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ज्ञानपुर में जन्में राम तो अमीरपट्टी में हुआ विवाह
Updated Sun, 24 Sep 2017 12:07 AM IST
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ज्ञानपुर/औराई (भदोही)।
नवरात्र में जगह-जगह चल रही रामलीला मंचन से वातावरण भक्तिमय हो चला है। ज्ञानपुर की रामलीला में रामजन्म का मंचन किया गया तो औराई के अमीरपट्टी की रामलीला में गुरु दीक्षा के प्रसंग का मंचन देख दर्शकों की आंखें अश्रुपूरित हो गईं। रामलीला में बड़ी संख्या में महिला और पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के आदर्शों को सुनने पहुंच रहे हैं।
रामलीला समिति ज्ञानपुर की ओर से केएनपीजी कॉलेज के रामलीला मैदान पर बड़ी संख्या में लोग रामलीला देखने के लिए पहुंच रहे हैं। शुक्रवार की रात कलाकारों ने क्षीर सागर की झांकी, ताड़का वध, रामजन्म, मुनि आगमन का मंचन किया। रामलीला शुरू होने से पूर्व महिलाओं ने प्रभु श्रीराम की आरती की। कलाकारों की बेहतर प्रस्तुति से लोग मंत्रमुग्ध हो गए। इसी तरह, अमीरपट्टी की रामलीला में शुक्रवार को जब गुरुकुल से राम-लक्ष्मण दीक्षा लेकर आते हैं तभी महर्षि विश्वामित्र भी आ जाते हैं। वह राक्षसों से बचने के लिए उन्हें अपने साथ ले जाते हैं। रास्ते में राक्षसी ताड़का का वध श्रीराम करते हैं। कुछ दिन गुजरने के बाद जनकपुर से एक दूत विश्वामित्र को महाराजा जनक का एक पत्र देता है। उसके बाद महर्षि दोनों कुमारों को लेकर जनकपुरी जाते हैं। जहां शिव धनुष तोड़ने के बाद सीता राम की हो जाती हैं। इस दौरान जय श्रीराम के जयकारे से पूरा पंडाल गुंजायमान हो उठा।
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नवरात्र में जगह-जगह चल रही रामलीला मंचन से वातावरण भक्तिमय हो चला है। ज्ञानपुर की रामलीला में रामजन्म का मंचन किया गया तो औराई के अमीरपट्टी की रामलीला में गुरु दीक्षा के प्रसंग का मंचन देख दर्शकों की आंखें अश्रुपूरित हो गईं। रामलीला में बड़ी संख्या में महिला और पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के आदर्शों को सुनने पहुंच रहे हैं।
रामलीला समिति ज्ञानपुर की ओर से केएनपीजी कॉलेज के रामलीला मैदान पर बड़ी संख्या में लोग रामलीला देखने के लिए पहुंच रहे हैं। शुक्रवार की रात कलाकारों ने क्षीर सागर की झांकी, ताड़का वध, रामजन्म, मुनि आगमन का मंचन किया। रामलीला शुरू होने से पूर्व महिलाओं ने प्रभु श्रीराम की आरती की। कलाकारों की बेहतर प्रस्तुति से लोग मंत्रमुग्ध हो गए। इसी तरह, अमीरपट्टी की रामलीला में शुक्रवार को जब गुरुकुल से राम-लक्ष्मण दीक्षा लेकर आते हैं तभी महर्षि विश्वामित्र भी आ जाते हैं। वह राक्षसों से बचने के लिए उन्हें अपने साथ ले जाते हैं। रास्ते में राक्षसी ताड़का का वध श्रीराम करते हैं। कुछ दिन गुजरने के बाद जनकपुर से एक दूत विश्वामित्र को महाराजा जनक का एक पत्र देता है। उसके बाद महर्षि दोनों कुमारों को लेकर जनकपुरी जाते हैं। जहां शिव धनुष तोड़ने के बाद सीता राम की हो जाती हैं। इस दौरान जय श्रीराम के जयकारे से पूरा पंडाल गुंजायमान हो उठा।
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