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ई-कचरा निस्तारण : बीमारी को बुलावा, शासन तक पहुंची शिकायत
Tue, 27 Feb 2024 01:33 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Tue, 27 Feb 2024 01:33 AM IST
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प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने शासन को संदर्भित किया पत्र
लाइसेंस जारी करने वाली अथाॅरिटी करेगी कार्रवाई : आरओ
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। भानपुर तहसील क्षेत्र के नौवा गांव में ई-कचरा निस्तारण संयंत्र स्थापित न होने का मामला शासन तक पहुंच गया है। इस मामले में लाइसेंस लेने के बाद अब तक न तो कोई यूनिट स्थापित की गई न तो प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने लाइसेंसी पर कोई कार्रवाई की है। मामले में केवल नोटिस की औपचारिकता निभा विभाग चुप्पी साध गया है। इधर एक स्वयंसेवी संस्था ने शासन तक मामले की शिकायत कर दी है। क्षेत्रीय अधिकारी प्रदूषण नियंत्रण टीएन सिंह ने कहा कि इस मामले में नोटिस देकर शासन को मामले में संदर्भित कर दिया गया है।
डॉक्टरों की मानें तो ई- कचरों में 1000 से अधिक जहरीले पदार्थ होते हैं, जो मिट्टी और भोजन को दूषित करते हैं। इन जहरीले पदार्थ में से लेड गैस के उत्सर्जन से सिर दर्द, सनसनी का एहसास, ब्लड प्रेशर, जैसी बीमारी जन्म लेती है। कैडमियम गैस का उत्सर्जन फेफड़ों के कैंसर का एजेंट होता है। बेरिलियम गैस से त्वचा में जलन, लेड ऑक्साइड गैस से एनीमिया, पेट दर्द, मरकरी गैस के उत्सर्जन से नींद ना आना, शरीर के अंगों में कंपन, दिमाग की खराबी, ब्रोमीन और सल्फर गैसों के उत्सर्जन से सांस लेने में दिक्कत, वायु मार्ग में जकड़न, लो बीपी, गुर्दे की खराबी, मस्तिष्क की क्षति जैसी बीमारियां जन्म लेती हैं।
अखिल भारतीय स्तर पर काम करने वाली इंदिरा चैरिटेबल सोसाइटी ने जिले में ई-कचरा प्रबंधन के लिए शासन व मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। पर्यावरण मंत्री से भी एनजीओ के सीईओ अजय पांडेय ने मुलाकात कर उन्हें पत्र दिया है। अजय ने कहा है कि मंत्री से आश्वासन दिया है कि लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने के लिए उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करने के लिए ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम 2022 की अनुसूची- 5 के तहत इसके जिम्मेदार अनुज्ञापी पर कार्रवाई की जाएगी।
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कोट
जब ई-कचरे को लैंडफिल कर दिया जाता है तो उनका रीसाइक्लिंग नहीं होता है। इनमें पाई जाने वाली भारी धातुएं जैसे लिथियम, शीशा, बेरियम फिर पृथ्वी के माध्यम से तालाबों, झरनों और नदियों तक पहुंच जाती हैं। इससे भूजल में नाइट्रोजन, फास्फोरस पोटाश, पीएच स्तर उच्च होने के कारण मानव और पशु स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
डॉ. रजत पांडेय, असिस्टेंट प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग मेडिकल कॉलेज
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लाइसेंस जारी करने वाली अथाॅरिटी करेगी कार्रवाई : आरओ
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। भानपुर तहसील क्षेत्र के नौवा गांव में ई-कचरा निस्तारण संयंत्र स्थापित न होने का मामला शासन तक पहुंच गया है। इस मामले में लाइसेंस लेने के बाद अब तक न तो कोई यूनिट स्थापित की गई न तो प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने लाइसेंसी पर कोई कार्रवाई की है। मामले में केवल नोटिस की औपचारिकता निभा विभाग चुप्पी साध गया है। इधर एक स्वयंसेवी संस्था ने शासन तक मामले की शिकायत कर दी है। क्षेत्रीय अधिकारी प्रदूषण नियंत्रण टीएन सिंह ने कहा कि इस मामले में नोटिस देकर शासन को मामले में संदर्भित कर दिया गया है।
डॉक्टरों की मानें तो ई- कचरों में 1000 से अधिक जहरीले पदार्थ होते हैं, जो मिट्टी और भोजन को दूषित करते हैं। इन जहरीले पदार्थ में से लेड गैस के उत्सर्जन से सिर दर्द, सनसनी का एहसास, ब्लड प्रेशर, जैसी बीमारी जन्म लेती है। कैडमियम गैस का उत्सर्जन फेफड़ों के कैंसर का एजेंट होता है। बेरिलियम गैस से त्वचा में जलन, लेड ऑक्साइड गैस से एनीमिया, पेट दर्द, मरकरी गैस के उत्सर्जन से नींद ना आना, शरीर के अंगों में कंपन, दिमाग की खराबी, ब्रोमीन और सल्फर गैसों के उत्सर्जन से सांस लेने में दिक्कत, वायु मार्ग में जकड़न, लो बीपी, गुर्दे की खराबी, मस्तिष्क की क्षति जैसी बीमारियां जन्म लेती हैं।
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अखिल भारतीय स्तर पर काम करने वाली इंदिरा चैरिटेबल सोसाइटी ने जिले में ई-कचरा प्रबंधन के लिए शासन व मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। पर्यावरण मंत्री से भी एनजीओ के सीईओ अजय पांडेय ने मुलाकात कर उन्हें पत्र दिया है। अजय ने कहा है कि मंत्री से आश्वासन दिया है कि लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने के लिए उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करने के लिए ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम 2022 की अनुसूची- 5 के तहत इसके जिम्मेदार अनुज्ञापी पर कार्रवाई की जाएगी।
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कोट
जब ई-कचरे को लैंडफिल कर दिया जाता है तो उनका रीसाइक्लिंग नहीं होता है। इनमें पाई जाने वाली भारी धातुएं जैसे लिथियम, शीशा, बेरियम फिर पृथ्वी के माध्यम से तालाबों, झरनों और नदियों तक पहुंच जाती हैं। इससे भूजल में नाइट्रोजन, फास्फोरस पोटाश, पीएच स्तर उच्च होने के कारण मानव और पशु स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
डॉ. रजत पांडेय, असिस्टेंट प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग मेडिकल कॉलेज