फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Basti News ›   World Hindi Diwas today

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी को विश्व पटल पर दी पहचान

Sun, 09 Jan 2022 11:39 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 09 Jan 2022 11:39 PM IST
विज्ञापन
World Hindi Diwas today
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी को विश्व पटल पर दी पहचान
विज्ञापन

बस्ती। विश्व हिंदी दिवस पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम लिए बगैर हिंदी साहित्य की चर्चा पूरी नहीं हो सकती। उन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखकर हिंदी भाषा को विश्व पटल पर पहचान दी है। जो आज भी काल निर्धारण एवं पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता देती है। वैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात भी आचार्य ने ही किया।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म चार अक्तूबर 1884 को बस्ती जिले के अगौना गांव में हुआ था। 1908 में नागरी प्रचारिणी सभा के हिंदी कोश के लिए सहायक संपादक के रूप में काशी चले गए। 1919 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अध्यापन करने लगे व 1937 में हिंदी विभागाध्यक्ष बने। वह बीसवीं शताब्दी के हिंदी के प्रमुख साहित्यकार हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर रहते हुए ही 1941 में उनका निधन हो गया। प्रमुख कृतियों में हिंदी साहित्य का इतिहास, हिंदी शब्द सागर, चिंतामणि व नागरी प्रचारिणी पत्रिका अहम हैं।
विज्ञापन

साहित्यिक परिचय
वरिष्ठ साहित्यकार अष्टभुजा शुक्ला बताते हैं कि आचार्य शुक्ल ने हिन्दी निबंध को नया आयाम देकर उसे ठोस धरातल पर प्रतिष्ठित किया। वह हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक, श्रेष्ठ निबंधकार, निष्पक्ष इतिहासकार, महान शैलीकार एवं युग-प्रवर्तक थे। सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों प्रकार की आलोचनाएं लिखीं। उन्होंने हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखकर इतिहास-लेखन की परंपरा का सूत्रपात किया।
विज्ञापन
विज्ञापन

रचनाएं या कृतियां
निबंध संग्रह : चिंतामणि भाग-1 और 2 ‘विचार वीथी’ इतिहास : ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’। 3. आलोचना: ‘सूरदास’, रस मीमांसा’, ‘त्रिवेणी सम्पादन’ ‘जायसी ग्रन्थावली’, ‘तुलसी ग्रन्थावली’ ,‘भ्रमरगीत सार’ हिन्दी शब्द सागर’, ‘काशी नागरी।’
भाषा शैली
आचार्य शुक्ल की भाषा संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध तथा परिमार्जित खड़ी बोली है। परिष्कृत साहित्यिक भाषा में संस्कृत के शब्दों का प्रयोग होने पर भी उसमें बोधगम्यता सर्वत्र विद्यमान है। कहीं-कहीं आवश्यकतानुसार उर्दू, फारसी और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग भी देखने को मिलता है। मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग करके भाषा को अधिक व्यंजनापूर्ण, प्रभावपूर्ण एवं व्यावहारिक बनाने का भरसक प्रयास किया है।

हर क्षेत्र में सर्वग्राह्य भाषा नीति का करना होगा अनुसरण
साहित्यकार अष्टभुजा शुक्ला कहते हैं कि वास्तव में आजादी की ही भांति अपनी भाषा को भी संजोना और संरक्षित करना पड़ता है। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि 1952 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में दास प्रथा के विरुद्ध पं. तुलसीराम ने हिंदी में ‘दरबन का बलवा’ नामक कविता लिखी थी जिसमें हिंदुस्तानियों को ‘हिंदी भाई’ कहा गया है। यह कविता जब्त भी कर ली गई थी। आजादी की लड़ाई में हम अपनी भाषा के साहित्य और देशप्रेम की क्रांतिकारी पत्रकारिता से भी अवगत हैं। यह भी हमारा सौभाग्य है कि हमारे जनपद बस्ती की ऐतिहासिक विभूति आचार्य रामचंद्र शुक्ल की साहित्यिक ख्याति न केवल विश्वस्तरीय है बल्कि तत्कालीन अखबारों में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत का पुरजोर वैचारिक विरोध भी किया। विश्व हिंदी दिवस की यही सार्थकता है कि हम अपनी भाषा को पूरी संवेदना, ईमानदारी और स्वाभिमान के साथ जीने के योग्य बनाएं और हर क्षेत्र में सर्वग्राह्य भाषा नीति का अनुसरण करें।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed