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राहत की दिवाली : हवा में जहर तो घुला मगर पिछले सालों जैसा नहीं
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बरेली। कुछ तो ग्रीन पटाखों ने इस बार दिवाली पर शहर की आबोहवा को बहुत ज्यादा जहरीला नहीं होने दिया और कुछ हद तक रात में चली हवा और दिन में निकली तेज धूप भी शहर का रक्षाकवच बन गई। दिवाली के बाद शहर में वायु प्रदूषण पिछले सालों की तुलना में तो काफी कम रहा लेकिन सेहत के लिए खतरनाक स्तर तक पहुंच ही गया।
पिछले साल दिवाली के बाद जिले में एक्यूआई 415 तक पहुंच गया था लेकिन इस बार 262 ही रहा। दिवाली की रात शहर के जिन इलाकों में एक्यूआई में सर्वाधिक वृद्धि रिकॉर्ड की गई, उनमें सिविल लाइंस और राजेंद्रनगर शामिल हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक रविवार को सिविल लाइंस में जीआईसी के पास रिकॉर्ड किया गया एक्यूआई 168 था जो सोमवार रात दिवाली की आतिशबाजी के बाद 255 तक पहुंच गया। इस तरह 24 घंटे के अंदर यहां एक्यूआई में 87 अंक बढ़ गया। राजेंद्रनगर में रविवार को एक्यूआई 191 था जो दिवाली की रात 270 रिकॉर्ड हुआ। यहां एक्यूआई में 79 अंक बढ़ा।
स्मार्ट सिटी कार्यालय की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक नगर निगम के नजदीक एक्यूआई 88 से बढ़कर 148 और मिनी बाईपास पर 154 से बढ़कर 197 तक पहुंचा। पूरे जिले में इस बार औसतन एक्यूआई 262 रिकॉर्ड किया गया जो लोगों की सेहत के लिए नुकसानदायक तो है लेकिन पिछले सालों की तरह अत्यधिक प्रदूषित होने की श्रेणी में नहीं आता।
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यह इसलिए भी काफी राहत की बात है क्योंकि इससे पहले करीब दस सालों से दिवाली के बाद वायु प्रदूषण का स्तर चार सौ एक्यूआई के आसपास रिकॉर्ड हो रहा था। पिछले ही साल एक्यूआई 415 रहा था। इससे पहले 2020 में एक्यूआई 392, 2019 में 398, 2018 में 435, 2017 में 410, साल 2016 में 396, 2015 में 442, 2014 में 421, 2013 में 398 और 2012 में 378 रिकॉर्ड हुआ था।
क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी रोहित सिंह के मुताबिक पिछले सालों में आमतौर पर दिवाली की रात फॉग की अधिकता होने की वजह से भी प्रदूषण बढ़ता था लेकिन इस बार अब तक ज्यादा फॉग नहीं शुरू हुआ है। इसी कारण पटाखों से निकला धुआं हवा संघनित नहीं हो सका। इसके साथ दिवाली पर हवा की गति भी हल्की तेज थी। सुबह चटख धूप भी निकली। प्रदूषण कम होने का एक और प्रमुख कारण यह रहा कि इस साल दिवाली पर शहर में ज्यादातर निर्माण कार्य बंद रहे लिहाजा वातावरण में पटाखों का धुआं धूल के साथ मिश्रित नहीं हो सका.
