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खंडहर हो गईं इमारतें, कौन संवारेगा
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Mon, 18 Apr 2016 12:22 AM IST
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बरेली कालेज
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किसी भी शहर का गौरवशाली इतिहास जानना हो तो वहां इमारतों को देखिए। लेकिन अपने जिले की प्राचीन इमारतें खंडहर होती जा रही हैं। उनकी न किसी को फिक्र है न ही कोई संरक्षित करने वाला। स्मारकों पर लगे पत्थर तोड़े जा रहे हैं। फतेहगंज में अंग्रेजों और रूहेलों की लड़ाई का मुख्य केंद्र रहे स्मारक का पत्थर गायब हो गया है। यही स्थिति बरेली कॉलेज सभागार में लगे पत्थर की भी है। इस पत्थर पर कॉलेज को डोनेट करने वाले लोगों के नाम भी लिखे थे, लेकिन अब इसका नामों-निशान भी नहीं है। इतिहास का प्रमाण बताने वाले ये पत्थर टूट गए हैं।
बरेली फोर्ट
मध्य काल में बरेली फोर्ट मिट्टी का बना छोटा किला था। यहां से चौकसी की जाती थी। मुगलों के आने के बाद उन्होंने यहां पर सेना की टुकड़ी पहरे के लिए बैठा दी गई। अंग्रेजी के आक्रमण के बाद 1801-1807 में बरेली कैंट बसाया गया। 1816 में फोर्ट को ईंटों से बना दिया। रुहेलखंड विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विभाग के प्रो. अभय कुमार सिंह ने बताया कि खान बहादुर खां को 1858 में यहां पर कैद करके रखा गया। तीन साल पहले यहां पर संग्रहालय भी बनाया गया था। बाहर से आने वाले लोग यहां पर देखने जाते थे। इस साल सेना ने इसे बंद कर दिया। अब यहां पर कोई भी नहीं जा सकता।
मिर्जाई मस्जिद
शहंशाह अकबर ने पुराना शहर स्थित इस मस्जिद का निर्माण 1851 में कराया था। इसकी बनावट मुगल काल की याद दिलाती है। इसकी स्थापत्य कला में भी मुगल काल की कलाकारी दिखती है। वजू के लिए बनी हौज एशिया में सबसे बड़ा है। दिल्ली में खूबसूरत हौज है, लेकिन इतना बड़ा नहीं। यह ऐतिहासिक मस्जिद है। दूर-दूर से लोग मिर्जाई मस्जिद में इबादत करने के लिए आते हैं।
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विक्टोरिया पैटर्न पर बना बरेली कॉलेज
ईस्ट इंडिया कंपनी की कलकत्ता प्रेसीडेंसी की ओर से 1837 में बरेली स्कूल स्थापित किया गया। यही विकसित होकर बरेली कॉलेज बना। 1905 में लार्ड कर्जन ने एक पत्र भेजा, जिसमें लिखा था कि अगर बिल्डिंग नहीं बनवाएंगे तो ग्रांट बंद कर दी जाएगी। 1902 में रानी विक्टोरिया की मौत के बाद उस पैटर्न पर देशभर में निर्माण कराए गए। इस पैटर्न पर ही बरेली कॉलेज की भी बिल्डिंग बनी। सबसे पहले 1906 में सभागार का निर्माण कराया गया।
बिहारी जी का मंदिर
