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गंगा से कटान की भेंट चढ़ी 15सौ बीघे जमीन
Updated Sat, 01 Sep 2018 12:45 AM IST
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सीतामढ़ी। गंगा ने साल दर साल रास्ता बदलकर जिले के कोनिया इलाके के तटवर्ती गांवों का भौगोलिक नक्शा ही बदल दिया है। यह धीरे धीरे ही हुआ है। उफनाई गंगा की लहरों ने तकरीबन पांच दशक में जमीन को रेतीली बना कर हरिहरपुर गांव का जहां भौगोलिक अस्तित्व ही खत्म कर दिया, वहीं छेछुआ और भुर्रा गांवों का रकबा भी तेजी से घट रहा है। अब तक इन दोनों गांवों की 11 सौ बीघे से अधिक जमीन कटान की भेंट चढ़ चुकी है। खास बात यह है कि गंगा की जलधारा के रास्ता बदलने के चलते जिले के इन दोनों गांवों का जितना रकबा गंगा में विलीन होकर कम हो रहा है, उतना ही मिर्जापुर और इलाहाबाद के दो गांवों का रकबा बढ़ रहा है। इससे छेछुआ और भुर्रा गांवों के लोगों की चिंता बढ़ती जा रही है।
तीन तरफ से गंगा से घिरे कोनिया इलाके के बाढ़ प्रभावित गांवों छेछुआ और भुर्रा में बाढ़ हर वर्ष किसानों के लिए अभिशाप बनकर आती है। तकरीबन पांच दशक के इतिहास में सौ-दो बीघे के हिसाब से कट-कटकर खेती की जमीन गंगा में विलीन हो गई। भुर्रा गांव के बुजुर्ग किसान हृदयनारायण सिंह कहते हैं कि गांव का रकबा दस्तावेज में 750 बीघे था। लेकिन, कटान के चलते घट गया। जाहिर है 300 बीघे जमीन कटान की भेंट चढ़ गई। कटान के चलते हृदयनारायण सिंह के अलावा विजय नाथ सिंह, शीतला सिंह, राजेंद्र सिंह, अतर सिंह, गुलाब सिंह, अवधराज सिंह, उदयराज सिंह सहित दर्जनों किसानों की जमीन गंगा की जलधार में विलीन हो गई।
इसी तरह छेछुआ में विनोद सिंह, रामलखन सिंह, जितेंद्र सिंह, झल्लर सिंह, जगदीश सिंह, मनीराज सिंह, कौशल सिंह, राजेश सिंह, रामधनी सिंह, शिवप्रकाश सिंह, पंकज सिंह, सूरज सिंह, कमलनारायण सिंह, गेन बहादुर सिंह, पप्पू सिंह, नागेंद्र सिंह आदि किसानों की 800 बीघे जमीन गंगा की कटान की भेंट चढ़ गई। छेछुआ के ग्राम प्रधान जगदीश सिंह का कहना है कि सरकारी अभिलेखों के मुताबिक तरी और उपरवार मिलाकर छेछुआ गांव का रकबा लगभग 2900 बीघे था। इसमें उपरवार का रकबा 1533 बीघे और तरी का रकबा 1357 बीघे था। लेकिन, कटान के चलते यह तेजी से घट रहा है। गंगा की धारा में परिवर्तन होने से छेछुआ के सामने गंगापार मिर्जापुर जिले के चेहरा गांव और भुर्रा के सामने इलाहाबाद के बामपुर गांव का रकबा बढ़ रहा है। बताया जाता है कि पहले इन्हीं दोनों गांवों की ओर गंगा बहती थी। लेकिन धीरे-धीरे जलप्रवाह रास्ता बदलता गया और गंगा भदोही जिले की ओर शिफ्ट होती गई।
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दो वर्ष पूर्व गंगा में विलीन हुए थे दो मकान
वर्ष 2016 में आई बाढ़ में हरिहरपुर गांव की सीमा में आ रहे दो दलितों का आशियाना कटान के चलते गंगा में विलीन हो गया था। तत्कालीन जिलाधिकारी प्रकाश बिंदु ने दोनों को नया आवास आवंटित कराया।
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तीन तरफ से गंगा से घिरे कोनिया इलाके के बाढ़ प्रभावित गांवों छेछुआ और भुर्रा में बाढ़ हर वर्ष किसानों के लिए अभिशाप बनकर आती है। तकरीबन पांच दशक के इतिहास में सौ-दो बीघे के हिसाब से कट-कटकर खेती की जमीन गंगा में विलीन हो गई। भुर्रा गांव के बुजुर्ग किसान हृदयनारायण सिंह कहते हैं कि गांव का रकबा दस्तावेज में 750 बीघे था। लेकिन, कटान के चलते घट गया। जाहिर है 300 बीघे जमीन कटान की भेंट चढ़ गई। कटान के चलते हृदयनारायण सिंह के अलावा विजय नाथ सिंह, शीतला सिंह, राजेंद्र सिंह, अतर सिंह, गुलाब सिंह, अवधराज सिंह, उदयराज सिंह सहित दर्जनों किसानों की जमीन गंगा की जलधार में विलीन हो गई।
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इसी तरह छेछुआ में विनोद सिंह, रामलखन सिंह, जितेंद्र सिंह, झल्लर सिंह, जगदीश सिंह, मनीराज सिंह, कौशल सिंह, राजेश सिंह, रामधनी सिंह, शिवप्रकाश सिंह, पंकज सिंह, सूरज सिंह, कमलनारायण सिंह, गेन बहादुर सिंह, पप्पू सिंह, नागेंद्र सिंह आदि किसानों की 800 बीघे जमीन गंगा की कटान की भेंट चढ़ गई। छेछुआ के ग्राम प्रधान जगदीश सिंह का कहना है कि सरकारी अभिलेखों के मुताबिक तरी और उपरवार मिलाकर छेछुआ गांव का रकबा लगभग 2900 बीघे था। इसमें उपरवार का रकबा 1533 बीघे और तरी का रकबा 1357 बीघे था। लेकिन, कटान के चलते यह तेजी से घट रहा है। गंगा की धारा में परिवर्तन होने से छेछुआ के सामने गंगापार मिर्जापुर जिले के चेहरा गांव और भुर्रा के सामने इलाहाबाद के बामपुर गांव का रकबा बढ़ रहा है। बताया जाता है कि पहले इन्हीं दोनों गांवों की ओर गंगा बहती थी। लेकिन धीरे-धीरे जलप्रवाह रास्ता बदलता गया और गंगा भदोही जिले की ओर शिफ्ट होती गई।
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दो वर्ष पूर्व गंगा में विलीन हुए थे दो मकान
वर्ष 2016 में आई बाढ़ में हरिहरपुर गांव की सीमा में आ रहे दो दलितों का आशियाना कटान के चलते गंगा में विलीन हो गया था। तत्कालीन जिलाधिकारी प्रकाश बिंदु ने दोनों को नया आवास आवंटित कराया।