जिला अस्पताल में नहीं आया कोई गंभीर बर्न केस : दिवाली पर झुलसने, जलने या दूसरी दुर्घटनाओं की आशंका को देखते हुए जिला अस्पताल में इलाज की व्यवस्था के साथ स्टाफ और डॉक्टरों को मुस्तैद रखा गया लेकिन इस बार दिवाली पर कोई गंभीर केस अस्पताल नहीं पहुंचा। एडीएसआईसी एवं जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. मेघ सिंह के मुताबिक मंगलवार दोपहर को पटाखों से मामूली जलने के एक-दो केस पहुंचे। सामान्य मरहम-पट्टी करके उन्हें वापस भेज दिया गया।
25 फीसदी ज्यादा बिके पटाखे मगर प्रदूषण 40 फीसदी कम
बरेली पटाखा व्यापार संघ के अध्यक्ष कृष्णदेव सूद के मुताबिक करीब ढाई साल बाद इस बार पटाखों का कारोबार अच्छा रहा। मोटे अनुमान के मुताबिक दिवाली पर 20 करोड़ के पटाखे बिके लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के कारण बाजार में ग्रीन पटाखों की सेल ज्यादा हुई। ग्रीन पटाखों में धुआं उत्सर्जित करने वाले तत्व कम होते हैं जो आम पटाखों की तुलना में काफी कम प्रदूषण फैलाते हैं। यही वजह रही कि इस बार दिवाली पर पिछले तीन सालों से करीब 25 फीसदी ज्यादा कारोबार होने के बावजूद प्रदूषण का स्तर करीब 40 फीसदी कम रहा।
पराली न जलने और धान की थ्रेसिंग न होने की वजह से भी मिली राहत
इस बार मानसून के दौरान बारिश काफी देर से होने की वजह से खेतों में धान की रोपाई भी पिछड़ गई। फसल देर से तैयार होने की वजह से ज्यादातर किसानों ने फसल की कटाई अब शुरू की है। लिहाजा अब तक खेतों में धान की पराली जलने का सिलसिला भी शुरू नहीं हुआ है। विशेषज्ञ इसे भी दिवाली पर वायु प्रदूषण कम होने की बड़ी वजह मान रहे हैं। उनका कहना है कि अगर धान कटने के बाद उसकी थ्रेसिंग शुरू हो गई होती तो भी एक्यूआई भी कुछ हद तक और बढ़ सकता था।
ये है वायु प्रदूषण का पैमाना
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक एक्यूआई शून्य से 50 तक हो तो हवा को शुद्ध माना जाता है। 51 से सौ तक एक्यूआई होने का मतलब वायु में हल्का (सामान्य) प्रदूषण है। इसके बाद 101 से 150 तक तक वायु प्रदूषण को संवेदनशील, 151 से दो सौ तक मध्यम प्रदूषित, 201 से तीन सौ तक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक, 301 से पांच सौ तक अत्यधिक प्रदूषित माना जाता है। एक्यूआई स्तर तीन सौ के पार पहुंचने पर हवा को जहरीला माना जाता है।
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पिछले साल दिवाली के बाद जिले में एक्यूआई 415 तक पहुंच गया था लेकिन इस बार 262 ही रहा। दिवाली की रात शहर के जिन इलाकों में एक्यूआई में सर्वाधिक वृद्धि रिकॉर्ड की गई, उनमें सिविल लाइंस और राजेंद्रनगर शामिल हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक रविवार को सिविल लाइंस में जीआईसी के पास रिकॉर्ड किया गया एक्यूआई 168 था जो सोमवार रात दिवाली की आतिशबाजी के बाद 255 तक पहुंच गया। इस तरह 24 घंटे के अंदर यहां एक्यूआई में 87 अंक बढ़ गया। राजेंद्रनगर में रविवार को एक्यूआई 191 था जो दिवाली की रात 270 रिकॉर्ड हुआ। यहां एक्यूआई में 79 अंक बढ़ा।
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स्मार्ट सिटी कार्यालय की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक नगर निगम के नजदीक एक्यूआई 88 से बढ़कर 148 और मिनी बाईपास पर 154 से बढ़कर 197 तक पहुंचा। पूरे जिले में इस बार औसतन एक्यूआई 262 रिकॉर्ड किया गया जो लोगों की सेहत के लिए नुकसानदायक तो है लेकिन पिछले सालों की तरह अत्यधिक प्रदूषित होने की श्रेणी में नहीं आता।
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यह इसलिए भी काफी राहत की बात है क्योंकि इससे पहले करीब दस सालों से दिवाली के बाद वायु प्रदूषण का स्तर चार सौ एक्यूआई के आसपास रिकॉर्ड हो रहा था। पिछले ही साल एक्यूआई 415 रहा था। इससे पहले 2020 में एक्यूआई 392, 2019 में 398, 2018 में 435, 2017 में 410, साल 2016 में 396, 2015 में 442, 2014 में 421, 2013 में 398 और 2012 में 378 रिकॉर्ड हुआ था।
क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी रोहित सिंह के मुताबिक पिछले सालों में आमतौर पर दिवाली की रात फॉग की अधिकता होने की वजह से भी प्रदूषण बढ़ता था लेकिन इस बार अब तक ज्यादा फॉग नहीं शुरू हुआ है। इसी कारण पटाखों से निकला धुआं हवा संघनित नहीं हो सका। इसके साथ दिवाली पर हवा की गति भी हल्की तेज थी। सुबह चटख धूप भी निकली। प्रदूषण कम होने का एक और प्रमुख कारण यह रहा कि इस साल दिवाली पर शहर में ज्यादातर निर्माण कार्य बंद रहे लिहाजा वातावरण में पटाखों का धुआं धूल के साथ मिश्रित नहीं हो सका.
