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हिन्दी जनसंचार का सशक्त माध्यम: डॉ. द्विवेदी
Basti
Updated Sun, 14 Sep 2014 05:30 AM IST
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बस्ती। हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की धड़कन है। यह जनसंचार का सबसे सशक्त माध्यम है। बालीवुड से लेकर पत्रकारिता तक, विज्ञापन से लेकर राजनीति तक सबने हर दिन नए शब्द गढ़े, नई परंपराएं और नई शैली विकसित की। फिर भी हिन्दी जीवंत है। ये बातें हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर मथौली स्थित चंद्रगुप्त मौर्य प्रभावंश महिला महाविद्यालय में आयोजित गोष्ठी एवं सम्मान समारोह में किसान पीजी कॉलेज के सेवानिवृत्त शिक्षक डॉ. पीएन द्विवेदी ने कहीं। वे कार्यक्रम को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।
द्विवेदी ने कहा कि हिन्दी ऐसी समृद्ध भाषा है कि इसका महत्व कभी कम नहीं हो सकता। यह सच है कि लंबे अंतराल के बाद भाषा के स्तर पर परिवर्तन होते रहते हैं किन्तु हिन्दी में इस परिवर्तन को भी सहज स्वीकार करने की क्षमता है। हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान बना चुके रघुवंशमणि त्रिपाठी ने कहा कि हिन्दी जोड़ना सिखाती है। यह किसी भाषा की दुश्मन नहीं, बल्कि सखी भाषा है।
अध्यक्षता कर रहे अर्जुन प्रसाद शुक्ल ने कहा कि कुछ लोग सिर्फ लाभ अर्जित करने के लिए हिन्दी को नीचा दिखाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। हिन्दी किसी की सहानुभूति की मोहताज नहीं है। यह आत्मा से निकली आवाज है। महाविद्यालय के संस्थापक एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित वंशराज मौर्य ने मुख्य अतिथि, रघुवंशमणि त्रिपाठी, बृजराज शुक्ल, सन्तराम मौर्य, नन्दलाल तथा अर्जुन प्रसाद शुक्ल को अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि द्वारा विद्या की देवी सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण से हुई। अंत में प्रबंधक डॉ. अनिल कुमार मौर्य ने अतिथियों के प्रति आभार ज्ञापित किया। इस अवसर पर अभय सिंह यादव, मो. इकबाल, विजयशंकर पांडेय, शैलेष कुमार मिश्र, प्रवेश मोहन, सरोज मौर्य, अनीता मौर्य, विभा अग्रहरि, शृंखला पाल, सिकंदर, महाविद्यालय की छात्राएं आदि मौजूद रहे।
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द्विवेदी ने कहा कि हिन्दी ऐसी समृद्ध भाषा है कि इसका महत्व कभी कम नहीं हो सकता। यह सच है कि लंबे अंतराल के बाद भाषा के स्तर पर परिवर्तन होते रहते हैं किन्तु हिन्दी में इस परिवर्तन को भी सहज स्वीकार करने की क्षमता है। हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान बना चुके रघुवंशमणि त्रिपाठी ने कहा कि हिन्दी जोड़ना सिखाती है। यह किसी भाषा की दुश्मन नहीं, बल्कि सखी भाषा है।
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अध्यक्षता कर रहे अर्जुन प्रसाद शुक्ल ने कहा कि कुछ लोग सिर्फ लाभ अर्जित करने के लिए हिन्दी को नीचा दिखाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। हिन्दी किसी की सहानुभूति की मोहताज नहीं है। यह आत्मा से निकली आवाज है। महाविद्यालय के संस्थापक एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित वंशराज मौर्य ने मुख्य अतिथि, रघुवंशमणि त्रिपाठी, बृजराज शुक्ल, सन्तराम मौर्य, नन्दलाल तथा अर्जुन प्रसाद शुक्ल को अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि द्वारा विद्या की देवी सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण से हुई। अंत में प्रबंधक डॉ. अनिल कुमार मौर्य ने अतिथियों के प्रति आभार ज्ञापित किया। इस अवसर पर अभय सिंह यादव, मो. इकबाल, विजयशंकर पांडेय, शैलेष कुमार मिश्र, प्रवेश मोहन, सरोज मौर्य, अनीता मौर्य, विभा अग्रहरि, शृंखला पाल, सिकंदर, महाविद्यालय की छात्राएं आदि मौजूद रहे।
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