राजा मकरंद राय खत्री ने 1657 में बिहारी जी का मंदिर बनवाया गया था। मंदिर की दीवारें अब भले ही खंडहर में बदलने लगी हैं, लेकिन उसकी डिजाइन और कलाकारी में अलग नजारा दिखता है। मंदिर के मेहराब उस समय की स्थापत्य कला बताने के लिए काफी हैं। मंदिर अब काफी जर्जर हो चुका है। इसे संजोने वाला कोई नहीं है। शहर की इतनी प्राचीन इमारत होने के बाद भी इसे संरक्षित करने के प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। इसके बाद मकरंदपुर, आलमगिरीगंज, मलूकपुर, कुंवरपुर और बिहारीपुरा मोहल्ला भी बसाए गए।
कैंट की क्रिश्चियन सेमेट्री
अंग्रेज इल्का सिंकलेयर की पत्नी का देहांत होने के बाद 18वीं सदी में उनकी याद में यह स्मृति स्थल बनवाया था। परी के रूप में बने इस स्मृति स्थल को सेमेट्री के नाम से जानते हैं।
अकब कोतवाली
कुतबखाने के पास अतब कोतवाली हुआ करती थी। यहां 24 मार्च 1860 को रूहेलखंड के नवाब महान क्रांतिकारी खान बहादुर खां को फांसी दी गई थी, लेकिन आज की नई पीढ़ी को इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व की जानकारी नहीं है। इसकी ऐतिहासिकता को बताने वाला कोई शिलापट्ट भी यहां पर नहीं लगाया गया है, इसलिए कुछ लोग वर्तमान कोतवाली को तो कुछ जिला कारागार को नवाब खान बहादुर खां का फांसी स्थल मानते हैं, जो कि गलत है। यह भी उल्लेखनीय है कि इसी स्थान (अकब कोतवाली) पर 31 मई 1857 को बरेली की आजादी के एलान के साथ ही खान बहादुर खान को रूहेलखंड का नवाब घोषित किया गया था।
शहीद स्थल कमिश्नरी
कमिश्नरी परिसर में आज जहां शहीद स्तंभ बना है, वहां 1858 में अंग्रेजों ने अनेक क्रांतिकारियों को बरगद के वृक्ष से लटकाकर फंसी दी थी। देशभक्तों को इस तरह फांसी देने का मकसद यहां का जनता में दहशत पैदा करना था। ब्रिटिश का ऐसा क्रूर चेहरा तब बरेली ने देखा था। बरगद का वह मूल वृक्ष पिछली सदी में 80 के दशक में नष्ट हो गया था पर उनके इर्द-गिर्द बाद में पनपे बरगद के वृक्ष अब भी यहां मौजूद हैं। उन क्रांतिकारियों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने यहां यदा-कदा ही कोई आता है।
नौमहला मस्जिद
ऐतिहासिक नौमहला मस्जिद में 22 मई 1857 को जुमे की नमाज के बाद बरेली कॉलेज के शिक्षक मौलवी महमूद अहसन ने एक जोशीली तकरीर के जरिए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत के लिए लोगों को प्रेरित किया था। उनकी तकरीर से वहां नमाज पढ़ने आए छावनी के सैनिकों, शहर के नागरिकों, बरेली कॉलेज के शिक्षक और छात्रों में विद्रोह के लिए काफी जोश भर गया था। यह मस्जिद क्रांति का एक केंद्र बन गई थी। बरेली पर अंग्रेजों को मई 1858 में दोबारा कब्जे से पहले हुए अंतिम युद्ध में नौमहला के गाजियों ने असाधारण बहादुरी का प्रदर्शन किया था।
हाफिज रहमत खां का मकबरा
