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सुभाष नगर की रामलीला में यंगिस्तान की बड़ी भागीदारी
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Mon, 26 Sep 2016 01:20 AM IST
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अपने में व्यस्त रहने वाला और टेकभनोफ्रेंडली यूथ अब भी अपने कल्चर और ट्रेडिशन को नहीं भूला है। अपनी परंपराओं को आने वाली जेनरेशन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी बखूबी उठा रखी है। पर्सनल से प्रोफेशनल लाइफ में तमाम रोल निभाने वाले युवा रामलीला में भी अपने चिर-परिचित जोश के साथ अभिनय कर रहे हैं। सुभाष नगर में शुरू होने वाली रामलीला में भी यंगिस्तान बराबरी का भागीदार है। इस बार यह कमेटी 75वीं बार रामलीला का आयोजन कर रही है।
सुभाष नगर में रामलीला की शुरुआत 1938 में हुई थी। तब बरेली में एक मात्र रामलीला चौधरी तालाब पर ही हुआ करती थी, जिसे देखने क्षेत्र के ही गौरीशंकर अग्रवाल, बाबू प्रसाद शुक्ला, भैरो टंडन और हजारी प्रसाद भी गए थे। वहां उन्हें प्रदर्शन देखकर संतुष्टि नहीं हुई तो उन्होंने अपने क्षेत्र में लीला के मंचन की सोची। अगले वर्ष 1939 में स्व. अयोध्या प्रसाद की टाल पर, जहां वर्तमान में पुरानी सब्जी मंडी है, बाहर से मंडली बुलाकर लीला का मंचन कराया गया। उस वक्त गौरी शंकर अग्रवाल और हजारी लाल (चौबे जी) ने महसूस किया कि लीला में स्थानीय युवा कलाकारों को मौका दिया जाए। फिर लोगों से संपर्क कर साजो-सामान और कलाकार जुटाए गए। जहां आज सेंट्रल बैंक है, वहां पहली बार स्थानीय कलाकारों ने लीला का मंचन 1940 में किया। उस वक्त मंचन से पूर्व पहला नाटक ‘श्रवण कुमार’ खेला गया, जिसमें वीडी अग्रवाल ने दशरथ और राम किशन मेहरोत्रा ने श्रवण कुमार का रोल किया था। इसी नाटक से आज भी लीला की शुरुआत होती है।
इसके बाद 1941 में कमेटी पंजीकृत कराई गई। इसी साल मंचन स्थल सेंट्रल बैंक वाले स्थान से हटाकर वहां किया गया जहां वर्तमान में धर्मशाला है। उस वक्त दशरथ की भूमिका शिव कुमार वाजपेयी, राम की भूमिका ओम प्रकाश अवस्थी, लक्ष्मण की भूमिका राजा राम श्रीवास्तव और मां सीता का किरदार सुरेश किल्सन ने निभाया था। 1942 में बल्ली आदि का स्टेज बना करता था, जो 1945 में टिन शेड में बदल गया। उस वक्त रामलीला स्थल पर अंग्रेज चांदमारी भी किया करते थे। 1947 में चांदमारी मैदान पूर्ण रूप से सभा को मिल गया, जिसे अब रामलीला मैदान के नाम से जाना जाता है।
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वर्तमान में इस सभा के अध्यक्ष अशोक कुमार शर्मा और मंत्री आलोक तायल हैं। पहले व्यास गद्दी का संचालन पंडित रघुवीर कुमार चौबे किया करते थे, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद से अब लगभग 16 सालों से इस गद्दी को पंडित प्रदीप कुमार चौबे संभाल रहे हैं। पंडित प्रदीप चौबे के मुताबिक यह बरेली की एकमात्र कमेटी (सभा) है, जो कथावाचस्पति पंडित राधेश्याम द्वारा रचित रामायण की तर्ज पर काव्य रूप की वीर रस शैली में रामायण पाठ करती है। पंडित राधेश्याम रचित रामायण पाठ पर पिछले आठ वर्षों से रिसर्च करने के लिए कैलिफोर्निया से पामेला लेटस्पाई आती थीं, यही नहीं वह रामलीला में केवट की पत्नी का रोल भी करती थीं। रामलीला का मंचन करने वाले आर्टिस्ट्स बरेली के ही युवा हैं। इस बार रामलीला का मंचन 28 सितंबर से 11 अक्टूबर तक किया जाएगा। 13 अक्तूबर को राजगद्दी और राज्याभिषेक होगा। अशोक कुमार शर्मा और आलोक तायल ने बताया कि सुभाष नगर श्री रामलीला सभा कमेटी में सभी लेवल के मेंबर्स मिलाकर कुल 120 लोग हैं, जिसमें से 90 युवा हैं और सभी पढ़े-लिखे, गवर्नमेंट या प्राइवेट जॉब करने वाले हैं। इसलिए रिहर्सल में तीन-चार महीने का समय लग जाता है। हमारी रिहर्सल जुलाई से शुरू हो जाती है। डायरेक्टर अखिलेश सिंह के नेतृत्व में कलाकार शाम को फुर्सत मिलने पर रिहर्सल शुरू करते हैं, जो रात 11 बजे तक चलती है। जो लोग बाहर नौकरी करते हैं वह 15 दिनों की छुट्टी लेकर परंपरा निभाने आते हैं। कलाकारों के कपड़े और सजने का सामान बरेली से ही जुटाया जाता है।
रावण ने की थी राम की पंडिताई
