें, यह उनके ऊपर निर्भर करता है।
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आवासीय व्यवस्था में रहकर पढ़ाई करने वाले छात्रों के फारिग होकर निकलने के बाद नौकरी आदि के लिए भी समस्या होती है।
क्योंकि सरकारों ने हिफ्ज, किरअत आदि कोर्स करने वाले छात्रों को नौकरी के लिए विकल्प नहीं दिया है। इस तरह से मदरसों या अल्पसंख्यकों के हित और कल्याण करने का प्रचार प्रसार तो खूब होता है, लेकिन पटल पर इसका लाभ मदरसों और मुस्लिमों को मिलना सपना ही रहता है। मदरसा प्रबंधन के पास स्वास्थ्य की जांच को लेकर बजट है तो शिविर लगवा देते हैं। जहां बजट व्यवस्था नहीं वहां स्वास्थ्य की जांच नहीं हो पाती। ऐसे में छतरपुरा मदरसा जैसे घटना होने की आशंका बनी रहती है।