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गन्ने की फसल को बाघ समझ बैठे हैं जंगल का ही हिस्सा
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गन्ने की फसल भी नरकुल जैसी होती है ऊंची, अपने आशियाने के लिए बाघ को है यह काफी पसंद
लखीमपुर खीरी। गन्ने की फसल तैयार होने के साथ ही जंगल से सटे इलाकों में बाघ के हमलों की घटनाओं में इजाफा हुुआ है। चाहे दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन हो या फिर दक्षिण खीरी वन प्रभाग के गोला और मोहम्मदी रेंज का इलाका, सभी जगह बाघ जंगल से निकलकर खेतों में डेरा जमाए है। विशेषज्ञों के मुताबिक, बाघ गन्ने के खेतों में जंगल जैसा वातावरण महसूस करते हैं, इसलिए उनकी चहलकदमी आए दिन देखी जा सकती है।
दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन के बेलरायां रेंज के मंझरा खैरटिया के अलावा पलिया रेंज में गन्ने के खेतों में मौजूद बाघ इंसानों पर हमले कर रहे हैं। उधर, दक्षिण वन प्रभाग गोला और मोहम्मदी रेंज में कई बाघ गन्ने के खेतों में बसेरा बनाए हुए हैं।
तराई में गन्ने का उत्पादन बढ़ने के साथ ही मानव-बाघ संघर्ष की घटनाओं में भी इजाफा हुआ है। जंगल से सटे खेतों में खड़ी गन्ने की फसल को बाघ जंगल का ही हिस्सा समझ बैठे हैं। नरकुल के ऊंचे-ऊंचे घास के मैदान में रहना बाघ पसंद करते हैं। गन्ने की फसल भी नरकुल जैसी ऊंची होती है। कई बाघ तो स्थायी रूप से खेतों को ही अपना बसेरा बना चुके हैं। इन्हें विशेषज्ञों ने शुगर केन टाइगर का नाम भी दे दिया है।
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छिपने की जगह के साथ ही मिलता है पर्याप्त भोजन
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक का कहना है कि सर्दियों में बाघ और दूसरे वन्यजीव अक्सर जंगल से निकलकर गन्ने के खेतों में आ जाते हैं, यहां उन्हें छिपने की जगह के साथ-साथ पर्याप्त भोजन भी मिलता है। आमतौर पर अस्वस्थ या कमजोर बाघ आसान शिकार की तलाश में जंगल से बाहर आते हैं। गर्भवती होने पर मादा बाघ सुरक्षित स्थान की तलाश में भी गन्ने के खेतों का आश्रय लेती हैं। गन्ने के खेत में उन्हें जंगल के वातावरण का एहसास होता है। सर्दियों में बड़ी संख्या में शाकाहारी पशु भी खेतों में आ जाते हैं। बाघों को खेतों में नीलगाय और लावारिस पशु के रूप में भी पर्याप्त भोजन मिल जाता है।
गन्ने के खेतों में अपनी टेरीटरी बना रहे बाघ
डीएफओ साउथ संजय विश्वाल कहते हैं कि तराई के जंगल में बाघों की संख्या बढ़ रही है। इस कारण बाघ अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। वन भूमि पर अतिक्रमण और जंगल के सीमित दायरे में बढ़ती संख्या के कारण अब बाघों को गन्ने के खेतों तक अपनी टेरीटरी बनानी पड़ रही है। करीब तीन महीने से दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मोहम्मदी रेंज नेपाल से आया जंगली हाथियों का बड़ा झुंड डेरा डाले हुए है। ऐसे में बाघ और तेंदुए जंगल से निकलकर खेतों में विचरण कर रहे हैं।
तराई में बढ़ते मानव-बाघ संघर्ष को रोकने के लिए लगातार प्रयास जारी हैं। जंगल में बाघों की खाद्य शृंखला को मजबूत करने के लिए ग्रासलैंड और वेटलैंड मैनेजमेंट पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा बाघों को एक जंगल से दूसरे जंगल जाने के लिए सुरक्षित कॉरीडोर देने का प्रयास किया जा रहा है।
