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कमउम्र जानवर की कुरबानी जायज नहीं
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
Updated Sun, 11 Sep 2016 01:39 AM IST
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शहर काजी मौलाना असजद रजा खां कादरी ने कहा है कि कुरबानी हर साहिबे निसाब मुसलमान पर वाजिब है। इसमें मर्द, औरत, आकिल और बालिग शामिल हैं। जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी अथवा उसकी कीमत का माल जो उसकी जरूरत से ज्यादा हो।
शहर काजी ने इस बात को विस्तार देते हुए कहा कि घर में सबकी तरफ से एक कुरबानी कर देना काफी नहीं, बल्कि जितने बालिग संपन्न लोग हैं उतनी कुरबानी करें। बड़े जानवर की उम्र दो साल और बकरा, भेड़ व दुंबा की उम्र एक साल से कम न हो। इससे कम उम्र पर कुरबानी जायज नहीं, अगर ज्यादा है तो अफजल (बेहतर) है। उन्होंने कहा कि ईद-उल-अजहा हजरत इब्राहिम अलै. सुन्नत है। इस लिए मुसलमान इस सुन्नत को निहायत ही खुशदिली के साथ अदा करे और अपने रब को राजी करे। अल्लाह ने कुरान में कहा कि ‘तुम अपने रब के लिए नमाज पढ़ो और कुरबानी करो’। वहीं हमारे नबी ने कहा कि ‘जो पैसा कुरबानी पर खर्च हुआ उससे प्यारा कोई रुपया नही’।
कैसे जानवर पर करें कुरबानी
बरेली। मौलाना शहजाद आलम का कहना है कि जानवर खरीदते वक्त उसे अच्छी तरह परख लें। ऐसे कमजोर जानवर जो अपने पैरों से कुरबानीगाह तक न जा सके उस पर कुरबानी जायज नहीं। इसके अलावा कोई नुक्स भी नहीं होना चाहिए। जैसे कान कटा न हो, आंख खराब न हो, दांत पूरे हों, पैर का खुर साबुत होना चाहिए। अगर यह खामियां हैं तो भी कुरबानी नहीं होगी।
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भावनाओं का रखें ख्याल
बरेली। जमात रजा मुस्तफा के नायब सदर सलमान मियां व नासिर कुरैशी ने अपील करते हुए कहा है कि कुरबानी करते वक्त दूसरों की धार्मिक भावनाओं का ख्याल रखें। कुरबानी खुले में न करें और न ही कुरबानी का खून नालियों में बहाएं।
कुरबानी के खून को बहाना शरियत के खिलाफ
- मीट को खुले में फेंकना गुनाहे अजीम, अवशेष को दफनाएं
अमर उजाला ब्यूरो
बरेली। ईद-उल-अजहा कुरबानी को लेकर खानकाहे नियाजिया से जुड़े संगठन फैजाने नियाजिया वेलफेयर सोसायटी के संस्थापक डा. कमाल मियां नियाजी ने कहा कि मौजूदा हालात को देखते हुए कुछ एहतियात बरतना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा है कि खुले स्थान पर कुर्बानी न करें, कुरबानी के मीट और गंदगी को खुला न छोड़े, शरियत का हुक्म यह है कि अवशेषों को दफन कर दें। बहुत से लोग धार्मिक नियमों का पालन नहीं करते हैं। जो कि गुनाहे अजीम (बड़ा गुनाह) है। इस गुनाह से बचें और अल्लाह के एहकाम को पूरा करें। इससे दूसरे समुदाय के लोगों को भी तकलीफ न होगी। उन्होंने कहा कि कुरबानी करते वक्त यह ध्यान रखें कि कुरबानी अपने घर के अंदर ही करें और उसके खून को बहने न दें बल्कि उसे दफनाएं। इस तरह शरियत का हुक्म भी पूरा होगा और माहौल भी साफ सुथरा रहेगा। त्योहार भी अमन और पुरसुकून तरीके से मनाया जा सकेगा।
मुस्लिमों को दी हिदायत
बरेली। ईद-उल-अजहा (बकरीद) को लेकर फैजाने नियाजिया वेलफेयर सोसायटी की बैठक ख्वाजा कुतब स्थित कार्यालय पर हुई। इसमें कुरबानी के संबंध में तमाम मोहल्लों के मुस्लिमों को एकत्र कर कई खास हिदायतें दी गईं। ताकि दूसरे संप्रदाय को लोगों की भावनाएं आहत न हों।
