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Basti News: सील हुए थे चिकित्सक विहीन अल्ट्रासाउंड सेंटर, आगे नहीं बढ़ पाई कार्रवाई
Mon, 25 Dec 2023 01:01 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Mon, 25 Dec 2023 01:01 AM IST
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- चोरी छिपे फिर संचालित हो रहे अल्ट्रासाउंड सेंटर,
- डॉक्टर की जगह अयोग्य लोग कर रहे परीक्षण
- सरकारी अस्पतालों में हावी है मरीज माफिया, अंदर से निजी अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर लाए जा रहे मरीज
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। कुछ दिन पहले अवैध ढंग से संचालित अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर अंकुश लगाने की मुहिम छिड़ी थी। मगर यह दिखावा साबित हुआ। जिन चिकित्सक विहीन अल्ट्रासाउंड सेंटरों को सील किया गया था कुछ ही दिनों बाद अधिकांश सेंटर चोरी छिपे फिर संचालित होने लगे। छापेमारी में मानक विहीन पाए गए इन अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाई। विभाग की इस सहूलियत पर मुख्यालय से लेकर ग्रामीण अंचल तक बिना डॉक्टर के ही एक नहीं कई- कई अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालित किए जा रहे हैं।
शहर और ग्रामीण अंचलों में अल्ट्रासाउंड सेंटरों की बाढ़ आ गई है। नवंबर माह के पहले सप्ताह में डीएम के निर्देश पर प्रशासनिक टीम इन पर अंकुश लगाने के लिए सड़कों पर उतरी। एसडीएम के नेतृत्व में तमाम सेंटरों पर छापेमारी की गई। इस दौरान जिले भर में एक दर्जन सेंटर बिना डॉक्टर के ही संचालित पाए गए। इन सेंटरों को ताबड़तोड़ सील कराया गया। प्रशासनिक कार्रवाई से हड़कंप मची तो डॉक्टर विहीन अन्य अल्ट्रासाउंड सेंटर भी बंद कर दिए गए। मगर प्रशासनिक टीम के वापस होते ही स्वास्थ्य महकमा भी चुप्पी साध लिया। इसके बाद स्थिति अनुकूल देख अल्ट्रासाउंड सेंटरों के संचालक फिर अपने धंधे में जुट गए। अब चोरी छिपे सील किए गए अल्ट्रासाउंड सेंटर भी संचालित किए जा रहे हैं। वहीं बिना डॉक्टर के अन्य सेंटर भी खुलने लगे हैं। यहां अयोग्य लोगों द्वारा मरीजों का अल्ट्रासाउंड किया जा रहा है। कंप्यूटराइज्ड जॉच रिपोर्ट में चिकित्सक का हस्ताक्षर स्कैन कर मरीजों को थमा दिया जा रहा है।
तलब किए गए थे डॉक्टर फिर भी नहीं पहुंचे
छापेमारी के दौरान जिन सेंटरों पर चिकित्सक नहीं मिले थे उन्हें बाद में तलब होने के लिए कहा गया था। प्रशासनिक टीम ने पंजीकरण में उल्लिखित चिकित्सकों से स्पष्टीकरण के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया था। बावजूद इसके अधिकांश सेंटरों की ओर से संबंधित डॉक्टरों को पेश नहीं किया गया। इसके लिए स्वास्थ्य महकमा भी इन सेंटरों पर दबाव नहीं बना पाया। नतीजा मामला ठंडे बस्ते में चला गया और संचालक फिर से कारोबार में जुट गए।
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आगे नहीं बढ़ पाई कार्रवाई
जिन सेंटरों की ओर से चिकित्सक नहीं पेश किए जा सके हैं। प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि अकुशल लोगों के बल पर इन सेंटरों को संचालित किया जा रहा है। यानी जॉच के नाम पर मरीजों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। बावजूद इसके डॉक्टर विहीन सेंटरों पर कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई गई। न तो प्राथमिकी दर्ज हुई और न ही सेंटरों पर दर्ज किए गए डॉक्टरों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है।
