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Basti News: बिक गया बस्ती शुगर मिल का मलबा.. किसानों, श्रमिकों को मिलेगा बकाया भुगतान
Tue, 10 Oct 2023 12:35 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Tue, 10 Oct 2023 12:35 AM IST
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बस्ती। आजादी के पहले जनपद में उद्योग क्रांति की नींव रखने वाले नारंग साहब की निशानी अब बिल्कुल खत्म होने वाली है। 84 वर्ष की उम्र में उनकी बस्ती चीनी मिल वर्ष 2013 में बंद हो गई थी। तभी से यहां वीरानी छाई हुई है। अब 94 वर्ष की अवस्था में इस फैक्ट्री के कल-पुर्जों का अवशेष भी नहीं दिखाई देगा। जिला प्रशासन की अनुमति से प्रबंधन ने फैक्ट्री के मलबे को 35 लाख में रायपुर के व्यापारी से बेच दिया है। इस रकम से किसानों और श्रमिकों के बकाये का भुगतान होगा।
जिले में नारंग ग्रुप की दो चीनी मिले स्थापित हुई थी। पहला बस्ती चीनी मिल और दूसरा वाल्टरगंज चीनी मिल रहा। वर्ष 2005 में बजाज ग्रुप की फेनिल शुगर लिमिटेड ने इन दोनों मिलों को खरीद लिया था। मगर कुछ सालों के बाद इन मिलों को एक-एक कर बंद कर दिया गया। बस्ती चीनी मिल 2013 में और वाल्टरगंज चीनी मिल 2018 में बंद हो गई। दोनों मिलों पर किसानों और श्रमिकों का बकाया भुगतान तभी से लंबित है। इसको लेकर पहले मिल चालू करने के लिए बाद में भुगतान को लेकर अनवरत आंदोलन चलाया जा रहा है। एक ही ग्रुप की दोनों चीनी मिलें होने के कारण प्रबंधन पर संयुक्त रूप से बकाया का बोझ है। जिला प्रशासन की ओर से मिल प्रबंधन पर भुगतान के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा है। गन्ना आयुक्त कार्यालय से किसानों के और श्रमायुक्त कार्यालय से श्रमिकों के बकाया भुगतान के लिए दो साल पहले ही आरसी जारी की जा चुकी है। वर्तमान सत्र में जिला प्रशासन ने कई किश्तों में साढ़े तीन करोड़ का भुगतान भी सुनिश्चित कराया है। बावजूद इसके दोनों मिलों के किसानों का 42.5 करोड़ रुपये और श्रमिकों का 12 करोड़ रुपये मिलाकर 54.5 करोड़ रुपये बकाया है। इसके भुगतान का विकल्प अब निकल पाया है। बस्ती चीनी नीलाम होने के बाद मलबे का सौदा हो चुका है। रायपुर(छत्तीसगढ़) के व्यापारी ने 35 करोड़ में चीनी मिल के मलबे की खरीदारी की है।
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60 हजार क्विंटल प्रतिदिन थी पेराई की क्षमता
बस्ती एवं वाल्टरगंज चीनी मिल के पहले मालिक जिले में नारंग साहब के नाम से मशहूर थे। उन्होंने बस्ती चीनी मिल की स्थापना 1929 में और दस किलोमीटर की दूरी पर वाल्टरगंज में 1932 में दूसरी चीनी मिल की स्थापना की थी। दोनों मिलों की पेराई क्षमता समान थी। प्रत्येक मिल प्रतिदिन 60 हजार क्विंटल गन्ने की पेराई कर रही थी। यहां तैयार होने वाली मोटे दाने की दुधिया रंग की चमकती चीनी कई प्रांतों में मशहूर थी।
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श्रमिक और किसान कर रहे विरोध
मलबा निकालने पहुंचे व्यापारी और उनके स्टॉफ को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। सोमवार को स्क्रैप की नीलामी लेने वाले व्यापारी कलेक्ट्रेट पहुंचे। डीएम से मिलकर शिकायत की गई कि स्थानीय लोग मिल में नहीं घुसने दे रहे हैं। वहीं श्रमिक एवं किसान नेताओं का कहना है कि पहले उनका भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा। तभी मिल का मलबा हटने दिया जाएगा।
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डीएम बोले- शुरू हो गई है भुगतान की तैयारी
