बाघिन का रेस्क्यूः टैंक में फंसी ‘शर्मीली’... बाहर निकलते ही पिंजड़े में होगी कैद
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सवा साल तक गच्चा देने के बाद आखिरकार वन विभाग के घेरे में फंसी बाघिन
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फैक्टरी के तीन नंबर मंदिर के सामने स्थित बड़े टैंक में है बाघिन, टैक के आगे लगाया पिंजड़ा
किशनपुर सेंक्चुरी भेजी जाएगी बाघिन, व्यवहार के आधार पर विशेषज्ञों ने नाम दिया है शर्मीली
बरेली। एक साल तीन माह और चार दिन बाद बृहस्पतिवार को आखिरकार बाघिन शर्मीली वन विभाग के घेरे में फंस ही गई। रबर फैक्टरी के तीन नंबर मदिर के सामने स्थित शीरा भरने के टैंक में बाघिन के ठिकाने का पता चलने के बाद विशेषज्ञों ने बाघिन की घेराबंदी कर दी। अब टैंक के गेट पर पिंजड़ा लगाकर बाघिन के बाहर निकलने का इंतजार किया जा रहा है। जैसे ही बाघिन बाहर निकलेगी, पिजड़े में फंस जाएगी।
पिछले दो हफ्ते से वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडिया, पीलीभीत टाइगर रिजर्व के साथ वन विभाग की टीम बाघिन के रेस्क्यू में जुटी थी। डब्ल्यूटीआई के विशेषज्ञ और डॉक्टर सुशांत रात-दिन बाघिन की सटीक लोकेशन तलाशने में जुटे रहे। पिछले कई दिन से रबर फैक्टरी के लेटेस्ट प्लांट और मंदिर के आसपास ही बाघिन की लोकेशन मिल रही थी। हालांकि, इन दोनों जगहों में से बाघिन का ठिकाना कहां है, इसको लेकर वन विभाग के अफसर असमंजस में थे। ठिकाना जानने के लिए कैमरों की लोकेशन बदली गई तो बृहस्पतिवार को सफलता मिल गई। सुबह पांच बजे जब बाघिन मंदिर के टैंक की ओर जाते दिखी तो टीमें अलर्ट हो गईं। टैंक में बाघिन के घुसते ही घेराबंदी शुरू कर दी गई। पहले जाल लगाकर गेट बंद किया फिर पिंजड़ा लगा दिया। ट्रेंक्युलाइज करने के लिए मुख्यालय से अनुमति मांगी गई थी, जो नहीं मिली। अफसरों के मुताबिक करीब सवा साल से चल रहे बाघिन के रेस्क्यु में 62 लाख रुपये का बजट खर्च हो चुका है। बाघिन की सटीक लोकेशन मिलने की सूचना पर जिलाधिकारी नितीश कुमार और सीडीओ चंद्र मोहन गर्ग भी फोन के जरिए जानकारी लेते रहे।
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टैंक में दहाड़ रही बाघिन
बाघिन का ठिकाना जिस टैंक में है उसकी परिधि दस मीटर और ऊंचाई 25 फीट है। डीएफओ भारत लाल ने बताया कि टैंक से बाहर निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता है। जैसे ही वह बाहर निकलेगी पिंजड़े में कैद हो जाएगी। उसे बाहर निकालने के लिए टीम के सदस्य सीढ़ियों के जरिए टैंक पर चढ़कर उसे उकसा रहे हैं। जिससे वह टैंक में दहाड़ रही है। उम्मीद है कि बाघिन धूप, बारिश या शिकार, पानी की तलाश में बाहर जरूर निकलेगी।
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बाघिन को पकड़ने की सूचना पर पहुंचे ग्रामीण
रबर फैक्टरी में सुबह से ही अफसरों की आवाजाही और वाहनों की लंबी कतार देखकर आसपास के गांवों के लोग रबर फैक्टरी के मेन गेट पर पहुंच गए। डीएफओ ने बताया कि कुछ ग्रामीण फैक्टरी की दीवार फांदकर टैंक तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। जिन्हें तत्काल वहां से भगाया गया। साथ ही, वापस लौटने पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई।
रेस्क्यू में जुटे अफसर और टीम
मुख्य वन सरंक्षक ललित वर्मा, वन संरक्षक जावेद अख्तर, डीएफओ भारत लाल, रेंजर रविंद्र सक्सेना, वैभव सक्सेना, संतोष शर्मा, अरुण श्रीवास्तव, मुकेश कांडपाल, राजेश शर्मा, नीलमणि, डिवीजन के सौ अन्य कर्मचारी समेत आठ प्राइवेट कर्मचारी बाघिन के रेस्क्यू में जुटे हुए हैं। डब्ल्यूटीआई और दुधवा के चिकित्सक दक्ष और रंजन राठौर का अहम योगदान रहा।
