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कालीन निर्यातक उत्पादन घटाने को मजबूर
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भदोही। एक ओर जहां भारत कोरोना के दूसरे लहर से जूझ रहा है और निर्यातक कालीन उत्पादन घटाने को मजबूर हैं। दूसरी ओर कहा जा रहा है कि अमरीका और यूरोपीय देशों से भारतीय कालीनों की मांग बराबर बनी हुई है। कोरोना का दूसरा लहर इतना भयावह है तथा कालीन परिक्षेत्र में हालिया मौतों की संख्या बढ़ने से लोगों को उत्पादन घटाना पड़ रहा है। इससे भारतीय कालीन उद्योग को करोड़ों की चपत लग रही है। कोरोना के भय से बहुत से बुनकर या तो घर लौट चुके हैं या तो कारखानों में संक्रमण के डर से बुनाई नहीं कर रहे हैं।
भदोही का कुल सालाना कालीन निर्यात 12 हजार करोड़ है। इसमें 50 प्रतिशत का खरीदार अमरीका है। 30 प्रतिशत का खरीदार यूरोपीय देश हैं तथा बाकी 20 प्रतिशत अन्य देशों का जाता है। अगर कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) के आंकड़ों को मानें तो वर्ष 2020-21 में कालीन निर्यात वित्ती वर्ष 2019-20 के बराबर ही रहा। समझा जा रहा था कि चालू वित्त वर्ष में निर्यात में तेजी आएगी लेकिन मार्च से ही देश पर कोरोना के दूसरे लहर का हमला हो गया जिससे कालीन उत्पादक और निर्यातक चिंतित हो उठे हैं।
आल इंडिया कारपेट मैनुफैक्चरर्स एसोसिएशन (एकमा) के पूर्व मानद सचिव पीयूष बरनवाल ने बताया कि कई समस्या आ खड़ी हुई हैं। विदेशों में मांग भले ही है लेकिन तैयार माल के ट्रांसपोर्टेशन से लेकर बंदरगाहों और कार्गो कंपनियों के दफ्तरों में कामकाज प्रभावित होने से माल होते हुए भी भरपूर मात्रा में निर्यात नहीं हो पा रहा है। गोपीगंज के प्रमुख कालीन निर्यातक, सीईपीसी प्रशासनिक सदस्य संजय गुप्ता ने कहा कि आमूनन 30 दिन में भदोही से भेजा गया माल आयातक के यहां पहुंच जाता था। लेकिन वर्तमान में 50 से 60 दिन का समय लग रहा है। आगे हालात और खराब हुए है नुकसान ही नुकसान है।
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भदोही का कुल सालाना कालीन निर्यात 12 हजार करोड़ है। इसमें 50 प्रतिशत का खरीदार अमरीका है। 30 प्रतिशत का खरीदार यूरोपीय देश हैं तथा बाकी 20 प्रतिशत अन्य देशों का जाता है। अगर कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) के आंकड़ों को मानें तो वर्ष 2020-21 में कालीन निर्यात वित्ती वर्ष 2019-20 के बराबर ही रहा। समझा जा रहा था कि चालू वित्त वर्ष में निर्यात में तेजी आएगी लेकिन मार्च से ही देश पर कोरोना के दूसरे लहर का हमला हो गया जिससे कालीन उत्पादक और निर्यातक चिंतित हो उठे हैं।
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आल इंडिया कारपेट मैनुफैक्चरर्स एसोसिएशन (एकमा) के पूर्व मानद सचिव पीयूष बरनवाल ने बताया कि कई समस्या आ खड़ी हुई हैं। विदेशों में मांग भले ही है लेकिन तैयार माल के ट्रांसपोर्टेशन से लेकर बंदरगाहों और कार्गो कंपनियों के दफ्तरों में कामकाज प्रभावित होने से माल होते हुए भी भरपूर मात्रा में निर्यात नहीं हो पा रहा है। गोपीगंज के प्रमुख कालीन निर्यातक, सीईपीसी प्रशासनिक सदस्य संजय गुप्ता ने कहा कि आमूनन 30 दिन में भदोही से भेजा गया माल आयातक के यहां पहुंच जाता था। लेकिन वर्तमान में 50 से 60 दिन का समय लग रहा है। आगे हालात और खराब हुए है नुकसान ही नुकसान है।
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