जिला अस्पताल में नहीं आया कोई गंभीर बर्न केस : दिवाली पर झुलसने, जलने या दूसरी दुर्घटनाओं की आशंका को देखते हुए जिला अस्पताल में इलाज की व्यवस्था के साथ स्टाफ और डॉक्टरों को मुस्तैद रखा गया लेकिन इस बार दिवाली पर कोई गंभीर केस अस्पताल नहीं पहुंचा। एडीएसआईसी एवं जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. मेघ सिंह के मुताबिक मंगलवार दोपहर को पटाखों से मामूली जलने के एक-दो केस पहुंचे। सामान्य मरहम-पट्टी करके उन्हें वापस भेज दिया गया।
25 फीसदी ज्यादा बिके पटाखे मगर प्रदूषण 40 फीसदी कम
बरेली पटाखा व्यापार संघ के अध्यक्ष कृष्णदेव सूद के मुताबिक करीब ढाई साल बाद इस बार पटाखों का कारोबार अच्छा रहा। मोटे अनुमान के मुताबिक दिवाली पर 20 करोड़ के पटाखे बिके लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के कारण बाजार में ग्रीन पटाखों की सेल ज्यादा हुई। ग्रीन पटाखों में धुआं उत्सर्जित करने वाले तत्व कम होते हैं जो आम पटाखों की तुलना में काफी कम प्रदूषण फैलाते हैं। यही वजह रही कि इस बार दिवाली पर पिछले तीन सालों से करीब 25 फीसदी ज्यादा कारोबार होने के बावजूद प्रदूषण का स्तर करीब 40 फीसदी कम रहा।
पराली न जलने और धान की थ्रेसिंग न होने की वजह से भी मिली राहत
इस बार मानसून के दौरान बारिश काफी देर से होने की वजह से खेतों में धान की रोपाई भी पिछड़ गई। फसल देर से तैयार होने की वजह से ज्यादातर किसानों ने फसल की कटाई अब शुरू की है। लिहाजा अब तक खेतों में धान की पराली जलने का सिलसिला भी शुरू नहीं हुआ है। विशेषज्ञ इसे भी दिवाली पर वायु प्रदूषण कम होने की बड़ी वजह मान रहे हैं। उनका कहना है कि अगर धान कटने के बाद उसकी थ्रेसिंग शुरू हो गई होती तो भी एक्यूआई भी कुछ हद तक और बढ़ सकता था।
ये है वायु प्रदूषण का पैमाना
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक एक्यूआई शून्य से 50 तक हो तो हवा को शुद्ध माना जाता है। 51 से सौ तक एक्यूआई होने का मतलब वायु में हल्का (सामान्य) प्रदूषण है। इसके बाद 101 से 150 तक तक वायु प्रदूषण को संवेदनशील, 151 से दो सौ तक मध्यम प्रदूषित, 201 से तीन सौ तक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक, 301 से पांच सौ तक अत्यधिक प्रदूषित माना जाता है। एक्यूआई स्तर तीन सौ के पार पहुंचने पर हवा को जहरीला माना जाता है।