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चुनावी गणित: यहां एक दशक में भाजपा के पाले में 20 फीसदी बढ़े मतदाता, कांग्रेस को हुआ नुकसान

Mon, 15 Apr 2024 12:54 PM IST
मुकेश कुमार शशांक मिश्र, बरेली ब्यूरो
शशांक मिश्र, बरेली ब्यूरो Published by: मुकेश कुमार Updated Mon, 15 Apr 2024 12:54 PM IST
सार

यूं तो पिछले चार दशक से बरेली लोकसभा सीट भाजपा का गढ़ रही, लेकिन वर्ष 2009 में कांग्रेस के प्रवीण सिंह ऐरन ने छह बार सांसद रहे भाजपा के संतोष गंगवार को पटखनी दे दी थी। इसके बाद फिर भाजपा ने अपना कब्जा जमाया। भाजपा के पक्ष में मतदान प्रतिशत भी बढ़ा था। बीते एक दशक में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ। 

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Voters in BJP favor increased by 20 percent last ten years
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बरेली मंडल की पांच और लखीमपुर खीरी की दो सीटों पर पिछले एक दशक में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत की है, जबकि कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। वर्ष 2019 के चुनाव में तो सपा-बसपा का गठबंधन था, इसलिए दोनों के मत एक-दूसरे को स्थानांतरित हुए थे।

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यही कारण रहा कि पिछले चुनाव में भले ही भाजपा ने उक्त सातों सीटें तो जीत लीं, लेकिन सभी सीटों पर सपा-बसपा के प्रत्याशी ही प्रमुख प्रतिद्वंद्वी रहे। इस लड़ाई में पीलीभीत सीट पर सांसद वरुण गांधी को सबसे ज्यादा 59 फीसदी मतदाताओं का साथ मिला था। वहीं बदायूं सीट पर संघमित्रा मौर्य ने 47 फीसदी मत पाकर नजदीकी मुकाबला जीता था।
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यही नहीं इन सात सीटों में ज्यादातर पर मुस्लिम मतदाताओं के रुझान पर भी सियासी दलों की खास नजर है। वर्ष 2014 और 2019 के चुनाव में मुस्लिम प्रत्याशियों के प्रदर्शन से भी उनकी पसंद साफ हुई थी। हालांकि पिछले डेढ़ दशक से इन सीटों से कोई मुस्लिम चेहरा संसद नहीं पहुंचा है। इसके बावजूद इस बार ज्यादातर सीटों पर बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशियों पर भरोसा जताया है।

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बरेली में 10 साल में दोगुने के करीब बढ़ा मत प्रतिशत
यूं तो पिछले चार दशक से बरेली लोकसभा सीट भाजपा का गढ़ रही, लेकिन वर्ष 2009 में कांग्रेस के प्रवीण सिंह ऐरन ने छह बार सांसद रहे भाजपा के संतोष गंगवार को पटखनी दे दी थी। उस समय कांग्रेस ने 31.31 फीसदी मत हासिल कर जीत का ताज पहना था। भाजपा के पाले में 29.99 फीसदी मतदाताओं का साथ था। सपा के भगवत सरन गंगवार 10.42 और बसपा से मुस्लिम प्रत्याशी इस्लाम साबिर अंसारी ने 25 फीसदी मत हासिल किए थे। 

बाद में वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा ने 20.92 फीसदी मत बढ़ाए और 50.91 फीसदी मत हासिल कर जीत दर्ज की। सपा ने मुस्लिम चेहरे पर दांव खेला और उसके 16.85 फीसदी मत बढ़े। वहीं बसपा व कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ और बसपा प्रत्याशी उमेश गौतम के खाते में 2009 के चुनाव के मुकाबले 15.37 फीसदी मत कम आए, जबकि 23.05 फीसदी मतदाताओं ने कांग्रेस का साथ छोड़ा। वर्ष 2019 के चुनाव में भाजपा ने दो फीसदी मत प्रतिशत का इजाफा किया। वहीं बसपा-सपा गठबंधन के प्रत्याशी को एक दूसरे का वोट ट्रांसफर हुआ और उनके 10 फीसदी मत बढ़े। कांग्रेस को फिर 1.32 फीसदी मतों का नुकसान हुआ।

