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कमाई के चक्कर में चिकित्सक नहीं लिख रहे जेनरिक दवाएं
Updated Wed, 22 Nov 2017 12:58 AM IST
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ज्ञानपुर। चिकित्सकों को जीवन दाता यानी दूसरा भगवान माना जाता है। मगर आज के परिप्रेक्ष्य में यह परिभाषा अप्रासंगिक हो गई है। चिकित्सकों के लिए अब पैसा ही सबकुछ हो गया है। इलाज सेवा न रहकर अब व्यवसाय बन गया है। मरीजों से चिकित्सकों का कोई सरोकार नहीं रह गया है।
सरकार के निर्देश के बाद भी चिकित्सक मरीजों को सस्ती मिलने वाली जेनरिक दवाएं नहीं लिख रहे हैं। महंगी मिलने वाली पेटेंट दवाएं ही लिखी जा रही है। मरीज महंगी दवाएं खरीदने को विवश हैं। जेनरिक दवाएं सस्ती मिलती हैं। इनका मूल्य कम होने से चिकित्सकों को ठीक-ठाक कमीशन नहीं मिल पाता है। इससे डाक्टर इन दवाओं को लिखने कतराते हैं। वहीं पेटेंट दवाएं काफी महंगी मिलती हैं। इन दवाओं में डाक्टरों को मोटा कमीशन मिलता है। इन दवाओं को लिखकर चिकित्सक मोटी कमाई कर रहे हैं। एक ओर जहां महंगी दवा खरीदने से मरीजों की जेबें खाली हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर डाक्टरों की जेबें भर रही हैं। कमाई के चक्कर में सरकारी से लेकर निजी अस्पतालों के चिकित्सक धड़ल्ले से पेटेंट महंगी दवाएं मरीजों को लिख रहे हैं। जेनरिक दवा लिखने से कतरा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों के चिकित्सकों को बाहर की दवा लिखने पर मनाही है, फिर भी धड़ल्ले से बाहर की दवा लिखी जा रही है। कमाई के चक्कर में सरकारी अस्पतालों में दवा की कमी बताकर बाहर की दवा लिखी जा रही है। सरकार ने गरीब मरीजों को ध्यान में रखते हुए चिकित्सकों को सस्ती जेनरिक दवाओं को लिखने का निर्देश दिया है। इस फरमान का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। निजी अस्तपताल गोपीगंज में इलाज करा रहे अजय पांडेय ने कहा कि मुझे जेनरिक और पेटेंट दवा के बारे में कुछ पता ही नहीं है। डाक्टर जो लिखते हैं, वही दवा खरीदता हूं। निजी नर्सिंग होम खमरिया में इलाज करा रहे विजय कुमार ने कहा कि ठीक होने के लिए चिकित्सक की सलाह तो मानना ही पड़ेगा। निजी अस्पताल ज्ञानपुर में इलाज करा रहे आदिनाथ ने कहा कि जेनरिक दवाएं डाक्टर पहले तो लिखते नहीं, लिख भी देते हैं तो दवा की दूकानों पर जल्दी मिलती नहीं है।
जेनरिक दवाएं अभी उपलब्ध नहीं है। इनकी लिस्ट भी नहीं आई है। सरकारी अस्पतालों में दवाओं के लिए टेंडर की प्रक्रिया चल रही है। प्रक्रिया पूरी होने पर इसे प्रभावी किया जाएगा।
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-डा. सतीश सिंह, मुख्य चिकित्साधिकारी, भदोही
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सरकार के निर्देश के बाद भी चिकित्सक मरीजों को सस्ती मिलने वाली जेनरिक दवाएं नहीं लिख रहे हैं। महंगी मिलने वाली पेटेंट दवाएं ही लिखी जा रही है। मरीज महंगी दवाएं खरीदने को विवश हैं। जेनरिक दवाएं सस्ती मिलती हैं। इनका मूल्य कम होने से चिकित्सकों को ठीक-ठाक कमीशन नहीं मिल पाता है। इससे डाक्टर इन दवाओं को लिखने कतराते हैं। वहीं पेटेंट दवाएं काफी महंगी मिलती हैं। इन दवाओं में डाक्टरों को मोटा कमीशन मिलता है। इन दवाओं को लिखकर चिकित्सक मोटी कमाई कर रहे हैं। एक ओर जहां महंगी दवा खरीदने से मरीजों की जेबें खाली हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर डाक्टरों की जेबें भर रही हैं। कमाई के चक्कर में सरकारी से लेकर निजी अस्पतालों के चिकित्सक धड़ल्ले से पेटेंट महंगी दवाएं मरीजों को लिख रहे हैं। जेनरिक दवा लिखने से कतरा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों के चिकित्सकों को बाहर की दवा लिखने पर मनाही है, फिर भी धड़ल्ले से बाहर की दवा लिखी जा रही है। कमाई के चक्कर में सरकारी अस्पतालों में दवा की कमी बताकर बाहर की दवा लिखी जा रही है। सरकार ने गरीब मरीजों को ध्यान में रखते हुए चिकित्सकों को सस्ती जेनरिक दवाओं को लिखने का निर्देश दिया है। इस फरमान का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। निजी अस्तपताल गोपीगंज में इलाज करा रहे अजय पांडेय ने कहा कि मुझे जेनरिक और पेटेंट दवा के बारे में कुछ पता ही नहीं है। डाक्टर जो लिखते हैं, वही दवा खरीदता हूं। निजी नर्सिंग होम खमरिया में इलाज करा रहे विजय कुमार ने कहा कि ठीक होने के लिए चिकित्सक की सलाह तो मानना ही पड़ेगा। निजी अस्पताल ज्ञानपुर में इलाज करा रहे आदिनाथ ने कहा कि जेनरिक दवाएं डाक्टर पहले तो लिखते नहीं, लिख भी देते हैं तो दवा की दूकानों पर जल्दी मिलती नहीं है।
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जेनरिक दवाएं अभी उपलब्ध नहीं है। इनकी लिस्ट भी नहीं आई है। सरकारी अस्पतालों में दवाओं के लिए टेंडर की प्रक्रिया चल रही है। प्रक्रिया पूरी होने पर इसे प्रभावी किया जाएगा।
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-डा. सतीश सिंह, मुख्य चिकित्साधिकारी, भदोही