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खून देने की बात पर डर गईं वृद्धा
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
Updated Sat, 11 Jun 2016 01:04 AM IST
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रक्तदान को लेकर अब भी लोगों की भ्रांतियां खत्म नहीं हुई है। इसका ताजा मामला जिला महिला अस्पताल में देखने को मिला। एक प्रसूता को रक्त की जरूरत पड़ी तो उसकी सास ने अपने बेटे को वहां से भगा दिया ताकि उसे खून न देना पड़े। इसे लेकर महिला डॉक्टरों की तीमारदारों से कहा सुनी भी हुई। काफी देर बाद जैसे तैसे महिला के पति ने खून का इंतजाम किया।
शाहजहांपुर के जलालाबाद स्वास्थ्य केंद्र में ममता ने बच्चे को जन्म दिया। ममता एनीमिया से पीड़ित थी। उसका हीमोग्लोबिन मात्र 3 ग्राम था। जलालाबाद से उसे जिला महिला अस्पताल बरेली रेफर किया गया। अस्पताल पहुंचने के बाद चिकित्सकों ने बच्चे को एनआईसीयू और प्रसूता को वार्ड में भर्ती किया। ममता को खून की कमी के चलते हालत बिगड़ गई।
डॉक्टरों से भिड़ गई सास
ममता की हालत बिगड़ने पर डॉ. नीलम आर्या ने सीएमएस डॉ. अलका शर्मा को फोन किया। वह अस्पताल पहुंची तो उन्होंने उसके पति को बुलवाया। बहू के साथ बैठी सास ने अपने बेटे को वहां से भगा दिया। वह डॉक्टराें से भी उलझ गई। कहने लगी कि बहू ठीक है, बोल भी रही है। काफी समझाने के बाद प्रसूता के पति ने खून का इंतजाम किया।
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रक्तदान से नहीं आती है कमजोरी
आईएमए ब्लड बैंक की निदेशक डॉ. अंजू उप्पल का कहना है कि रक्तदान से कमजोरी नहीं आती। शरीर में पांच लीटर रक्त होता है। अगर 450 ग्राम दान कर दिया तो कमी नहीं होती। एक हफ्ते में रक्त बन जाता है। 120 दिन में रक्त कोशिकाएं बनती है। शरीर में नई आरबीसी का निर्माण होता है। छोटे रक्त जनित संक्रमण से बचाव, शरीर में फुर्ती आती है। एक यूनिट रक्त चार लोगाें की जिंदगी बचाता है। हर तीन माह में रक्तदान करने से हार्ट अटैक नहीं आता। कोलेस्ट्रोल कम होता है।
वर्जन--
जलालाबाद की प्रसूता के परिवारवालाें को काफी समझाया। रक्तदान न करना पड़े इसलिए बेटे को मां ने भगा दिया। महिला की जान खतरे में थी, कुछ मिनटों में उसकी जान जा सकती थी, लेकिन डॉक्टराें की सूझबूझ से जान बच गई।
- डॉ. अलका शर्मा, सीएमएस, महिला अस्पताल
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शाहजहांपुर के जलालाबाद स्वास्थ्य केंद्र में ममता ने बच्चे को जन्म दिया। ममता एनीमिया से पीड़ित थी। उसका हीमोग्लोबिन मात्र 3 ग्राम था। जलालाबाद से उसे जिला महिला अस्पताल बरेली रेफर किया गया। अस्पताल पहुंचने के बाद चिकित्सकों ने बच्चे को एनआईसीयू और प्रसूता को वार्ड में भर्ती किया। ममता को खून की कमी के चलते हालत बिगड़ गई।
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डॉक्टरों से भिड़ गई सास
ममता की हालत बिगड़ने पर डॉ. नीलम आर्या ने सीएमएस डॉ. अलका शर्मा को फोन किया। वह अस्पताल पहुंची तो उन्होंने उसके पति को बुलवाया। बहू के साथ बैठी सास ने अपने बेटे को वहां से भगा दिया। वह डॉक्टराें से भी उलझ गई। कहने लगी कि बहू ठीक है, बोल भी रही है। काफी समझाने के बाद प्रसूता के पति ने खून का इंतजाम किया।
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रक्तदान से नहीं आती है कमजोरी
आईएमए ब्लड बैंक की निदेशक डॉ. अंजू उप्पल का कहना है कि रक्तदान से कमजोरी नहीं आती। शरीर में पांच लीटर रक्त होता है। अगर 450 ग्राम दान कर दिया तो कमी नहीं होती। एक हफ्ते में रक्त बन जाता है। 120 दिन में रक्त कोशिकाएं बनती है। शरीर में नई आरबीसी का निर्माण होता है। छोटे रक्त जनित संक्रमण से बचाव, शरीर में फुर्ती आती है। एक यूनिट रक्त चार लोगाें की जिंदगी बचाता है। हर तीन माह में रक्तदान करने से हार्ट अटैक नहीं आता। कोलेस्ट्रोल कम होता है।
वर्जन--
जलालाबाद की प्रसूता के परिवारवालाें को काफी समझाया। रक्तदान न करना पड़े इसलिए बेटे को मां ने भगा दिया। महिला की जान खतरे में थी, कुछ मिनटों में उसकी जान जा सकती थी, लेकिन डॉक्टराें की सूझबूझ से जान बच गई।
- डॉ. अलका शर्मा, सीएमएस, महिला अस्पताल