पिछले डेढ़ साल में कहां-कहां से आए विशेषज्ञ
वन विभाग का लखनऊ हेड ऑफिस, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट देहरादून, वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ दिल्ली, कानपुर चिड़ियाघर, दुधवा नेशनल पार्क, टाइगर रिजर्व पीलीभीत, बरेली, शाहजहांपुर, बदायूँ, पीलीभीत से वन विभाग की टीम, वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के विशेषज्ञ ने रेस्क्यु किया है।
- 13 मार्च 2020 को पहली बार दिखी बाघिन।
- 16 मार्च 2020 कैमरे में पहली बार दिखी।
- 05 मिशन फ्लॉप हो चुके हैं बाघिन को पकड़ने के।
- 17 जून 2021 को मिली सटीक लोकेशन, छठां रेस्क्यु शुरू।
- 11 सीसी कैमरे वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने लगाए।
- नौ सीसी कैमरे पीलीभीत टाइगर रिजर्व से आए हैं।
- 19 सीसी कैमरे वन विभाग की ओर से लगाए गए।
- 02 पिंजड़ा, दो ट्रेंक्युलाइज रूम, 48 पग मार्ग इम्प्रेशन पैड लगे।
- 06 मचान से निगरानी और 50 खाबड़ यानी जाल लगे हैं।
- 11 फीट लंबाई और 150 किलो है बाघिन का वजन।
‘लगातार लोकेशन बदलने की वजह से बाघिन की सटीक लोकेशन नहीं मिल पा रही थी। टीम अबकी बार मुस्तैदी से उसकी सटीक लोकेशन खोजने में सफल रही। वह मंदिर के पास स्थित एक टैंक में घुसी थी जहां घेराबंदी कर दी गई है। जैसे ही वह बाहर निकलेगी पिंजड़े में कैद हो जाएगी, ट्रेंक्युलाइज नहीं करना होगा।’ - भारत लाल, डीएफओ
’ट्रेंक्युलाइज के लिए मुख्यालय से अनुमति मांगी थी लेकिन वहां से पिंजड़े में कैद करने के प्रयास का सुझाव मिला। निर्देश के तहत काम हो रहा है। उम्मीद है कि बृहस्पतिवार की रात या शुक्रवार सुबह वह बाहर निकले। पकड़ में आने पर किशनपुर सेंक्चुरी छोड़ा जाएगा। उसका नाम शर्मीली रखा गया है।’ - ललित वर्मा, मुख्य वन संरक्षक
फैक्टरी के तीन नंबर मंदिर के सामने स्थित बड़े टैंक में है बाघिन, टैक के आगे लगाया पिंजड़ा
किशनपुर सेंक्चुरी भेजी जाएगी बाघिन, व्यवहार के आधार पर विशेषज्ञों ने नाम दिया है शर्मीली बरेली। एक साल तीन माह और चार दिन बाद बृहस्पतिवार को आखिरकार बाघिन शर्मीली वन विभाग के घेरे में फंस ही गई। रबर फैक्टरी के तीन नंबर मदिर के सामने स्थित शीरा भरने के टैंक में बाघिन के ठिकाने का पता चलने के बाद विशेषज्ञों ने बाघिन की घेराबंदी कर दी। अब टैंक के गेट पर पिंजड़ा लगाकर बाघिन के बाहर निकलने का इंतजार किया जा रहा है। जैसे ही बाघिन बाहर निकलेगी, पिजड़े में फंस जाएगी।
पिछले दो हफ्ते से वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडिया, पीलीभीत टाइगर रिजर्व के साथ वन विभाग की टीम बाघिन के रेस्क्यू में जुटी थी। डब्ल्यूटीआई के विशेषज्ञ और डॉक्टर सुशांत रात-दिन बाघिन की सटीक लोकेशन तलाशने में जुटे रहे। पिछले कई दिन से रबर फैक्टरी के लेटेस्ट प्लांट और मंदिर के आसपास ही बाघिन की लोकेशन मिल रही थी। हालांकि, इन दोनों जगहों में से बाघिन का ठिकाना कहां है, इसको लेकर वन विभाग के अफसर असमंजस में थे। ठिकाना जानने के लिए कैमरों की लोकेशन बदली गई तो बृहस्पतिवार को सफलता मिल गई। सुबह पांच बजे जब बाघिन मंदिर के टैंक की ओर जाते दिखी तो टीमें अलर्ट हो गईं। टैंक में बाघिन के घुसते ही घेराबंदी शुरू कर दी गई। पहले जाल लगाकर गेट बंद किया फिर पिंजड़ा लगा दिया। ट्रेंक्युलाइज करने के लिए मुख्यालय से अनुमति मांगी गई थी, जो नहीं मिली। अफसरों के मुताबिक करीब सवा साल से चल रहे बाघिन के रेस्क्यु में 62 लाख रुपये का बजट खर्च हो चुका है। बाघिन की सटीक लोकेशन मिलने की सूचना पर जिलाधिकारी नितीश कुमार और सीडीओ चंद्र मोहन गर्ग भी फोन के जरिए जानकारी लेते रहे।
