फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bhadohi News ›   मद्धिम पड़ी बालश्रम विरोधी नारों की गूंज

मद्धिम पड़ी बालश्रम विरोधी नारों की गूंज

Wed, 15 May 2019 12:23 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 15 May 2019 12:23 AM IST
विज्ञापन
मद्धिम पड़ी बालश्रम विरोधी नारों की गूंज
ज्ञानपुर। तकरीबन सात-आठ साल की पूजा ठीक से अपनी उम्र तक नहीं जानती। पढ़ाई-लिखाई क्या होती है, शायद वह अब तक समझ ही नहीं पाई। स्कूल का मुंह कभी देखा नहीं। होश संभालते ही खानाबदोश जिंदगी की मजबूरियों ने प्लास्टिक बीनने के लिए कूड़े के ढेर पर लाकर पटक दिया। बचपन क्या होता है, इसे शायद वह कभी महसूस नहीं कर सकी। लिहाजा कूड़े के ढेर में ही जिंदगी की तलाश अब नियति बन चली है। बिल्कुल यही कहानी नौ-दस साल के अवधेश की भी है। मां-बाप ने जन्म देने के बाद नाम तो दे दिया, लेकिन इसके अलावा बालपन की कोई और जरूरत पूरी नहीं कर सके।
विज्ञापन

भदोही जिले की मलिन गलियों में कूड़ा बीनते बदकिस्मती के आगे बेबस ये दो मासूम तो बानगी भर हैं। दरअसल ऐसे बच्चों की तादाद यहां हजारों में है, जो पढ़ने लिखने की उम्र में कूड़ा बीनने और होटल-ढाबों पर हाड़तोड़ मेहनत करने को मजबूर हैं। बालश्रम पर अंकुश लगाने का प्रशासनिक दावा जिले में हवा हो गया है। तमाम बच्चे कूड़ा करकट बीन कर घर की आजीविका चलाने को विवश हैं तो सैकड़ों मासूम नाजुक कंधों पर जोखिम उठाकर बचपन की खुशियां कुर्बान कर रहे हैं। हैरत की बात यह है कि श्रम विभाग के पास ऐसे बच्चों का न तो कोई आंकड़ा है न ही कोई योजना। गोपीगंज के फूलबाग में तिरपाल के नीचे ऐसे कुनबे की जिंदगी का गुजर-बसर आसानी से देखा जा सकता है। यहां से ये बच्चे सुबह छह बजे ही पीठ पर बोरी लादकर प्लास्टिक बीनने निकल पड़ते हैं। इस दौरान ये कपड़े और भोजन आदि मांग कर पेट भी भरते हैं। प्लास्टिक बीनकर घर पहुंचते हैं तो मां-बाप उसे बेचकर दो जून का खर्च चलाते हैं। इसी तरह भदोही नगर में स्टेशन के पूरब तरफ और हरियांव में ऐसे बच्चों का कुनबा यायावर जिंदगी बसर करते हुए प्लास्टिक और कूड़ा बीनने का काम करता है। ऐसे बच्चों के लिए जिम्मेदार श्रम विभाग के पास कोई आंकड़ा ही नहीं है। न तो घूमकर कूड़ा बीनने वाले बच्चों की दशा और ना ही होटल-ढाबों और कालीन कारखानों में पसीना बहाने वाले बच्चों की पीड़ा विभाग को दिखाई पड़ती है। यही वजह है कि लगभग एक साल से ऐसे बच्चों के लिए बचाव और पुनर्वासन के लिए विभाग ने कोई अभियान नहीं चलाया। श्रम प्रवर्तन अधिकारी राम निवास कहते हैं कि इधर कुछ महीनों से अभियान नहीं चलाया गया है। हालांकि ऐसे बच्चों के पुनर्वासन और सामान्य जिंदगी के लिए समय-समय पर विभाग प्रयास करता है।
विज्ञापन


ज्ञानपुर। बालहठ के चलते नादानी में घर छोड़कर निकले बच्चे हों या घर का खर्च चलाने के लिए मजबूर हुए मासूम, कालीन कारखानों में ऐसे बच्चों का शोषण जमकर हो रहा है। पिछले वर्ष कुछ बच्चे कालीन कारखाने से किसी तरह भागकर स्टेशन पहुंच गए थे, जिन्हें बाद में पुलिस ने उनके घर पहुंचाया। इसके बाद कारखानों में बाल बंधुआ मजदूरी की एक कड़ी सामने आई, लेकिन उसके बाद विभाग ने उस पर अंकुश लगाने की दिशा में कारगर पहल नहीं की। कार्रवाई के नाम पर केवल वसूली कर फर्ज की इतिश्री कर ली जाती है। अब भी कल-कारखानों में सैकड़ों बच्चे काम कर रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन



ज्ञानपुर। बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के अध्यक्ष डॉ. श्रीवास्तव कहते हैं कि यायावर बच्चों की बदहाली और कारखानों में काम कर रहे बच्चों को लेकर कई बार उच्चाधिकारियों को अवगत कराया गया है। जिलाधिकारी को भी बैठक में अवगत कराया गया था। लेकिन, विभाग की तरफ से कोई रेस्क्यू नहीं किया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed