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2017 में पहली बार जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर खिला कमल
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2017 में विधानसभा चुनाव के नतीजे ऐतिहासिक थे। तब जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। वहीं, 2012 के चुनाव में तीन सीट बसपा के खाते में गई थी, जबकि एक सीट सपा और कांग्रेस के खाते में गई थी। ऐसे में भाजपा के सामने इस बार के चुनाव में 17 के नतीजों को दोहराने की चुनौती है तो अन्य दलों के सामने उससे भी बड़ी चुनौती परंपरागत सीटों पर काबिज होने की है।
सदर विधानसभा सीट : बसपा को हराकर भाजपा ने किया कब्जा
1993 के विधानसभा चुनाव में यहां से विधायक कांग्रेस के जगदंबिका पाल हुए थे। उन्होंने राम लहर के दौरान भाजपा के दादा विजयसेन सिंह को हराकर विधान परिषद से विधानसभा का रुख किया था। 1996 में बसपा के प्रत्याशी दयाराम चौधरी को 3165 वोटों से पराजित किया था। 2002 में तीसरी बार जगदंबिका पाल ने भाजपा प्रत्याशी जीतेंद्र उर्फ नंदू चौधरी को हराया और हैट्रिक लगाकर कर सीट पर कब्जा जमाया। 2007 में जगदंबिका पाल को बसपा के जीतेंद्र उर्फ नंदू चौधरी ने शिकस्त दी। 2012 में फिर नंदू चौधरी ने बसपा के टिकट पर जगदंबिका पाल के बेटे अभिषेक पाल को हराकर इस सीट पर अपना कब्जा जमा लिया। लेकिन, 2017 के चुनाव में भाजपा के दयाराम चौधरी ने इस सीट पर जीत दर्ज की।
हर्रैया विधानसभा सीट : सपा के गढ़ में खिला कमल
हर्रैया विधानसभा सीट से 1993 में यहां से भाजपा ने बाजी मारी थी। तब जगदंबा सिंह को विधायक बने थे। 1996 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का खाता खोलकर सुखपाल पांडेय विधायक बने। उसके बाद 2002 में हुए चुनाव के दौरान बसपा से ही राजकिशोर सिंह ने विधानसभा पहुंचे। 2007 में राजकिशोर सिंह ने सपा में शामिल होकर विधायकी हासिल की। 2012 में राजकिशोर दोबारा सपा के टिकट पर हैट्रिक लगाने में कामयाब हुए। लेकिन 2017 में अजय सिंह ने भाजपा का भगवा लहराया तो राजकिशोर सिंह को पराजित होना पड़ गया।
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कप्तानगंज विधानसभा सीट : धुरंधर रामप्रसाद चौधरी को मिली हार
सियासत में लंबी पारी खेल चुके रामप्रसाद चौधरी को उनके ही गढ़ में हार मिली। अतीत पर नजर डालें तो 1989 और 1991 के विधानसभा चुनाव में लगातार दो बार जीत हासिल कर निर्दलीय विधायक राना कृष्ण किंकर सिंह ने जीत का सेहरा अपने सिर पर बांधा था। 1993 में यहां से सपा प्रत्याशी राम प्रसाद चौधरी ने भाजपा के शीतला सिंह को पराजित किया। 1996 के चुनाव में दोबारा राम प्रसाद चौधरी ने बसपा में शामिल होकर जीते। यही नहीं 2002 के विधानसभा चुनाव में राम प्रसाद चौधरी ने कमल का फूल थामकर हैट्रिक भी लगाई। जीत का सिलसिला चला तो 2007 और 2012 के चुनाव में भी राम प्रसाद चौधरी ने जीत हासिल कर लगातार पांच बार विधायक होने का रिकार्ड बना लिया। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का झंडा लेकर उतरे सीए चंद्रप्रकाश शुक्ल ने सभी दिग्गजों को मात दे दिया।