अस्पतालों में हावी है मरीज माफिया
मरीज माफियाओं का काकस अल्ट्रासाउंड सेंटरों से लेकर सरकारी अस्पतालों तक है। उन्हीं के दम पर अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालित हो रहे हैं। यहां मरीजों को पहुंचाने की जिम्मेदारी मरीज माफियाओं की रहती है। प्रति मरीज उनका कमीशन भी निश्चित है। जिला महिला चिकित्सालय, जिला चिकित्सालय, ओपेक चिकित्सालय से लेकर ग्रामीण अंचल के हर्रैया स्थित महिला चिकित्सालय, मुंडेरवा, रुधौली, सल्टौआ, कप्तानगंज सीएचसी तक मरीज माफियाओं का संजाल बिछा हुआ है। इनके एजेंट अनाधिकृत रूप अस्पताल के भीतर डॉक्टरों के चैंबर तक मौजूद रह रहे हैं। उनके दबाव में चिकित्सक मरीजों को अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दे रहे हैं। इसके तुरंत बाद एजेंट सक्रिय हो जा रहे हैं। वह हमदर्द की भूमिका में आकर मरीज को सेटिंग के अल्ट्रासाउंड सेंटर पर पहुंचा रहे हैं। प्रशासनिक सख्ती के दौरान दो चार दिन यह खेल बंद रहता है इसके बाद फिर शुरू हो जाता है। विभागीय जिम्मेदारों की संलिप्तता के चलते इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।
सरकारी अस्पतालों में नहीं हो रहा अल्ट्रासाउंड
मरीज माफियाओं की विभाग से तगड़ी जुगलबंदी के चलते सरकारी अस्पतालों में मरीजों का अल्ट्रासाउंड नहीं हो पा रहा है। महिला अस्पताल में अल्ट्रासाउंड यूनिट अक्सर बंद मिल रही है। मरीजों को बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी जा रही है। यहां अलग- अलग निजी सेंटरों के दलाल मरीजों को गुमराह कर अपना मतलब सिद्ध कर रहे हैं। यहीं हाल जिला अस्पताल में भी है। अल्ट्रासाउंड न होने से मरीज बाहर आकर निजी सेंटरों पर अल्ट्रासाउंड करा रहे हैं। वहीं ओपेक कैली के अल्ट्रासाउंड यूनिट में अपेक्षा से अधिक भीड़ रहती है। यहां एक से दो दिन नंबर आने में लग रहे हैं। इसलिए मरीज यहां आने से किनारा कस रहे हैं।
बाहर अल्ट्रासाउंड कराने के लिए मजबूर हो रहे मरीज
सरकारी अस्पताल में पहुंचने वाले महिला- पुरुष मरीज बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं। चिकित्सक उनकी बीमारियों का सटीक पता लगाने के लिए जब अल्ट्रासाउंड अनिवार्य बता रहे हैं तो उन्हें सरकारी सेवा के रूप में केवल ओपेक चिकित्सालय कैली का ही विकल्प सुझाया जा रहा है। ऐसे में जिला महिला चिकित्सालय, जिला अस्पताल एवं सीएचसी के मरीज लंबी दूरी तय कर वहां नहीं पहुंच पा रहे हैं। यदि पहुंच भी गए तो नंबर कब आएगा इसका कोई ठिकाना नहीं है। नतीजा विवश होकर मरीज 700 रुपये देकर निजी अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर जॉच करवा रहे हैं। जानकारों की मानें तो सेंटर संचालकों द्वारा इसमें से मरीज माफिया और संबंधित चिकित्सक दोनों का हिस्सा पहुंचाया जाता है।
छापेमारी के दौरान जिन अल्ट्रासाउंड सेंटरो को सील किया गया था उन्हें संचालित करने का आदेश नहीं निर्गत किया गया है। अभी अधिकांश सेंटरों की ओर से स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। अन्य सेंटरों को भी नोटिस देकर ब्योरा मांगा गया था। जवाब नहीं आया है। यदि बिना डॉक्टर के यह सेंटर संचालित किए जा रहे हैं तो फिर से कार्रवाई की जाएगी।