- संजय पाठक, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व
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लखीमपुर खीरी। गन्ने की फसल तैयार होने के साथ ही जंगल से सटे इलाकों में बाघ के हमलों की घटनाओं में इजाफा हुुआ है। चाहे दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन हो या फिर दक्षिण खीरी वन प्रभाग के गोला और मोहम्मदी रेंज का इलाका, सभी जगह बाघ जंगल से निकलकर खेतों में डेरा जमाए है। विशेषज्ञों के मुताबिक, बाघ गन्ने के खेतों में जंगल जैसा वातावरण महसूस करते हैं, इसलिए उनकी चहलकदमी आए दिन देखी जा सकती है।
दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन के बेलरायां रेंज के मंझरा खैरटिया के अलावा पलिया रेंज में गन्ने के खेतों में मौजूद बाघ इंसानों पर हमले कर रहे हैं। उधर, दक्षिण वन प्रभाग गोला और मोहम्मदी रेंज में कई बाघ गन्ने के खेतों में बसेरा बनाए हुए हैं।
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तराई में गन्ने का उत्पादन बढ़ने के साथ ही मानव-बाघ संघर्ष की घटनाओं में भी इजाफा हुआ है। जंगल से सटे खेतों में खड़ी गन्ने की फसल को बाघ जंगल का ही हिस्सा समझ बैठे हैं। नरकुल के ऊंचे-ऊंचे घास के मैदान में रहना बाघ पसंद करते हैं। गन्ने की फसल भी नरकुल जैसी ऊंची होती है। कई बाघ तो स्थायी रूप से खेतों को ही अपना बसेरा बना चुके हैं। इन्हें विशेषज्ञों ने शुगर केन टाइगर का नाम भी दे दिया है।
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छिपने की जगह के साथ ही मिलता है पर्याप्त भोजन
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक का कहना है कि सर्दियों में बाघ और दूसरे वन्यजीव अक्सर जंगल से निकलकर गन्ने के खेतों में आ जाते हैं, यहां उन्हें छिपने की जगह के साथ-साथ पर्याप्त भोजन भी मिलता है। आमतौर पर अस्वस्थ या कमजोर बाघ आसान शिकार की तलाश में जंगल से बाहर आते हैं। गर्भवती होने पर मादा बाघ सुरक्षित स्थान की तलाश में भी गन्ने के खेतों का आश्रय लेती हैं। गन्ने के खेत में उन्हें जंगल के वातावरण का एहसास होता है। सर्दियों में बड़ी संख्या में शाकाहारी पशु भी खेतों में आ जाते हैं। बाघों को खेतों में नीलगाय और लावारिस पशु के रूप में भी पर्याप्त भोजन मिल जाता है।
गन्ने के खेतों में अपनी टेरीटरी बना रहे बाघ
डीएफओ साउथ संजय विश्वाल कहते हैं कि तराई के जंगल में बाघों की संख्या बढ़ रही है। इस कारण बाघ अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। वन भूमि पर अतिक्रमण और जंगल के सीमित दायरे में बढ़ती संख्या के कारण अब बाघों को गन्ने के खेतों तक अपनी टेरीटरी बनानी पड़ रही है। करीब तीन महीने से दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मोहम्मदी रेंज नेपाल से आया जंगली हाथियों का बड़ा झुंड डेरा डाले हुए है। ऐसे में बाघ और तेंदुए जंगल से निकलकर खेतों में विचरण कर रहे हैं।
तराई में बढ़ते मानव-बाघ संघर्ष को रोकने के लिए लगातार प्रयास जारी हैं। जंगल में बाघों की खाद्य शृंखला को मजबूत करने के लिए ग्रासलैंड और वेटलैंड मैनेजमेंट पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा बाघों को एक जंगल से दूसरे जंगल जाने के लिए सुरक्षित कॉरीडोर देने का प्रयास किया जा रहा है।
- संजय पाठक, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व