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खानकाह नियाजिया के लोगों ने धारण किए फकीरी लिबास
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दुआ करते लोग।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
बरेली। मोहर्रम पर अजादारी का सिलसिला बदस्तूर जारी है, इसी कड़ी में खानकाह नियाजिया के लोगों ने फकीरी लिबास धारण कर लिया है। वहीं शिया हलकों में मातमो मजलिस का सिलसिला जारी है।
हजरत इमाम हुसैन की याद में इन दिनों शहर में कोरोना के चलते सामाजिक दूरी का ख्याल रखते हुए मोहर्रम मनाया जा रहा है। इस सिलसिले में मोहर्रम का चौथा दिन खानकाह नियाजिया में खास रहा, यहां सोमवार को खानवादों और शहर के कई मुरीदों ने हरे रंग का फकीरी लिबास पहन लिया है और गमे हुसैन में डूब गए हैं। खानकाह का इमामबाड़ा भी खोल दिया गया है और यहां नियाज नजर का सिलसिला शुरू हो गया है। अलबत्ता अकीदतमंदों के भीड़ में आने पर पाबंदी रखी गई है, जबकि लंगर का सिलसिला पहली मोहर्रम से बदस्तूर जारी है।
खानकाह के प्रबंधक शब्बू मियां नियाजी का कहना है कि लोग इमाम हुसैन की याद में अपने घरों पर नियाज नजर करें, यदि कुछ और अकीदतमंद आना चाहें तो उनकी संख्या दो-तीन से अधिक न हो। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी से लड़ने के लिए सामाजिक दूरी का पालन और जब बहुत आवश्यक हो तभी घर से बाहर छोड़ें। उधर, शिया हलकों में पहली मोहर्रम से चल रही अजादारी बदस्तूर कायम है। सोमवार को भी इमामबाड़ा और कई घरों पर मजलिस मातम का सिलसिला जारी रहा।
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हजरत इमाम हुसैन की याद में इन दिनों शहर में कोरोना के चलते सामाजिक दूरी का ख्याल रखते हुए मोहर्रम मनाया जा रहा है। इस सिलसिले में मोहर्रम का चौथा दिन खानकाह नियाजिया में खास रहा, यहां सोमवार को खानवादों और शहर के कई मुरीदों ने हरे रंग का फकीरी लिबास पहन लिया है और गमे हुसैन में डूब गए हैं। खानकाह का इमामबाड़ा भी खोल दिया गया है और यहां नियाज नजर का सिलसिला शुरू हो गया है। अलबत्ता अकीदतमंदों के भीड़ में आने पर पाबंदी रखी गई है, जबकि लंगर का सिलसिला पहली मोहर्रम से बदस्तूर जारी है।
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खानकाह के प्रबंधक शब्बू मियां नियाजी का कहना है कि लोग इमाम हुसैन की याद में अपने घरों पर नियाज नजर करें, यदि कुछ और अकीदतमंद आना चाहें तो उनकी संख्या दो-तीन से अधिक न हो। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी से लड़ने के लिए सामाजिक दूरी का पालन और जब बहुत आवश्यक हो तभी घर से बाहर छोड़ें। उधर, शिया हलकों में पहली मोहर्रम से चल रही अजादारी बदस्तूर कायम है। सोमवार को भी इमामबाड़ा और कई घरों पर मजलिस मातम का सिलसिला जारी रहा।
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