- डाॅ. एके मिश्र, अपर मुख्य चिकित्साधिकारी
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- डॉक्टर की जगह अयोग्य लोग कर रहे परीक्षण
- सरकारी अस्पतालों में हावी है मरीज माफिया, अंदर से निजी अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर लाए जा रहे मरीज
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। कुछ दिन पहले अवैध ढंग से संचालित अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर अंकुश लगाने की मुहिम छिड़ी थी। मगर यह दिखावा साबित हुआ। जिन चिकित्सक विहीन अल्ट्रासाउंड सेंटरों को सील किया गया था कुछ ही दिनों बाद अधिकांश सेंटर चोरी छिपे फिर संचालित होने लगे। छापेमारी में मानक विहीन पाए गए इन अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाई। विभाग की इस सहूलियत पर मुख्यालय से लेकर ग्रामीण अंचल तक बिना डॉक्टर के ही एक नहीं कई- कई अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालित किए जा रहे हैं।
शहर और ग्रामीण अंचलों में अल्ट्रासाउंड सेंटरों की बाढ़ आ गई है। नवंबर माह के पहले सप्ताह में डीएम के निर्देश पर प्रशासनिक टीम इन पर अंकुश लगाने के लिए सड़कों पर उतरी। एसडीएम के नेतृत्व में तमाम सेंटरों पर छापेमारी की गई। इस दौरान जिले भर में एक दर्जन सेंटर बिना डॉक्टर के ही संचालित पाए गए। इन सेंटरों को ताबड़तोड़ सील कराया गया। प्रशासनिक कार्रवाई से हड़कंप मची तो डॉक्टर विहीन अन्य अल्ट्रासाउंड सेंटर भी बंद कर दिए गए। मगर प्रशासनिक टीम के वापस होते ही स्वास्थ्य महकमा भी चुप्पी साध लिया। इसके बाद स्थिति अनुकूल देख अल्ट्रासाउंड सेंटरों के संचालक फिर अपने धंधे में जुट गए। अब चोरी छिपे सील किए गए अल्ट्रासाउंड सेंटर भी संचालित किए जा रहे हैं। वहीं बिना डॉक्टर के अन्य सेंटर भी खुलने लगे हैं। यहां अयोग्य लोगों द्वारा मरीजों का अल्ट्रासाउंड किया जा रहा है। कंप्यूटराइज्ड जॉच रिपोर्ट में चिकित्सक का हस्ताक्षर स्कैन कर मरीजों को थमा दिया जा रहा है।
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तलब किए गए थे डॉक्टर फिर भी नहीं पहुंचे
छापेमारी के दौरान जिन सेंटरों पर चिकित्सक नहीं मिले थे उन्हें बाद में तलब होने के लिए कहा गया था। प्रशासनिक टीम ने पंजीकरण में उल्लिखित चिकित्सकों से स्पष्टीकरण के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया था। बावजूद इसके अधिकांश सेंटरों की ओर से संबंधित डॉक्टरों को पेश नहीं किया गया। इसके लिए स्वास्थ्य महकमा भी इन सेंटरों पर दबाव नहीं बना पाया। नतीजा मामला ठंडे बस्ते में चला गया और संचालक फिर से कारोबार में जुट गए।
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आगे नहीं बढ़ पाई कार्रवाई
जिन सेंटरों की ओर से चिकित्सक नहीं पेश किए जा सके हैं। प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि अकुशल लोगों के बल पर इन सेंटरों को संचालित किया जा रहा है। यानी जॉच के नाम पर मरीजों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। बावजूद इसके डॉक्टर विहीन सेंटरों पर कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई गई। न तो प्राथमिकी दर्ज हुई और न ही सेंटरों पर दर्ज किए गए डॉक्टरों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है।
