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यूक्रेन में सात दिन मौत के साए में गुजार वतन पहुंची सुरभि
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यूक्रेन में सात दिन मौत के साए में गुजार वतन पहुंची सुरभि
कप्तानगंज (बस्ती )। यूक्रेन के उर्सग्रोथ जगरपातिया मेडिकल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस की तीसरे वर्ष की छात्रा सुरभि वर्मा बृहस्पतिवार को अपने गोटवा स्थित घर पहुंच गईं। परिवार के लोगों ने उन्हें गले से लगा लिया। सुरभि बताती हैं कि यूक्रेन में 24 फरवरी से सात दिनों तक दिन व रात मौत का साया सिर पर मंडरा रहा था, क्योंकि जिस स्थान पर रह रही थीं उससे कुछ ही दूरी पर लगातार युद्धक विमानों की गड़गड़ाहट व बम धमाके गूंज रहे थे। जिसकी आवाज कलेजे को कंपा देती थी, मगर अब अपने वतन लौट आए हैं।
गोटवा के प्रख्यात चिकित्सक डॉ. वीके वर्मा की पुत्री सुरभि ने बताया कि युद्ध की जानकारी के बाद उसने 24 फरवरी को ही फ्लाइट का टिकट बुक करा लिया, मगर जब वह हास्टल से निकलकर एयरपोर्ट के लिए चली तो पता चला कि सारी फ्लाइट निरस्त हो गई है। इसके बाद वहां से हमें दूतावास के निकट एक बेसमेंट में रखा गया, मगर यहां खाने के लिए दिक्कत हो रही थी। इसके बाद वहां से निकल हम लोग फिर से हास्टल पहुंचे, जहां बार्डन ने बस से हंगरी सीमा पर भेज दिया। यहां तक का 28 मिनट का सफर 28 घंटे में पूरा हुआ। इस दौरान जिंदगी और मौत से जूझते रहे, क्योंकि लगातार सायरन बजता रहा और बमबारी भी होती रही। पहली मार्च को हम हंगरी सीमा के रास्ते वहां पहुंच गए, जहां पूरी सुविधा मुहैया थी। वहीं के दूतावास ने दिल्ली आने की व्यवस्था की। बताती हैं कि सप्ताह भर बिना खाए पीए बीता, मगर हंगरी पहुंचने के बाद राहत मिल गई। यहीं से फ्लाइट से हमें दो मार्च की सुबह दिल्ली अपने वतन पहुंच गई। सुरभि के घर पहुंचने पर परिजन खुशी से झूम उठे।। पिता डॉ. वीके वर्मा, मां राजेश्वरी वर्मा, भाभी चंदा वर्मा, मौसी रेखा वर्मा, भाई डॉ. आलोक वर्मा ने कहा कि भगवान का शुक्र है कि हमें वापस मेरी बेटी मिल गई ।
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कप्तानगंज (बस्ती )। यूक्रेन के उर्सग्रोथ जगरपातिया मेडिकल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस की तीसरे वर्ष की छात्रा सुरभि वर्मा बृहस्पतिवार को अपने गोटवा स्थित घर पहुंच गईं। परिवार के लोगों ने उन्हें गले से लगा लिया। सुरभि बताती हैं कि यूक्रेन में 24 फरवरी से सात दिनों तक दिन व रात मौत का साया सिर पर मंडरा रहा था, क्योंकि जिस स्थान पर रह रही थीं उससे कुछ ही दूरी पर लगातार युद्धक विमानों की गड़गड़ाहट व बम धमाके गूंज रहे थे। जिसकी आवाज कलेजे को कंपा देती थी, मगर अब अपने वतन लौट आए हैं।
गोटवा के प्रख्यात चिकित्सक डॉ. वीके वर्मा की पुत्री सुरभि ने बताया कि युद्ध की जानकारी के बाद उसने 24 फरवरी को ही फ्लाइट का टिकट बुक करा लिया, मगर जब वह हास्टल से निकलकर एयरपोर्ट के लिए चली तो पता चला कि सारी फ्लाइट निरस्त हो गई है। इसके बाद वहां से हमें दूतावास के निकट एक बेसमेंट में रखा गया, मगर यहां खाने के लिए दिक्कत हो रही थी। इसके बाद वहां से निकल हम लोग फिर से हास्टल पहुंचे, जहां बार्डन ने बस से हंगरी सीमा पर भेज दिया। यहां तक का 28 मिनट का सफर 28 घंटे में पूरा हुआ। इस दौरान जिंदगी और मौत से जूझते रहे, क्योंकि लगातार सायरन बजता रहा और बमबारी भी होती रही। पहली मार्च को हम हंगरी सीमा के रास्ते वहां पहुंच गए, जहां पूरी सुविधा मुहैया थी। वहीं के दूतावास ने दिल्ली आने की व्यवस्था की। बताती हैं कि सप्ताह भर बिना खाए पीए बीता, मगर हंगरी पहुंचने के बाद राहत मिल गई। यहीं से फ्लाइट से हमें दो मार्च की सुबह दिल्ली अपने वतन पहुंच गई। सुरभि के घर पहुंचने पर परिजन खुशी से झूम उठे।। पिता डॉ. वीके वर्मा, मां राजेश्वरी वर्मा, भाभी चंदा वर्मा, मौसी रेखा वर्मा, भाई डॉ. आलोक वर्मा ने कहा कि भगवान का शुक्र है कि हमें वापस मेरी बेटी मिल गई ।
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