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कम समय में बुलंदी छूने लगे थे राजेश
Updated Wed, 04 Oct 2017 01:14 AM IST
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राजेश
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ज्ञानपुर (भदोही)।
महज सात साल के सियासी सफरनामे में तेजी से आगे बढ़ रहे राजेश यादव की महत्वाकांक्षा सियासी जगत को भौचक्का कर रही थी। मर्चेंट नेवी में इंजीनियर का जॉब कर रहे 45 वर्षीय राजेश यादव नौकरी छोड़कर 2010 में पहली बार राजनीति की तरफ मुखातिब हुए। तब वह पंचायत चुनाव में जिला पंचायत सदस्य चुने गए। इसके बाद 2017 विधानसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर वह मैदान में उतरे और मोदी लहर में तीसरा स्थान हासिल किया। हालांकि सीट निषाद पार्टी के विजय मिश्रा के हाथ में गई।
पिछले विधानसभा चुनाव से पूर्व राजेश यादव के व्यक्तित्व को कम लोग ही जानते रहे होंगे। जिला पंचायत सदस्य रहने के दौरान भी उनकी राजनीतिक सक्रियता उल्लेखनीय नहीं रही लेकिन धीरे-धीरे वह सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनते गए और 2017 आते-आते एकदम से चर्चा में आ गए। तब तक उन्हें बसपा से चुनाव का टिकट मिल गया और वह विधानसभा प्रभारी भी बना दिए गए थे। चुनाव प्रचार के दौरान एक समय ऐसा भी आया, जब उन्हें ज्ञानपुर विधानसभा से बेहद मजबूत प्रत्याशी माना जाने लगा था और चर्चाएं आम हो गईं कि जातीय समीकरण में राजेश बहुतेरों पर भारी पड़ रहे हैं लेकिन अंतिम समय में बाजी पलट गई और चुनाव नतीजे आए तो वह तीसरे स्थान पर चले गए। राजेश यादव के नजदीकियों की मानें तो वह ईंट भट्ठे के कारोबार और ठेकेदारी भी जुड़े थे।
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महज सात साल के सियासी सफरनामे में तेजी से आगे बढ़ रहे राजेश यादव की महत्वाकांक्षा सियासी जगत को भौचक्का कर रही थी। मर्चेंट नेवी में इंजीनियर का जॉब कर रहे 45 वर्षीय राजेश यादव नौकरी छोड़कर 2010 में पहली बार राजनीति की तरफ मुखातिब हुए। तब वह पंचायत चुनाव में जिला पंचायत सदस्य चुने गए। इसके बाद 2017 विधानसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर वह मैदान में उतरे और मोदी लहर में तीसरा स्थान हासिल किया। हालांकि सीट निषाद पार्टी के विजय मिश्रा के हाथ में गई।
पिछले विधानसभा चुनाव से पूर्व राजेश यादव के व्यक्तित्व को कम लोग ही जानते रहे होंगे। जिला पंचायत सदस्य रहने के दौरान भी उनकी राजनीतिक सक्रियता उल्लेखनीय नहीं रही लेकिन धीरे-धीरे वह सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनते गए और 2017 आते-आते एकदम से चर्चा में आ गए। तब तक उन्हें बसपा से चुनाव का टिकट मिल गया और वह विधानसभा प्रभारी भी बना दिए गए थे। चुनाव प्रचार के दौरान एक समय ऐसा भी आया, जब उन्हें ज्ञानपुर विधानसभा से बेहद मजबूत प्रत्याशी माना जाने लगा था और चर्चाएं आम हो गईं कि जातीय समीकरण में राजेश बहुतेरों पर भारी पड़ रहे हैं लेकिन अंतिम समय में बाजी पलट गई और चुनाव नतीजे आए तो वह तीसरे स्थान पर चले गए। राजेश यादव के नजदीकियों की मानें तो वह ईंट भट्ठे के कारोबार और ठेकेदारी भी जुड़े थे।
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