अस्पतालों में हावी है मरीज माफिया
मरीज माफियाओं का काकस अल्ट्रासाउंड सेंटरों से लेकर सरकारी अस्पतालों तक है। उन्हीं के दम पर अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालित हो रहे हैं। यहां मरीजों को पहुंचाने की जिम्मेदारी मरीज माफियाओं की रहती है। प्रति मरीज उनका कमीशन भी निश्चित है। जिला महिला चिकित्सालय, जिला चिकित्सालय, ओपेक चिकित्सालय से लेकर ग्रामीण अंचल के हर्रैया स्थित महिला चिकित्सालय, मुंडेरवा, रुधौली, सल्टौआ, कप्तानगंज सीएचसी तक मरीज माफियाओं का संजाल बिछा हुआ है। इनके एजेंट अनाधिकृत रूप अस्पताल के भीतर डॉक्टरों के चैंबर तक मौजूद रह रहे हैं। उनके दबाव में चिकित्सक मरीजों को अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दे रहे हैं। इसके तुरंत बाद एजेंट सक्रिय हो जा रहे हैं। वह हमदर्द की भूमिका में आकर मरीज को सेटिंग के अल्ट्रासाउंड सेंटर पर पहुंचा रहे हैं। प्रशासनिक सख्ती के दौरान दो चार दिन यह खेल बंद रहता है इसके बाद फिर शुरू हो जाता है। विभागीय जिम्मेदारों की संलिप्तता के चलते इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।
सरकारी अस्पतालों में नहीं हो रहा अल्ट्रासाउंड
मरीज माफियाओं की विभाग से तगड़ी जुगलबंदी के चलते सरकारी अस्पतालों में मरीजों का अल्ट्रासाउंड नहीं हो पा रहा है। महिला अस्पताल में अल्ट्रासाउंड यूनिट अक्सर बंद मिल रही है। मरीजों को बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी जा रही है। यहां अलग- अलग निजी सेंटरों के दलाल मरीजों को गुमराह कर अपना मतलब सिद्ध कर रहे हैं। यहीं हाल जिला अस्पताल में भी है। अल्ट्रासाउंड न होने से मरीज बाहर आकर निजी सेंटरों पर अल्ट्रासाउंड करा रहे हैं। वहीं ओपेक कैली के अल्ट्रासाउंड यूनिट में अपेक्षा से अधिक भीड़ रहती है। यहां एक से दो दिन नंबर आने में लग रहे हैं। इसलिए मरीज यहां आने से किनारा कस रहे हैं।
बाहर अल्ट्रासाउंड कराने के लिए मजबूर हो रहे मरीज
सरकारी अस्पताल में पहुंचने वाले महिला- पुरुष मरीज बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं। चिकित्सक उनकी बीमारियों का सटीक पता लगाने के लिए जब अल्ट्रासाउंड अनिवार्य बता रहे हैं तो उन्हें सरकारी सेवा के रूप में केवल ओपेक चिकित्सालय कैली का ही विकल्प सुझाया जा रहा है। ऐसे में जिला महिला चिकित्सालय, जिला अस्पताल एवं सीएचसी के मरीज लंबी दूरी तय कर वहां नहीं पहुंच पा रहे हैं। यदि पहुंच भी गए तो नंबर कब आएगा इसका कोई ठिकाना नहीं है। नतीजा विवश होकर मरीज 700 रुपये देकर निजी अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर जॉच करवा रहे हैं। जानकारों की मानें तो सेंटर संचालकों द्वारा इसमें से मरीज माफिया और संबंधित चिकित्सक दोनों का हिस्सा पहुंचाया जाता है।
छापेमारी के दौरान जिन अल्ट्रासाउंड सेंटरो को सील किया गया था उन्हें संचालित करने का आदेश नहीं निर्गत किया गया है। अभी अधिकांश सेंटरों की ओर से स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। अन्य सेंटरों को भी नोटिस देकर ब्योरा मांगा गया था। जवाब नहीं आया है। यदि बिना डॉक्टर के यह सेंटर संचालित किए जा रहे हैं तो फिर से कार्रवाई की जाएगी।
- डाॅ. एके मिश्र, अपर मुख्य चिकित्साधिकारी