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ध्यानचंद के बिना रूप सिंह ने नहीं किया था मैच का उद् घाटन
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मेजर ध्यानचंद की भतीजी चंद्रकला।
- फोटो : BADAUN
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दातागंज (बदायूं)। ओलंपिक हॉकी में भारत का झंडा ऊंचा करने वाले कैप्टन रूप सिंह हॉकी जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के छोटे भाई थे। कैप्टन रूप सिंह की बेटी चंद्रकला बतातीं हैं कि एक बार उनके पिता को ग्वालियर स्टेडियम में एक अंतरराष्ट्रीय मैच के उद्घाटन के लिए बुलाया गया। उन्होंने उद्घाटन से इसलिए मना कर दिया कि आयोजकों ने ध्यानचंद को नहीं बुलाया था। करीब 75 साल की हो चुकीं चंद्रकला दातागंज के गांव नौनी टिकन्ना में रहती हैं। खेल दिवस पर अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने अपने पिता रूप सिंह और ताऊ ध्यानचंद से जुडे कई संस्मरण सुनाए।
उन्होंने बताया कि एक बार ग्वालियर के स्टेडियम में हॉलैंड की टीम का हॉकी मैच था। मैच के उद्घाटन के लिए उनके पिता रूप सिंह को तो बुलाया गया। वह मैच का उद्घाटन करने पहुंचे तब उन्हें पता चला कि ध्यानचंद को नहीं बुलाया गया। इस पर उन्होंने मैच के उद्घाटन से इंकार कर दिया। इसके दो दिन बाद रू प सिंह का निधन हो गया। तब अखबारों में खबर छपी थी कि राम को छोड़कर लक्ष्मण चला गया। कैप्टन रूप सिंह और मेजर ध्यानचंद दोनों भाइयों के बीच बीच इतना प्यार था कि लोग उन्हें राम-लक्ष्मण की जोड़ी कहते थे।
मेजर ध्यानचंद और रूप सिंह दोनों भाई एक ही टीम में खेलते थे। चंद्रकला ने बताया कि उन्होंने जब पहली बार ताऊ ध्यानचंद का हॉकी मैच टीवी पर देखा तो वह करीब 10 वषज़् की थीं। ताऊ को टीवी पर देख उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। ताऊ जब भी घर आते थे तो हम सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे। वह आए दिन बच्चों के लिए खिलौने लाते रहते थे। उन्हें कई बार मेला दिखाने ले जाते थे। वह लोग खूब मौज मस्ती करते थे। कभी कभार उन लोगों के लिए ध्यानचंद खुद खाना बनाते थे।
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चंद्रकला बताती हैं कि आखिरी बार वह ताऊ से 1974 में मिली थीं। उन्होंने बताया कि परिवार के ज्यादातर लोग दिल्ली, ग्वालियर, झांसी या देहरादून में रहते हैं। अगर कोई बड़ा पारिवारिक आयोजन होता है तो सभी के मिलने पर पुरानी यादों पर चचाएज़्ं होती हैं।
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उन्होंने बताया कि एक बार ग्वालियर के स्टेडियम में हॉलैंड की टीम का हॉकी मैच था। मैच के उद्घाटन के लिए उनके पिता रूप सिंह को तो बुलाया गया। वह मैच का उद्घाटन करने पहुंचे तब उन्हें पता चला कि ध्यानचंद को नहीं बुलाया गया। इस पर उन्होंने मैच के उद्घाटन से इंकार कर दिया। इसके दो दिन बाद रू प सिंह का निधन हो गया। तब अखबारों में खबर छपी थी कि राम को छोड़कर लक्ष्मण चला गया। कैप्टन रूप सिंह और मेजर ध्यानचंद दोनों भाइयों के बीच बीच इतना प्यार था कि लोग उन्हें राम-लक्ष्मण की जोड़ी कहते थे।
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मेजर ध्यानचंद और रूप सिंह दोनों भाई एक ही टीम में खेलते थे। चंद्रकला ने बताया कि उन्होंने जब पहली बार ताऊ ध्यानचंद का हॉकी मैच टीवी पर देखा तो वह करीब 10 वषज़् की थीं। ताऊ को टीवी पर देख उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। ताऊ जब भी घर आते थे तो हम सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे। वह आए दिन बच्चों के लिए खिलौने लाते रहते थे। उन्हें कई बार मेला दिखाने ले जाते थे। वह लोग खूब मौज मस्ती करते थे। कभी कभार उन लोगों के लिए ध्यानचंद खुद खाना बनाते थे।
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चंद्रकला बताती हैं कि आखिरी बार वह ताऊ से 1974 में मिली थीं। उन्होंने बताया कि परिवार के ज्यादातर लोग दिल्ली, ग्वालियर, झांसी या देहरादून में रहते हैं। अगर कोई बड़ा पारिवारिक आयोजन होता है तो सभी के मिलने पर पुरानी यादों पर चचाएज़्ं होती हैं।