रुधौली विधानसभा सीट : पहली बार जीती भाजपा
यहां से 2017 में पहली बार भाजपा का कमल खिला। 1993 में रुधौली विधानसभा (तत्कालीन रामनगर) से सपा प्रत्याशी बाबूराम वर्मा विधायक हुए 1996 में बहुजन समाज पार्टी के राम ललित चौधरी ने बाजी मार लिया। 2002 में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अनूप पांडेय ने विधानसभा का चौखट लांघा तो 2007 में बसपा उम्मीदवार राजेंद्र चौधरी ने हाथी पर सवार होकर बाजी अपने हाथ कर लिया। 2012 के चुनाव में जब रामनगर से रुधौली नामांतरण हुआ तो इंडियन नेशनल कांग्रेस से संजय प्रताप जायसवाल ने तकरीबन पांच हजार वोटों से जीत हासिल की। 2017 के चुनाव में कांग्रेस से हाथ छुड़ाकर भाजपा का दामन थामा और 20 हजार से अधिक वोटों से राजेंद्र प्रसाद चौधरी को पराजित किया।
महादेवा विधानसभा सीट : दूसरी बार जीती भाजपा
यहां से 1991 के बाद 2017 में भाजपा को दूसरी बार जीत मिली। सीट के इतिहास पर गौर करें तो 1951 में यह सीट बस्ती इस्ट के नाम से जानी जाती थी। यहां से पहली बार इंडियन नेशनल कांग्रेस से आसमान सिंह विधायक चुने गए। 1957 में कांग्रेस के कृपाशंकर, 1962 में इसी पार्टी के विष्णुप्रताप सिंह, 1967 में एसडब्ल्यूए से बी लाल, 1969 में इंडियन नेशनल कांग्रेस से गंगा प्रसाद, 1974 में इसी पार्टी से सोहन लाल धुसिया, 1977 में जेएनपी से गिरधारी लाल, 1980 में इंडियन नेशनल कांग्रेस से रामअवध, 1985 में इसी आईएनसी से राम जियावन, 1989 में जनता दल से राम करन आर्य, 1991 में भाजपा से वेदप्रकाश, 1993 में सपा से रामकरन आर्य, 1996 में बसपा से वेदप्रकाश, 2002 में सपा से रामकरन आर्य, 2007 में बसपा से दूधराम, 2012 में सपा से रामकरन आर्य और 2017 में भाजपा से रवि सोनकर विधायक चुने गए हैं।
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सदर विधानसभा सीट : बसपा को हराकर भाजपा ने किया कब्जा
1993 के विधानसभा चुनाव में यहां से विधायक कांग्रेस के जगदंबिका पाल हुए थे। उन्होंने राम लहर के दौरान भाजपा के दादा विजयसेन सिंह को हराकर विधान परिषद से विधानसभा का रुख किया था। 1996 में बसपा के प्रत्याशी दयाराम चौधरी को 3165 वोटों से पराजित किया था। 2002 में तीसरी बार जगदंबिका पाल ने भाजपा प्रत्याशी जीतेंद्र उर्फ नंदू चौधरी को हराया और हैट्रिक लगाकर कर सीट पर कब्जा जमाया। 2007 में जगदंबिका पाल को बसपा के जीतेंद्र उर्फ नंदू चौधरी ने शिकस्त दी। 2012 में फिर नंदू चौधरी ने बसपा के टिकट पर जगदंबिका पाल के बेटे अभिषेक पाल को हराकर इस सीट पर अपना कब्जा जमा लिया। लेकिन, 2017 के चुनाव में भाजपा के दयाराम चौधरी ने इस सीट पर जीत दर्ज की।
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हर्रैया विधानसभा सीट : सपा के गढ़ में खिला कमल