टैंक में दहाड़ रही बाघिन
बाघिन का ठिकाना जिस टैंक में है उसकी परिधि दस मीटर और ऊंचाई 25 फीट है। डीएफओ भारत लाल ने बताया कि टैंक से बाहर निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता है। जैसे ही वह बाहर निकलेगी पिंजड़े में कैद हो जाएगी। उसे बाहर निकालने के लिए टीम के सदस्य सीढ़ियों के जरिए टैंक पर चढ़कर उसे उकसा रहे हैं। जिससे वह टैंक में दहाड़ रही है। उम्मीद है कि बाघिन धूप, बारिश या शिकार, पानी की तलाश में बाहर जरूर निकलेगी।बाघिन को पकड़ने की सूचना पर पहुंचे ग्रामीण
रबर फैक्टरी में सुबह से ही अफसरों की आवाजाही और वाहनों की लंबी कतार देखकर आसपास के गांवों के लोग रबर फैक्टरी के मेन गेट पर पहुंच गए। डीएफओ ने बताया कि कुछ ग्रामीण फैक्टरी की दीवार फांदकर टैंक तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। जिन्हें तत्काल वहां से भगाया गया। साथ ही, वापस लौटने पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई।रेस्क्यू में जुटे अफसर और टीम
मुख्य वन सरंक्षक ललित वर्मा, वन संरक्षक जावेद अख्तर, डीएफओ भारत लाल, रेंजर रविंद्र सक्सेना, वैभव सक्सेना, संतोष शर्मा, अरुण श्रीवास्तव, मुकेश कांडपाल, राजेश शर्मा, नीलमणि, डिवीजन के सौ अन्य कर्मचारी समेत आठ प्राइवेट कर्मचारी बाघिन के रेस्क्यू में जुटे हुए हैं। डब्ल्यूटीआई और दुधवा के चिकित्सक दक्ष और रंजन राठौर का अहम योगदान रहा।पिछले डेढ़ साल में कहां-कहां से आए विशेषज्ञ
वन विभाग का लखनऊ हेड ऑफिस, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट देहरादून, वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ दिल्ली, कानपुर चिड़ियाघर, दुधवा नेशनल पार्क, टाइगर रिजर्व पीलीभीत, बरेली, शाहजहांपुर, बदायूँ, पीलीभीत से वन विभाग की टीम, वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के विशेषज्ञ ने रेस्क्यु किया है।
- 13 मार्च 2020 को पहली बार दिखी बाघिन।
- 16 मार्च 2020 कैमरे में पहली बार दिखी।
- 05 मिशन फ्लॉप हो चुके हैं बाघिन को पकड़ने के।
- 17 जून 2021 को मिली सटीक लोकेशन, छठां रेस्क्यु शुरू।
- 11 सीसी कैमरे वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने लगाए।
- नौ सीसी कैमरे पीलीभीत टाइगर रिजर्व से आए हैं।
- 19 सीसी कैमरे वन विभाग की ओर से लगाए गए।
- 02 पिंजड़ा, दो ट्रेंक्युलाइज रूम, 48 पग मार्ग इम्प्रेशन पैड लगे।
- 06 मचान से निगरानी और 50 खाबड़ यानी जाल लगे हैं।
- 11 फीट लंबाई और 150 किलो है बाघिन का वजन।
‘लगातार लोकेशन बदलने की वजह से बाघिन की सटीक लोकेशन नहीं मिल पा रही थी। टीम अबकी बार मुस्तैदी से उसकी सटीक लोकेशन खोजने में सफल रही। वह मंदिर के पास स्थित एक टैंक में घुसी थी जहां घेराबंदी कर दी गई है। जैसे ही वह बाहर निकलेगी पिंजड़े में कैद हो जाएगी, ट्रेंक्युलाइज नहीं करना होगा।’ - भारत लाल, डीएफओ
’ट्रेंक्युलाइज के लिए मुख्यालय से अनुमति मांगी थी लेकिन वहां से पिंजड़े में कैद करने के प्रयास का सुझाव मिला। निर्देश के तहत काम हो रहा है। उम्मीद है कि बृहस्पतिवार की रात या शुक्रवार सुबह वह बाहर निकले। पकड़ में आने पर किशनपुर सेंक्चुरी छोड़ा जाएगा। उसका नाम शर्मीली रखा गया है।’ - ललित वर्मा, मुख्य वन संरक्षक