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अपने घर-गांव की कीमत समझ आ गई साहब अब मर जाएंगे पर बाहर नहीं जाएंगे

Wed, 06 May 2020 01:23 AM IST
बरेली ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली Published by: बरेली ब्यूरो Updated Wed, 06 May 2020 01:23 AM IST
सार

मजदूरों की किस्मत में ही चोट खाना लिखा होता है लिहाजा गुजरात में सब-कुछ गंवाकर लौटते वक्त भी उन्हें चोट खानी पड़ी। कहने को सरकार ने रेल किराया माफ किया लेकिन जिस एनजीओ को मजदूरों के परिवारों की सूची बनाकर उन्हें ट्रेन में बैठाने जिम्मेदारी मिली, उसने उन्हें लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ठेकेदारों के जरिये किसी मजदूर से पूरा किराया वसूल किया तो किसी से थर्मल स्क्रीनिंग को मेडिकल परीक्षण बताकर उसका पैसा भी रखवा लिया गया। बुरे वक्त में भी मौकापरस्ती का नंगा तमाशा देखकर जंक्शन पर उतरे ज्यादातर मजदूरों ने अमर उजाला से हुई बातचीत में दो टूक कहा कि किस्मत में जो लिखा होगा, उसे बर्दाश्त करेंगे लेकिन अब कभी घर छोड़कर काम करने कहीं और नहीं जाएंगे।
दिल हिलाने वाली कहानियां लेकर लौटे मजदूर
 

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Sahib has understood the value of his home and village, he will die now but will not go out
गुजरात से स्पेशल ट्रेन के जरिए बरेली पहुंचे श्रमिक। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

विस्तार

गुजरात में सबकुछ गंवाकर लौटे मजदूरों ने कहा- अब किस्मत में जो लिखा होगा घर पर ही बर्दाश्त करेंगे
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पूरा मेहनताना नहीं दिया और लंबे सफर पर भूखे पेट ही भगा दिया

बरेली। अपना घरबार छोड़कर कामधंधे के लिए देश में प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा कमाई वाले राज्य गुजरात पहुंचे मजदूरों ने यूं तो खुद ही वहां अपनी जिंदगी में बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं थी लेकिन लॉकडाउन शुरू होने के बाद उन पर जो बीती, उसका दाग उनके चेहरों पर घर लौटने की खुशी के पीछे भी नहीं छिप पाया। ईंट भट्ठों पर काम करने वाले ज्यादातर मजदूरों का काम लॉकडाउन होते ही छिन गया। मालिकों ने रोजी के साथ रोटी भी बंद कर दी। घर आने का कोई जरिया न होने के बावजूद उन पर दबाव बनाते रहे कि वे फौरन ईंट भट्ठे के आसपास बनी झोपड़ियां खाली करके निकल जाएं। कई मजदूरों ने बताया कि लौटते वक्त उनके मालिक ने मजदूरी के पूरे पैसे तक नहीं दिए।
साबरमती एक्सप्रेस में करीब 20 घंटों का सफर करके करीब 11 सौ मजदूर बरेली जंक्शन पर उतरे तो चेहरों पर राहत के भाव दिखने के बावजूद दिल दहला देने वाली कई कहानियां उनकी जुबां पर थीं। अमर उजाला से बातचीत के दौरान आपबीती बताते हुए कई मजदूरों के गले तक रूंध गए। मजदूरों ने बताया कि डेढ़ महीने से वे लोग अपने मालिकों की बदसलूकी झेल रहे थे। सरकार ने उनके लौटने के लिए ट्रेन का बंदोबस्त किया तो उन्हे उम्मीद थी कि वे वापस आते वक्त उनके राशन-खाने का इंतजाम करेंगे लेकिन उन्होंने एक वक्त का खाना तक नहीं दिया। मजदूरों ने कहा कि वे अपने घर पर अब चाहे जिस हाल में रहें लेकिन कभी लौटकर गुजरात नहीं जाएंगे।
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रेल का किराया माफ फिर भी ठेकेदारों ने कर दीं जेबें साफ

केंद्र सरकार ने तो दूसरे राज्यों से लौटने वाले मजदूरों का रेल किराया माफ कर दिया लेकिन ठेकेदार और एनजीओ फिर भी उनकी जेबें खाली कराने से बाज नहीं आए। जंक्शन पर उतरे मजदूरों ने बताया कि ठेकेदार ने टिकट के नाम पर उनसे एक-एक आदमी के पांच सौ रुपये से लेकर आठ सौ रुपये तक रखवा लिए। बड़े परिवारों के साथ लौटे कई मजदूरों के जेब की पूरी रकम इसी में निकल गई। मजदूरों ने बताया कि जिस एनजीओ को उन्हें सूची बनाकर ट्रेन में बैठाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उसके लोगों ने यह काम ठेकेदारों के ही सुपुर्द कर दिया। ठेकेदारों ने उन्हें बताया कि एनजीओ ने उनसे पैसे मांगे हैं। कुछ ठेकेदारों ने टिकट के पूरे 525 रुपये लिए तो कुछ ने वहां ट्रेन में सवाल होने से पहले हुई थर्मल स्क्रीनिंग को मेडिकल परीक्षण बताकर आठ सौ रुपये तक ले लिए। हालांकि पश्चिम रेलवे के एक अधिकारी ने आधिकारिक बयान देने से इनकार करते हुए बताया कि किसी भी श्रमिक से रेलवे ने कोई किराया नहीं वसूला है। रेलवे के पास मजदूरों की संख्या के हिसाब से केंद्र सरकार ने पहले ही पैसा भेज दिया था। अगर किसी और ने मजदूरों से वसूली की है तो उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है।
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लॉकडाउन के बाद एक-एक दिन मुश्किल से कटा

हम जिस ईंट भट्ठे पर काम करते थे, उसका मालिक लॉकडाउन के बाद लगातार हम लोगों पर यूपी वापस लौटने का दबाव बना रहा था। एक-एक दिन बहुत मुश्किल से कटा। अब यहां आकर काफी सुकून महसूस हो रहा है। - मुन्नी, बल्लिया बरेली
मैं गुजरात में एक धागा बनाने वाली फैक्टरी में काम कर रहा था। कई दिन से पूरा परिवार भूखा था। आते वक्त भी मालिक ने भूखे पेट ही भेज दिया। कुछ पैसा भी मालिक पर बकाया था लेकिन उसने देने से साफ इनकार कर दिया। -हरीश चंद्र, प्रयागराज
गुजरात में काफी समय से मेहनत मजदूरी कर रहा था। लॉकडाउन हुआ तो ऐसी मुसीबतें झेलीं जो पूरी जिंदगी याद रहेंगी। परिवार को खाना खिलाने लायक तक पैसे पास में नहीं बचे। अब अपने घर लौटते हुए जो सुकुन मिला है, उसे बयां नहीं कर सकता।- सूरज पटेल, बनारस

कई हफ्तों से प्रयागराज में अपने घर लौटने के लिए परेशान था। धागा मिल मालिक ने काम बंद करा दिया था और खाने तक को पैसा नहीं दे रहा था। सरकार ने ट्रेन चलाकर बहुत उपकार किया है। - विजयचंद्र, प्रयागराज
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