सोसायटी के अध्यक्ष हमजा मियां नियाजी बकरीद का पर्व अमन से मनाने की अपील की गई। सूफी नसीम उर रहमान नियाजी ने कुर्बानी की फजीलत बयान की। इस मौके पर जैन मियां नियाजी, आफताब नियाजी, मुस्लिम नियाजी, हसीन नियाजी, हाफिज साजिद, सूफी नसीम उर रहमान नियाजी, मोहम्मद नदीम, हकीम अफसर सहित तमाम लोग मौजूद रहे। संचालन यावर अली नियाजी ने किया।
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शहर काजी ने इस बात को विस्तार देते हुए कहा कि घर में सबकी तरफ से एक कुरबानी कर देना काफी नहीं, बल्कि जितने बालिग संपन्न लोग हैं उतनी कुरबानी करें। बड़े जानवर की उम्र दो साल और बकरा, भेड़ व दुंबा की उम्र एक साल से कम न हो। इससे कम उम्र पर कुरबानी जायज नहीं, अगर ज्यादा है तो अफजल (बेहतर) है। उन्होंने कहा कि ईद-उल-अजहा हजरत इब्राहिम अलै. सुन्नत है। इस लिए मुसलमान इस सुन्नत को निहायत ही खुशदिली के साथ अदा करे और अपने रब को राजी करे। अल्लाह ने कुरान में कहा कि ‘तुम अपने रब के लिए नमाज पढ़ो और कुरबानी करो’। वहीं हमारे नबी ने कहा कि ‘जो पैसा कुरबानी पर खर्च हुआ उससे प्यारा कोई रुपया नही’।
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कैसे जानवर पर करें कुरबानी
बरेली। मौलाना शहजाद आलम का कहना है कि जानवर खरीदते वक्त उसे अच्छी तरह परख लें। ऐसे कमजोर जानवर जो अपने पैरों से कुरबानीगाह तक न जा सके उस पर कुरबानी जायज नहीं। इसके अलावा कोई नुक्स भी नहीं होना चाहिए। जैसे कान कटा न हो, आंख खराब न हो, दांत पूरे हों, पैर का खुर साबुत होना चाहिए। अगर यह खामियां हैं तो भी कुरबानी नहीं होगी।
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भावनाओं का रखें ख्याल
बरेली। जमात रजा मुस्तफा के नायब सदर सलमान मियां व नासिर कुरैशी ने अपील करते हुए कहा है कि कुरबानी करते वक्त दूसरों की धार्मिक भावनाओं का ख्याल रखें। कुरबानी खुले में न करें और न ही कुरबानी का खून नालियों में बहाएं।
कुरबानी के खून को बहाना शरियत के खिलाफ
- मीट को खुले में फेंकना गुनाहे अजीम, अवशेष को दफनाएं
अमर उजाला ब्यूरो
बरेली। ईद-उल-अजहा कुरबानी को लेकर खानकाहे नियाजिया से जुड़े संगठन फैजाने नियाजिया वेलफेयर सोसायटी के संस्थापक डा. कमाल मियां नियाजी ने कहा कि मौजूदा हालात को देखते हुए कुछ एहतियात बरतना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा है कि खुले स्थान पर कुर्बानी न करें, कुरबानी के मीट और गंदगी को खुला न छोड़े, शरियत का हुक्म यह है कि अवशेषों को दफन कर दें। बहुत से लोग धार्मिक नियमों का पालन नहीं करते हैं। जो कि गुनाहे अजीम (बड़ा गुनाह) है। इस गुनाह से बचें और अल्लाह के एहकाम को पूरा करें। इससे दूसरे समुदाय के लोगों को भी तकलीफ न होगी। उन्होंने कहा कि कुरबानी करते वक्त यह ध्यान रखें कि कुरबानी अपने घर के अंदर ही करें और उसके खून को बहने न दें बल्कि उसे दफनाएं। इस तरह शरियत का हुक्म भी पूरा होगा और माहौल भी साफ सुथरा रहेगा। त्योहार भी अमन और पुरसुकून तरीके से मनाया जा सकेगा।
मुस्लिमों को दी हिदायत
बरेली। ईद-उल-अजहा (बकरीद) को लेकर फैजाने नियाजिया वेलफेयर सोसायटी की बैठक ख्वाजा कुतब स्थित कार्यालय पर हुई। इसमें कुरबानी के संबंध में तमाम मोहल्लों के मुस्लिमों को एकत्र कर कई खास हिदायतें दी गईं। ताकि दूसरे संप्रदाय को लोगों की भावनाएं आहत न हों।
सोसायटी के अध्यक्ष हमजा मियां नियाजी बकरीद का पर्व अमन से मनाने की अपील की गई। सूफी नसीम उर रहमान नियाजी ने कुर्बानी की फजीलत बयान की। इस मौके पर जैन मियां नियाजी, आफताब नियाजी, मुस्लिम नियाजी, हसीन नियाजी, हाफिज साजिद, सूफी नसीम उर रहमान नियाजी, मोहम्मद नदीम, हकीम अफसर सहित तमाम लोग मौजूद रहे। संचालन यावर अली नियाजी ने किया।