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मठाधीश बाबूओं पर नहीं चलती स्थानान्तरण नीति
Updated Sun, 06 Aug 2017 12:52 AM IST
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ज्ञानपुर (भदोही)। सूबे में सरकार चाहे जिस पार्टी की हो लेकिन शासन की ओर से जारी होने वाली स्थानांतरण नीति जिले के कुछ मठाधीश बाबुओं पर नहीं चलती। मलाईदार पटलों पर बैठे बाबू स्थानांतरण के बाद किसी तरह उसी पटल पर दुबारा लौट आते हैं। सबसे खास बात यह है कि सुरियावां ब्लॉक के एक लिपिक की ब्लॉक में ढाई दशक से बाबूगिरी चल रही है। जिसका कुछ प्रधानों विरोध भी किया लेकिन सत्ता तक पकड़ होने से उसका कुछ नहीं हो सका। आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना में भी इसका खुलासा हो चुका है।
सरकारी दफ्तरों में एक स्थान पर कई साल से कार्यरत रहने पर कर्मचारियों की एक लॉबी तैयार हो जाती है। प्रभावशाली लोगों से घनिष्ठता होने से दफ्तरों में भ्रष्टाचार से लेकर अन्य गतिविधियां भी तेज हो जाती हैं। सूबे में हर साल स्थानांतरण नीति तय होती है। उसी के आधार पर ऐसे कर्मियों का एक पटल से दूसरे पटल और एक तहसील से दूसरे तहसील में स्थानांतरण किया जाता है लेकिन जिले में विभिन्न दफ्तरों में एक से दो दशक पूर्व से काम कर रहे मठाधीश बाबुओं पर इसका असर नहीं दिख रहा है। दो माह पूर्व कलेक्ट्रेट के तीन बाबुओं का पटल बदल दिया गया था। संबधित बाबुओं ने पटल का कार्यभार ग्रहण न कर दुबारा अपने पसंदीदा पटल पर बहाली पाने में सफलता हासिल कर लिया। कलेक्ट्रेट ही नहीं बेसिक शिक्षा, विकास भवन, स्वास्थ्य विभाग, बिजली विभाग, जल निगम समेत अन्य सरकारी विभागों में कमोबेश यही स्थिति है। मठाधीश बाबुओं की मनमानी किसी एक विभाग में नहीं है। ज्यादातर सरकारी विभागों में पटलों का मोह वह नहीं छोड़ पा रहे हैं। सुरियावां ब्लॉक में तो एक लिपिक गत ढाई दशक से वहीं जमा हुआ है। पिछले दिनों संसारापुर निवासी आरटीआई कार्यकर्ता विभूति नारायण दूबे ने तत्कालीन जिलाधिकारी रणवीर प्रसाद से जिले के सभी विभागों में तैनात कर्मियों का नाम-पता और तैनाती तिथि की जानकारी मांगी थी। इस दौरान 35 विभागों ने जो सूचना दी वह काफी चौंकाने वाली रही। 35 फीसदी से अधिक कर्मी स्थानान्तरण नीति का उल्लंघन करते मिले। कुछ बाबू ऐसे मिले जिनकी 1980 में नियुक्ति हुई वह आज भी उसी पटल पर काम कर रहे हैं। डीएम विशाख जी ने कहा कि यह मामला गंभीर है। ऐसे लोगों को चिह्नित किया जाएगा।
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सरकारी दफ्तरों में एक स्थान पर कई साल से कार्यरत रहने पर कर्मचारियों की एक लॉबी तैयार हो जाती है। प्रभावशाली लोगों से घनिष्ठता होने से दफ्तरों में भ्रष्टाचार से लेकर अन्य गतिविधियां भी तेज हो जाती हैं। सूबे में हर साल स्थानांतरण नीति तय होती है। उसी के आधार पर ऐसे कर्मियों का एक पटल से दूसरे पटल और एक तहसील से दूसरे तहसील में स्थानांतरण किया जाता है लेकिन जिले में विभिन्न दफ्तरों में एक से दो दशक पूर्व से काम कर रहे मठाधीश बाबुओं पर इसका असर नहीं दिख रहा है। दो माह पूर्व कलेक्ट्रेट के तीन बाबुओं का पटल बदल दिया गया था। संबधित बाबुओं ने पटल का कार्यभार ग्रहण न कर दुबारा अपने पसंदीदा पटल पर बहाली पाने में सफलता हासिल कर लिया। कलेक्ट्रेट ही नहीं बेसिक शिक्षा, विकास भवन, स्वास्थ्य विभाग, बिजली विभाग, जल निगम समेत अन्य सरकारी विभागों में कमोबेश यही स्थिति है। मठाधीश बाबुओं की मनमानी किसी एक विभाग में नहीं है। ज्यादातर सरकारी विभागों में पटलों का मोह वह नहीं छोड़ पा रहे हैं। सुरियावां ब्लॉक में तो एक लिपिक गत ढाई दशक से वहीं जमा हुआ है। पिछले दिनों संसारापुर निवासी आरटीआई कार्यकर्ता विभूति नारायण दूबे ने तत्कालीन जिलाधिकारी रणवीर प्रसाद से जिले के सभी विभागों में तैनात कर्मियों का नाम-पता और तैनाती तिथि की जानकारी मांगी थी। इस दौरान 35 विभागों ने जो सूचना दी वह काफी चौंकाने वाली रही। 35 फीसदी से अधिक कर्मी स्थानान्तरण नीति का उल्लंघन करते मिले। कुछ बाबू ऐसे मिले जिनकी 1980 में नियुक्ति हुई वह आज भी उसी पटल पर काम कर रहे हैं। डीएम विशाख जी ने कहा कि यह मामला गंभीर है। ऐसे लोगों को चिह्नित किया जाएगा।
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