हाफिज रहमद खां ने 1749 में रूहेलखंड के शासन की बागडोर संभाली थी। उनके 25 वर्षों के शासनकाल में समूचा रूहेलखंड हिंदू-मुस्लिम की मिसाल बनकर उभरा। हिंदुओं का उनके शासनकाल में वर्चस्व था। पहले दीवान राजा मानराय बने तो बाद में राव पहाड़ सिंह ने इस पद को सुशोभित किया। ठाकुर और राजपूत अच्छी संख्या में उनकी फौज में थे। प्रशासनिक सेवाओं में वैश्य और कायस्थ ज्यादातर पदों पर थे। अंग्रेजों ने अवध के नवाब सुजाउद्दौला के साथ मिलकर उनके विरुद्ध अप्रैल 1774 में शाहजहांपुर से मीरानपुर कटरा में जो युद्ध लड़ा, उसमें 24 अप्रैल 1774 को वह शहीद हो गए। उन्हें बरेली के वाकरगंज स्थित एक बाग में 24 अप्रैल को दफनाया गया। यहां उनके दीवान पहाड़ सिंह ने एक भव्य मकबरा बनवाया थ्रा जो जीर्ण-शीर्ण हो गया है।
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बरेली फोर्ट
मध्य काल में बरेली फोर्ट मिट्टी का बना छोटा किला था। यहां से चौकसी की जाती थी। मुगलों के आने के बाद उन्होंने यहां पर सेना की टुकड़ी पहरे के लिए बैठा दी गई। अंग्रेजी के आक्रमण के बाद 1801-1807 में बरेली कैंट बसाया गया। 1816 में फोर्ट को ईंटों से बना दिया। रुहेलखंड विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विभाग के प्रो. अभय कुमार सिंह ने बताया कि खान बहादुर खां को 1858 में यहां पर कैद करके रखा गया। तीन साल पहले यहां पर संग्रहालय भी बनाया गया था। बाहर से आने वाले लोग यहां पर देखने जाते थे। इस साल सेना ने इसे बंद कर दिया। अब यहां पर कोई भी नहीं जा सकता।
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मिर्जाई मस्जिद
शहंशाह अकबर ने पुराना शहर स्थित इस मस्जिद का निर्माण 1851 में कराया था। इसकी बनावट मुगल काल की याद दिलाती है। इसकी स्थापत्य कला में भी मुगल काल की कलाकारी दिखती है। वजू के लिए बनी हौज एशिया में सबसे बड़ा है। दिल्ली में खूबसूरत हौज है, लेकिन इतना बड़ा नहीं। यह ऐतिहासिक मस्जिद है। दूर-दूर से लोग मिर्जाई मस्जिद में इबादत करने के लिए आते हैं।
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विक्टोरिया पैटर्न पर बना बरेली कॉलेज
ईस्ट इंडिया कंपनी की कलकत्ता प्रेसीडेंसी की ओर से 1837 में बरेली स्कूल स्थापित किया गया। यही विकसित होकर बरेली कॉलेज बना। 1905 में लार्ड कर्जन ने एक पत्र भेजा, जिसमें लिखा था कि अगर बिल्डिंग नहीं बनवाएंगे तो ग्रांट बंद कर दी जाएगी। 1902 में रानी विक्टोरिया की मौत के बाद उस पैटर्न पर देशभर में निर्माण कराए गए। इस पैटर्न पर ही बरेली कॉलेज की भी बिल्डिंग बनी। सबसे पहले 1906 में सभागार का निर्माण कराया गया।
बिहारी जी का मंदिर
राजा मकरंद राय खत्री ने 1657 में बिहारी जी का मंदिर बनवाया गया था। मंदिर की दीवारें अब भले ही खंडहर में बदलने लगी हैं, लेकिन उसकी डिजाइन और कलाकारी में अलग नजारा दिखता है। मंदिर के मेहराब उस समय की स्थापत्य कला बताने के लिए काफी हैं। मंदिर अब काफी जर्जर हो चुका है। इसे संजोने वाला कोई नहीं है। शहर की इतनी प्राचीन इमारत होने के बाद भी इसे संरक्षित करने के प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। इसके बाद मकरंदपुर, आलमगिरीगंज, मलूकपुर, कुंवरपुर और बिहारीपुरा मोहल्ला भी बसाए गए।
कैंट की क्रिश्चियन सेमेट्री