हर्रैया विधानसभा सीट से 1993 में यहां से भाजपा ने बाजी मारी थी। तब जगदंबा सिंह को विधायक बने थे। 1996 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का खाता खोलकर सुखपाल पांडेय विधायक बने। उसके बाद 2002 में हुए चुनाव के दौरान बसपा से ही राजकिशोर सिंह ने विधानसभा पहुंचे। 2007 में राजकिशोर सिंह ने सपा में शामिल होकर विधायकी हासिल की। 2012 में राजकिशोर दोबारा सपा के टिकट पर हैट्रिक लगाने में कामयाब हुए। लेकिन 2017 में अजय सिंह ने भाजपा का भगवा लहराया तो राजकिशोर सिंह को पराजित होना पड़ गया।
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कप्तानगंज विधानसभा सीट : धुरंधर रामप्रसाद चौधरी को मिली हार
सियासत में लंबी पारी खेल चुके रामप्रसाद चौधरी को उनके ही गढ़ में हार मिली। अतीत पर नजर डालें तो 1989 और 1991 के विधानसभा चुनाव में लगातार दो बार जीत हासिल कर निर्दलीय विधायक राना कृष्ण किंकर सिंह ने जीत का सेहरा अपने सिर पर बांधा था। 1993 में यहां से सपा प्रत्याशी राम प्रसाद चौधरी ने भाजपा के शीतला सिंह को पराजित किया। 1996 के चुनाव में दोबारा राम प्रसाद चौधरी ने बसपा में शामिल होकर जीते। यही नहीं 2002 के विधानसभा चुनाव में राम प्रसाद चौधरी ने कमल का फूल थामकर हैट्रिक भी लगाई। जीत का सिलसिला चला तो 2007 और 2012 के चुनाव में भी राम प्रसाद चौधरी ने जीत हासिल कर लगातार पांच बार विधायक होने का रिकार्ड बना लिया। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का झंडा लेकर उतरे सीए चंद्रप्रकाश शुक्ल ने सभी दिग्गजों को मात दे दिया।
रुधौली विधानसभा सीट : पहली बार जीती भाजपा
यहां से 2017 में पहली बार भाजपा का कमल खिला। 1993 में रुधौली विधानसभा (तत्कालीन रामनगर) से सपा प्रत्याशी बाबूराम वर्मा विधायक हुए 1996 में बहुजन समाज पार्टी के राम ललित चौधरी ने बाजी मार लिया। 2002 में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अनूप पांडेय ने विधानसभा का चौखट लांघा तो 2007 में बसपा उम्मीदवार राजेंद्र चौधरी ने हाथी पर सवार होकर बाजी अपने हाथ कर लिया। 2012 के चुनाव में जब रामनगर से रुधौली नामांतरण हुआ तो इंडियन नेशनल कांग्रेस से संजय प्रताप जायसवाल ने तकरीबन पांच हजार वोटों से जीत हासिल की। 2017 के चुनाव में कांग्रेस से हाथ छुड़ाकर भाजपा का दामन थामा और 20 हजार से अधिक वोटों से राजेंद्र प्रसाद चौधरी को पराजित किया।
महादेवा विधानसभा सीट : दूसरी बार जीती भाजपा
यहां से 1991 के बाद 2017 में भाजपा को दूसरी बार जीत मिली। सीट के इतिहास पर गौर करें तो 1951 में यह सीट बस्ती इस्ट के नाम से जानी जाती थी। यहां से पहली बार इंडियन नेशनल कांग्रेस से आसमान सिंह विधायक चुने गए। 1957 में कांग्रेस के कृपाशंकर, 1962 में इसी पार्टी के विष्णुप्रताप सिंह, 1967 में एसडब्ल्यूए से बी लाल, 1969 में इंडियन नेशनल कांग्रेस से गंगा प्रसाद, 1974 में इसी पार्टी से सोहन लाल धुसिया, 1977 में जेएनपी से गिरधारी लाल, 1980 में इंडियन नेशनल कांग्रेस से रामअवध, 1985 में इसी आईएनसी से राम जियावन, 1989 में जनता दल से राम करन आर्य, 1991 में भाजपा से वेदप्रकाश, 1993 में सपा से रामकरन आर्य, 1996 में बसपा से वेदप्रकाश, 2002 में सपा से रामकरन आर्य, 2007 में बसपा से दूधराम, 2012 में सपा से रामकरन आर्य और 2017 में भाजपा से रवि सोनकर विधायक चुने गए हैं।