बरेली। यहां की रामलीला की विशेषता वध से पूर्व रावण का राम के यहां आकर पंडिताई करना है। दृश्य होता है सेतु बंध रामेश्वरम् के निर्माण का। राम ने पूजा कराने के लिए पंडित रावण को बुलाया था। रावण ने पूरे विधिविधान से पूजा कराकर खुद पहला पत्थर उठाकर राम को सौंपा था, जिसे बाद में राम ने नल-नील को समुद्र में डालने के लिए दिया था। इस लीला का मंचन स्टेज के पीछे बने शिव मंदिर में किया जाता है।
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सुभाष नगर में रामलीला की शुरुआत 1938 में हुई थी। तब बरेली में एक मात्र रामलीला चौधरी तालाब पर ही हुआ करती थी, जिसे देखने क्षेत्र के ही गौरीशंकर अग्रवाल, बाबू प्रसाद शुक्ला, भैरो टंडन और हजारी प्रसाद भी गए थे। वहां उन्हें प्रदर्शन देखकर संतुष्टि नहीं हुई तो उन्होंने अपने क्षेत्र में लीला के मंचन की सोची। अगले वर्ष 1939 में स्व. अयोध्या प्रसाद की टाल पर, जहां वर्तमान में पुरानी सब्जी मंडी है, बाहर से मंडली बुलाकर लीला का मंचन कराया गया। उस वक्त गौरी शंकर अग्रवाल और हजारी लाल (चौबे जी) ने महसूस किया कि लीला में स्थानीय युवा कलाकारों को मौका दिया जाए। फिर लोगों से संपर्क कर साजो-सामान और कलाकार जुटाए गए। जहां आज सेंट्रल बैंक है, वहां पहली बार स्थानीय कलाकारों ने लीला का मंचन 1940 में किया। उस वक्त मंचन से पूर्व पहला नाटक ‘श्रवण कुमार’ खेला गया, जिसमें वीडी अग्रवाल ने दशरथ और राम किशन मेहरोत्रा ने श्रवण कुमार का रोल किया था। इसी नाटक से आज भी लीला की शुरुआत होती है।
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इसके बाद 1941 में कमेटी पंजीकृत कराई गई। इसी साल मंचन स्थल सेंट्रल बैंक वाले स्थान से हटाकर वहां किया गया जहां वर्तमान में धर्मशाला है। उस वक्त दशरथ की भूमिका शिव कुमार वाजपेयी, राम की भूमिका ओम प्रकाश अवस्थी, लक्ष्मण की भूमिका राजा राम श्रीवास्तव और मां सीता का किरदार सुरेश किल्सन ने निभाया था। 1942 में बल्ली आदि का स्टेज बना करता था, जो 1945 में टिन शेड में बदल गया। उस वक्त रामलीला स्थल पर अंग्रेज चांदमारी भी किया करते थे। 1947 में चांदमारी मैदान पूर्ण रूप से सभा को मिल गया, जिसे अब रामलीला मैदान के नाम से जाना जाता है।
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वर्तमान में इस सभा के अध्यक्ष अशोक कुमार शर्मा और मंत्री आलोक तायल हैं। पहले व्यास गद्दी का संचालन पंडित रघुवीर कुमार चौबे किया करते थे, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद से अब लगभग 16 सालों से इस गद्दी को पंडित प्रदीप कुमार चौबे संभाल रहे हैं। पंडित प्रदीप चौबे के मुताबिक यह बरेली की एकमात्र कमेटी (सभा) है, जो कथावाचस्पति पंडित राधेश्याम द्वारा रचित रामायण की तर्ज पर काव्य रूप की वीर रस शैली में रामायण पाठ करती है। पंडित राधेश्याम रचित रामायण पाठ पर पिछले आठ वर्षों से रिसर्च करने के लिए कैलिफोर्निया से पामेला लेटस्पाई आती थीं, यही नहीं वह रामलीला में केवट की पत्नी का रोल भी करती थीं। रामलीला का मंचन करने वाले आर्टिस्ट्स बरेली के ही युवा हैं। इस बार रामलीला का मंचन 28 सितंबर से 11 अक्टूबर तक किया जाएगा। 13 अक्तूबर को राजगद्दी और राज्याभिषेक होगा। अशोक कुमार शर्मा और आलोक तायल ने बताया कि सुभाष नगर श्री रामलीला सभा कमेटी में सभी लेवल के मेंबर्स मिलाकर कुल 120 लोग हैं, जिसमें से 90 युवा हैं और सभी पढ़े-लिखे, गवर्नमेंट या प्राइवेट जॉब करने वाले हैं। इसलिए रिहर्सल में तीन-चार महीने का समय लग जाता है। हमारी रिहर्सल जुलाई से शुरू हो जाती है। डायरेक्टर अखिलेश सिंह के नेतृत्व में कलाकार शाम को फुर्सत मिलने पर रिहर्सल शुरू करते हैं, जो रात 11 बजे तक चलती है। जो लोग बाहर नौकरी करते हैं वह 15 दिनों की छुट्टी लेकर परंपरा निभाने आते हैं। कलाकारों के कपड़े और सजने का सामान बरेली से ही जुटाया जाता है।
रावण ने की थी राम की पंडिताई
बरेली। यहां की रामलीला की विशेषता वध से पूर्व रावण का राम के यहां आकर पंडिताई करना है। दृश्य होता है सेतु बंध रामेश्वरम् के निर्माण का। राम ने पूजा कराने के लिए पंडित रावण को बुलाया था। रावण ने पूरे विधिविधान से पूजा कराकर खुद पहला पत्थर उठाकर राम को सौंपा था, जिसे बाद में राम ने नल-नील को समुद्र में डालने के लिए दिया था। इस लीला का मंचन स्टेज के पीछे बने शिव मंदिर में किया जाता है।