अंग्रेज इल्का सिंकलेयर की पत्नी का देहांत होने के बाद 18वीं सदी में उनकी याद में यह स्मृति स्थल बनवाया था। परी के रूप में बने इस स्मृति स्थल को सेमेट्री के नाम से जानते हैं।
अकब कोतवाली
कुतबखाने के पास अतब कोतवाली हुआ करती थी। यहां 24 मार्च 1860 को रूहेलखंड के नवाब महान क्रांतिकारी खान बहादुर खां को फांसी दी गई थी, लेकिन आज की नई पीढ़ी को इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व की जानकारी नहीं है। इसकी ऐतिहासिकता को बताने वाला कोई शिलापट्ट भी यहां पर नहीं लगाया गया है, इसलिए कुछ लोग वर्तमान कोतवाली को तो कुछ जिला कारागार को नवाब खान बहादुर खां का फांसी स्थल मानते हैं, जो कि गलत है। यह भी उल्लेखनीय है कि इसी स्थान (अकब कोतवाली) पर 31 मई 1857 को बरेली की आजादी के एलान के साथ ही खान बहादुर खान को रूहेलखंड का नवाब घोषित किया गया था।
शहीद स्थल कमिश्नरी
कमिश्नरी परिसर में आज जहां शहीद स्तंभ बना है, वहां 1858 में अंग्रेजों ने अनेक क्रांतिकारियों को बरगद के वृक्ष से लटकाकर फंसी दी थी। देशभक्तों को इस तरह फांसी देने का मकसद यहां का जनता में दहशत पैदा करना था। ब्रिटिश का ऐसा क्रूर चेहरा तब बरेली ने देखा था। बरगद का वह मूल वृक्ष पिछली सदी में 80 के दशक में नष्ट हो गया था पर उनके इर्द-गिर्द बाद में पनपे बरगद के वृक्ष अब भी यहां मौजूद हैं। उन क्रांतिकारियों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने यहां यदा-कदा ही कोई आता है।
नौमहला मस्जिद
ऐतिहासिक नौमहला मस्जिद में 22 मई 1857 को जुमे की नमाज के बाद बरेली कॉलेज के शिक्षक मौलवी महमूद अहसन ने एक जोशीली तकरीर के जरिए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत के लिए लोगों को प्रेरित किया था। उनकी तकरीर से वहां नमाज पढ़ने आए छावनी के सैनिकों, शहर के नागरिकों, बरेली कॉलेज के शिक्षक और छात्रों में विद्रोह के लिए काफी जोश भर गया था। यह मस्जिद क्रांति का एक केंद्र बन गई थी। बरेली पर अंग्रेजों को मई 1858 में दोबारा कब्जे से पहले हुए अंतिम युद्ध में नौमहला के गाजियों ने असाधारण बहादुरी का प्रदर्शन किया था।
हाफिज रहमत खां का मकबरा
हाफिज रहमद खां ने 1749 में रूहेलखंड के शासन की बागडोर संभाली थी। उनके 25 वर्षों के शासनकाल में समूचा रूहेलखंड हिंदू-मुस्लिम की मिसाल बनकर उभरा। हिंदुओं का उनके शासनकाल में वर्चस्व था। पहले दीवान राजा मानराय बने तो बाद में राव पहाड़ सिंह ने इस पद को सुशोभित किया। ठाकुर और राजपूत अच्छी संख्या में उनकी फौज में थे। प्रशासनिक सेवाओं में वैश्य और कायस्थ ज्यादातर पदों पर थे। अंग्रेजों ने अवध के नवाब सुजाउद्दौला के साथ मिलकर उनके विरुद्ध अप्रैल 1774 में शाहजहांपुर से मीरानपुर कटरा में जो युद्ध लड़ा, उसमें 24 अप्रैल 1774 को वह शहीद हो गए। उन्हें बरेली के वाकरगंज स्थित एक बाग में 24 अप्रैल को दफनाया गया। यहां उनके दीवान पहाड़ सिंह ने एक भव्य मकबरा बनवाया थ्रा जो जीर्ण-शीर्ण हो गया है।