डीएम अंद्रा वामसी ने कहा कि स्क्रैप नीलामी से मिलने वाले धन से दोनों मिलों के किसानों और श्रमिकों के भुगतान की तैयारी शुरू कर दी गई है। जल्द ही किसानों और श्रमिकों से बात करके भुगतान की रूपरेखा तय की जाएगी। तीन महीने के भीतर भुगतान करा दिया जाएगा। हालांकि स्क्रैप नीलामी से मिलने वाला धन कम है। इस पर डीएम ने कहा कि आगे जमीन की नीलामी एवं अन्य प्रक्रिया अपनाई जाएगी। जहां तक विरोध की बात है तो इस समस्या का भी हल निकाला जाएगा। कानून व्यवस्था से खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा।
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जिले में नारंग ग्रुप की दो चीनी मिले स्थापित हुई थी। पहला बस्ती चीनी मिल और दूसरा वाल्टरगंज चीनी मिल रहा। वर्ष 2005 में बजाज ग्रुप की फेनिल शुगर लिमिटेड ने इन दोनों मिलों को खरीद लिया था। मगर कुछ सालों के बाद इन मिलों को एक-एक कर बंद कर दिया गया। बस्ती चीनी मिल 2013 में और वाल्टरगंज चीनी मिल 2018 में बंद हो गई। दोनों मिलों पर किसानों और श्रमिकों का बकाया भुगतान तभी से लंबित है। इसको लेकर पहले मिल चालू करने के लिए बाद में भुगतान को लेकर अनवरत आंदोलन चलाया जा रहा है। एक ही ग्रुप की दोनों चीनी मिलें होने के कारण प्रबंधन पर संयुक्त रूप से बकाया का बोझ है। जिला प्रशासन की ओर से मिल प्रबंधन पर भुगतान के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा है। गन्ना आयुक्त कार्यालय से किसानों के और श्रमायुक्त कार्यालय से श्रमिकों के बकाया भुगतान के लिए दो साल पहले ही आरसी जारी की जा चुकी है। वर्तमान सत्र में जिला प्रशासन ने कई किश्तों में साढ़े तीन करोड़ का भुगतान भी सुनिश्चित कराया है। बावजूद इसके दोनों मिलों के किसानों का 42.5 करोड़ रुपये और श्रमिकों का 12 करोड़ रुपये मिलाकर 54.5 करोड़ रुपये बकाया है। इसके भुगतान का विकल्प अब निकल पाया है। बस्ती चीनी नीलाम होने के बाद मलबे का सौदा हो चुका है। रायपुर(छत्तीसगढ़) के व्यापारी ने 35 करोड़ में चीनी मिल के मलबे की खरीदारी की है।
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60 हजार क्विंटल प्रतिदिन थी पेराई की क्षमता
बस्ती एवं वाल्टरगंज चीनी मिल के पहले मालिक जिले में नारंग साहब के नाम से मशहूर थे। उन्होंने बस्ती चीनी मिल की स्थापना 1929 में और दस किलोमीटर की दूरी पर वाल्टरगंज में 1932 में दूसरी चीनी मिल की स्थापना की थी। दोनों मिलों की पेराई क्षमता समान थी। प्रत्येक मिल प्रतिदिन 60 हजार क्विंटल गन्ने की पेराई कर रही थी। यहां तैयार होने वाली मोटे दाने की दुधिया रंग की चमकती चीनी कई प्रांतों में मशहूर थी।
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श्रमिक और किसान कर रहे विरोध
मलबा निकालने पहुंचे व्यापारी और उनके स्टॉफ को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। सोमवार को स्क्रैप की नीलामी लेने वाले व्यापारी कलेक्ट्रेट पहुंचे। डीएम से मिलकर शिकायत की गई कि स्थानीय लोग मिल में नहीं घुसने दे रहे हैं। वहीं श्रमिक एवं किसान नेताओं का कहना है कि पहले उनका भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा। तभी मिल का मलबा हटने दिया जाएगा।
डीएम बोले- शुरू हो गई है भुगतान की तैयारी
डीएम अंद्रा वामसी ने कहा कि स्क्रैप नीलामी से मिलने वाले धन से दोनों मिलों के किसानों और श्रमिकों के भुगतान की तैयारी शुरू कर दी गई है। जल्द ही किसानों और श्रमिकों से बात करके भुगतान की रूपरेखा तय की जाएगी। तीन महीने के भीतर भुगतान करा दिया जाएगा। हालांकि स्क्रैप नीलामी से मिलने वाला धन कम है। इस पर डीएम ने कहा कि आगे जमीन की नीलामी एवं अन्य प्रक्रिया अपनाई जाएगी। जहां तक विरोध की बात है तो इस समस्या का भी हल निकाला जाएगा। कानून व्यवस्था से खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा।