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खाली रह गईं सदस्य की 537 सीटें

Mon, 05 Apr 2021 09:52 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 05 Apr 2021 09:52 PM IST
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537 seats of the member remained vacant
ज्ञानपुर। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए नामांकन रविवार को पूर्ण हो गया। इस क्रम में जिला पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान और बीडीसी को लेकर जहां घमासान की स्थिति बनी हुई है वहीं ग्राम पंचायत सदस्यों की 537 सीटें खाली रह गईं। जबकि ग्राम पंचायतों के विकास में सदस्यों का अहम भूमिका होती है। खुली बैठक में बनने वाली कार्ययोजना पर हस्ताक्षर से लेकर विभिन्न ग्राम समितियों में उनकी जिम्मेदारी तय होती है।
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जिले में 26 जिला पंचायत सदस्य, 546 ग्राम प्रधान और 6848 ग्राम पंचायत सदस्य के पदों पर चुनाव हो रहा हैं। 15 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान के लिए रविवार को नामांकन हो गया। प्रधान की 546 सीटों के लिए छह हजार से अधिक जबकि 661 बीडीसी के लिए छह हजार प्रत्याशियों ने ताल ठोंकी है, लेकिन सदस्य पद पर 6311 प्रत्याशियों ने ही नामांकन किया है। पंचायत चुनाव में प्रधान पद पर सबसे ज्यादा जोर रहता है, वहीं सदस्य पद पर ग्रामीण रुचि ही नहीं ले रहे हैं। इससे ज्यादातर गांवों में सदस्य पद खाली रह जाते हैं या निर्विरोध निर्वाचन हो जाता है। 2015 के पंचायत चुनाव में जिले के छह ब्लॉकों के 561 गांवों में 8288 ग्राम पंचायत सदस्यों के पद थे। जिसमें से 1200 से अधिक पद रिक्त रह गए थे। जिसके चलते कई ग्राम पंचायतों का गठन नहीं हो सका था। दो बार उपचुनाव कराने के बाद भी सीटें नहीं भर पाईं। इस बार जिले में गांवों की संख्या घटकर 546 हो गई है। जिससे सदस्य की सीटें 6848 ग्राम पंचायत सदस्य के पद हैं।
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ग्राम पंचायत सदस्य पद पर चुनाव कराने के बाद भी लोगों की रुचि नहीं लेने से सीटें रिक्त रह जाती हैं। यही कारण है कि इसका फायदा ग्राम प्रधान उठाते हैं। ज्यादातर प्रधान ही अपने मनमुताबिक ग्राम पंचायत सदस्य बनवाते हैं। इसके बाद भ्रष्टाचार के खेल में सभी मिलकर सरकारी धन की बंदरबांट करते हैं। सदस्य को चुनाव लड़ने में मात्र 1000 रुपये का खर्च आता है। इनमें नामांकन फार्म का मूल्य, जमानत राशि आने-जाने का खर्च सब समाहित है। सहायक निर्वाचन अधिकारी पंचस्थानीय डीएस शुक्ला ने कहा कि खाली सीटों को भरने के लिए उप चुनाव कराया जाएगा। पहले ग्राम पंचायत सदस्यों को प्रधानों को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार था। लेकिन 2005 से यह अधिकार मतदाताओं के पास चला गया है। यही कारण है कि ग्राम पंचायत सदस्य पद के प्रति लोगों का रुझान कम रहता है।
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