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अफसर ‘खेल’ गए, अब बच्चों के खेलने लायक नहीं बचा ये मैदान
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बरेली। राजकीय इंटर कॉलेज के खेल मैदान पर स्मार्ट सिटी मिशन के तहत सभागार का निर्माण शुरू करा दिया गया है। यह फैसला किस स्तर पर और किन नियमों के तहत हुआ, इस पर सवाल उठाना तो बेमानी है क्योंकि सबकुछ उन्हीं अफसरों का किया-धरा है जिन पर सही-गलत तय करने की जिम्मेदारी है, लेकिन इतना जरूर है कि इस मैदान पर अब बच्चों का खेलना मुश्किल हो गया है।
राजकीय इंटर कॉलेज को 2004 में जिला स्तर पर खेल विद्यालय घोषित किया गया था। उस समय इस कॉलेज में खेलों के लिए सभी जरूरी सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध थे। अफसरों की ही अनदेखी की वजह से धीरे-धीरे यह सुविधाएं और संसाधन नष्ट होते गए और अब इस मैदान पर खेलों का वजूद ही खत्म होने को है। बड़ा सवाल यह है कि खेल मैदान पर अगर स्मार्ट सिटी के तहत किसी परियोजना का निर्माण करना ही था तो वह खेलों से संबंधित भी हो सकता था लेकिन अफसरों ने यहां सभागार बनाने का फैसला लिया, वह भी तब जब केंद्र और राज्य दोनों की सरकारें खेलों के प्रोत्साहन के लिए बड़े-बड़े दावे कर रही हैं। (संवाद)
राष्ट्रीय स्तर के कई एथलीट दे चुका है यह खेल मैदान
2004 में खेल विद्यालय घोषित होने के बाद जीआईसी के मैदान पर 13 साल तक निरंतर जिला स्तरीय खेल प्रतियोगिताएं आयोजित किए जाने का सिलसिला चलता रहा जिस पर 2018 में हुई एथलेटिक्स प्रतियोगिता के बाद विराम लग गया। दरअसल, इसी दौरान कई बार इस मैदान पर प्रशासन के अफसरों ने नुमाइश लगाने की अनुमति दे दी जिसकी वजह से मैदान बुरी तरह ऊबड़खाबड़ हो गया। चार सौ मीटर का एथलेटिक्स ट्रैक भी नष्ट हो गया। इस मैदान को ठीक कराकर खेल सुविधाएं विकसित करने की जरूरत थी लेकिन अफसरों ने इसके बजाय मैदान पर स्मार्ट सिटी की परियोजना का निर्माण शुरू करा दिया।
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अब मैदान पर घनी जंगली घास रेत-बजरी और मिट्टी के ढेर
स्मार्ट सिटी के तहत सभागार का निर्माण शुरू होने के बाद बाकी बचे मैदान की और भी ज्यादा दुर्दशा हो गई है। यहां खोदी गई मिट्टी और मलबे को मैदान में ही डाल दिया गया है। काफी हिस्से में जगह-जगह मिट्टी का ढेर लगे हैं। बाकी मैदान में इस कदर घनी जंगली घास खड़ी है जिसकी वजह से एक कोने से दूसरे कोने तक कुछ दिखाई तक नहीं देता। एथलेटिक्स ट्रैक का नामोनिशान मिट चुका है।
खेलों और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने की पूरे देश में बात हो रही है। खिलाड़ी भी अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं लेकिन मंडल मुख्यालय पर ही खेलों को बढ़ावा देने की कोशिश नहीं की जा रही है। संसाधनों की वजह से खिलाड़ियों का भविष्य नष्ट नहीं होना चाहिए। इसके लिए किसी को तो आवाज उठानी होगी। - नईम अहमद, मंडलीय क्रीड़ा सचिव
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राजकीय इंटर कॉलेज को 2004 में जिला स्तर पर खेल विद्यालय घोषित किया गया था। उस समय इस कॉलेज में खेलों के लिए सभी जरूरी सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध थे। अफसरों की ही अनदेखी की वजह से धीरे-धीरे यह सुविधाएं और संसाधन नष्ट होते गए और अब इस मैदान पर खेलों का वजूद ही खत्म होने को है। बड़ा सवाल यह है कि खेल मैदान पर अगर स्मार्ट सिटी के तहत किसी परियोजना का निर्माण करना ही था तो वह खेलों से संबंधित भी हो सकता था लेकिन अफसरों ने यहां सभागार बनाने का फैसला लिया, वह भी तब जब केंद्र और राज्य दोनों की सरकारें खेलों के प्रोत्साहन के लिए बड़े-बड़े दावे कर रही हैं। (संवाद)
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राष्ट्रीय स्तर के कई एथलीट दे चुका है यह खेल मैदान
2004 में खेल विद्यालय घोषित होने के बाद जीआईसी के मैदान पर 13 साल तक निरंतर जिला स्तरीय खेल प्रतियोगिताएं आयोजित किए जाने का सिलसिला चलता रहा जिस पर 2018 में हुई एथलेटिक्स प्रतियोगिता के बाद विराम लग गया। दरअसल, इसी दौरान कई बार इस मैदान पर प्रशासन के अफसरों ने नुमाइश लगाने की अनुमति दे दी जिसकी वजह से मैदान बुरी तरह ऊबड़खाबड़ हो गया। चार सौ मीटर का एथलेटिक्स ट्रैक भी नष्ट हो गया। इस मैदान को ठीक कराकर खेल सुविधाएं विकसित करने की जरूरत थी लेकिन अफसरों ने इसके बजाय मैदान पर स्मार्ट सिटी की परियोजना का निर्माण शुरू करा दिया।
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अब मैदान पर घनी जंगली घास रेत-बजरी और मिट्टी के ढेर
स्मार्ट सिटी के तहत सभागार का निर्माण शुरू होने के बाद बाकी बचे मैदान की और भी ज्यादा दुर्दशा हो गई है। यहां खोदी गई मिट्टी और मलबे को मैदान में ही डाल दिया गया है। काफी हिस्से में जगह-जगह मिट्टी का ढेर लगे हैं। बाकी मैदान में इस कदर घनी जंगली घास खड़ी है जिसकी वजह से एक कोने से दूसरे कोने तक कुछ दिखाई तक नहीं देता। एथलेटिक्स ट्रैक का नामोनिशान मिट चुका है।
खेलों और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने की पूरे देश में बात हो रही है। खिलाड़ी भी अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं लेकिन मंडल मुख्यालय पर ही खेलों को बढ़ावा देने की कोशिश नहीं की जा रही है। संसाधनों की वजह से खिलाड़ियों का भविष्य नष्ट नहीं होना चाहिए। इसके लिए किसी को तो आवाज उठानी होगी। - नईम अहमद, मंडलीय क्रीड़ा सचिव