पीलीभीत में मेनका और वरुण गांधी की पकड़ रही मजबूत
पीलीभीत लोकसभा सीट पर भाजपा की पकड़ मजबूत रही है। यहां 2009 में 50 फीसदी मत हासिल करने वाली भाजपा ने 15 साल में नौ फीसदी मतों का इजाफा किया। हालांकि सपा भी इस सीट पर मतदाताओं के बीच पैठ मजबूत करने में सफल हुई है। वर्ष 2009 में आठ फीसदी मत पाने वाली सपा ने वर्ष 2019 में बसपा से गठबंधन के जरिये 37 फीसदी मतदाताओं तक पहुंच बनाई। इससे पहले वर्ष 2014 में सपा ने अपने पुराने प्रदर्शन को सुधारते हुए 22 फीसदी मतदाताओं का समर्थन हासिल किया था। यहां सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ और वर्ष 2009 में 16 फीसदी मतदाताओं का समर्थन पाने वाली कांग्रेस 2019 में पूरी तरह से जनाधार विहीन हो गई। यहां कांग्रेस ने प्रत्याशी ही नहीं उतारा था। हालांकि वर्ष 2014 में पार्टी 2.78 फीसदी मत पाने में सफल हुई थी। 

शाहजहांपुर में भाजपा ने तीन गुना बनाई बढ़त
शाहजहांपुर लोकसभा सीट पर वर्ष 2009 में भाजपा 21.25 फीसदी मत पाकर तीसरे पायदान पर थी और सपा ने 32.43 फीसदी मत हासिल कर जीत दर्ज कराई थी। बसपा ने भी करीब 23 फीसदी मत हासिल किए थे, लेकिन वर्ष 2019 में सपा-बसपा गठबंधन में प्रत्याशी को मत ट्रांसफर नहीं हुए और बसपा के अमर चंद जौहर को महज 35 फीसदी मत मिले। वैसे वर्ष 2014 में बसपा के उम्मेद सिंह कश्यप को 25 और सपा के मिथिलेश कुमार को 21 फीसदी मत मिले थे। वहीं दूसरी तरफ भाजपा ने वर्ष 2014 में 25.20 फीसदी की बढ़त के साथ 46.26 मतदाताओं का समर्थन हासिल किया। इसके बाद वर्ष 2019 में भाजपा ने 58 फीसदी मत हासिल किए। उधर, वर्ष 2009 में 13 फीसदी मत हासिल करने वाली कांग्रेस 10 वर्ष में दो फीसदी के आंकड़े पर पहुंच गई।

आंवला लोकसभा में ढाई गुना से ज्यादा मतदाताओं का मिला साथ
बरेली जिले की आंवला लोकसभा सीट का किस्सा बेहद ही दिलचस्प है। वर्ष 2009 में सपा से प्रत्याशी रहे धर्मेंद्र कश्यप को 19.84 फीसदी मत मिले और भाजपा की मेनका गांधी ने 20.56 फीसदी मत हासिल कर जीत हासिल की। इसके बाद धर्मेंद्र कश्यप भाजपा में आए और वर्ष 2014 में भाजपा को 41.16 व वर्ष 2019 में 51.07 फीसदी मत मिले। 15 वर्ष में भाजपा ने करीब ढाई गुना से ज्यादा अपना मत प्रतिशत बढ़ाया। सपा और बसपा के भी मत फीसदी में इजाफा हुआ। वर्ष 2009 में 16.56 फीसदी वोट पाने वाली बसपा ने वर्ष 2014 में 19.10 फीसदी मतदाताओं का समर्थन हासिल किया। वहीं वर्ष 2019 के चुनाव में गठबंधन में बसपा की रुचिवीरा को सपा के मत भी ट्रांसफर हुए और उन्होंने 40.27 फीसदी मत हासिल किए। कांग्रेस पिछले 10 वर्ष में पांच फीसदी मतों पर पहुंच गई।

बदायूं में तीन फीसदी समर्थन घटा तो सपा को मिली हार
सपा का गढ़ रही बदायूं लोकसभा सीट पर वर्ष 2019 में दो फीसदी मत प्रतिशत घटते ही पार्टी को हार का समाना करना पड़ा। यहां भाजपा के वागीश पाठक ने वर्ष 2014 में 33 फीसदी मत हासिल किए थे और सपा के धर्मेंद्र यादव को 49 फीसदी मत मिले थे। पांच साल बाद वर्ष 2019 में भाजपा की संघमित्रा मौर्य ने 47 फीसदी मत हासिल कर नजदीकी मुकाबले में जीत दर्ज की थी, जबकि सपा को तीन फीसदी मतों का नुकसान हुआ और उसके खाते में 46 फीसदी मतदाता ही आए। 

यहां भाजपा ने पांच वर्ष में 15 फीसदी मत प्रतिशत का इजाफा किया। कांग्रेस ने भी यहां चार फीसदी मतों की बढ़त बनाई थी। वहीं सबसे ज्यादा नुकसान बसपा को हुआ। वर्ष 2009 में बसपा के डीपी यादव ने यहां 27 फीसदी से ज्यादा मतदाताओं का समर्थन हासिल किया। वहीं वर्ष 2014 के चुनाव में यह घटकर 15 फीसदी रह गया और वर्ष 2019 के चुनाव में बसपा का साथ पाने के बाद भी सपा प्रत्याशी को 18 फीसदी मतदाताओं का साथ नहीं मिला।

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