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Bareilly News: माता-पिता ने हर संघर्ष किया स्वीकार, बच्चों ने पहना सफलता का हार

Thu, 01 Jun 2023 01:58 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 01 Jun 2023 01:58 AM IST
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Parents accepted every struggle, children wore the necklace of success
बरेली। माता-पिता... इन दो शख्सियतों का वर्णन शब्दों का मोहताज नहीं हैं। जन्म देने से लेकर अपने जीवन की आखिरी सांस तक बच्चे की तरक्की की सबसे अधिक चाह केवल माता-पिता को ही रहती है। कहा भी गया है कि माता-पिता की दुआ दुनिया की हर बला को दूर कर सकती है। यूं तो हर माता-पिता का जीवन उनके बच्चों को समर्पित होता है, लेकिन आज हम आपके सामने ऐसे माता-पिता की कहानी लेकर आए हैं, जिन्होंने अपने बच्चों के जीवन को बेहतर मुकाम देने के लिए परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। अपनी तमाम खुशियां कुर्बान कर दीं। और आखिरकार उस ऊंचाई तक पहुंचा दिया जहां पहुंच पाना हर किसी के बस की बात नहीं होती।
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पढ़ाई के लिए बेच दी घर की जमीन, बेटे को बना दिया आईपीएस
कचहरी परिसर में काम करने वाले चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कमसुल हसन और उनकी पत्नी तहसीन जहां का संघर्ष आज के दौर में मिसाल है। वे अपने पुराने दिनों और बेटे की सफलता को याद कर गर्व से भर उठते हैं। माता पिता दोनों ने ही बेटे नुरुल हसन को अच्छा भविष्य देने के लिए मेहनत में दिन रात एक कर दिया। बेटे ने आईआईटी करने की इच्छा जाहिर की तो फीस के पैसे भरने के लिए घर बनवाने के लिए खरीदी जमीन बेच दी। बेटे पर अपनी खराब परिस्थितियों की छांव नहीं पड़ने दी। बेटे ने भी माता-पिता के संघर्ष को बेकार नहीं जाने दिया। शहर के मनोहर भूषण इंटर कॉलेज से पढ़े नूरुल हसन ने स्कूल में टॉप किया। पिता का कहना है कि बेटे की मेहनत देखकर ही उन्होंने उसकी पढ़ाई के लिए जमीन बेचने का फैसला किया। बेटे ने भी आईपीएस अफसर बनकर उनकी मेहनत का फल दे दिया। बेटे की सफलता ने उनके संघर्षों को सफल कर दिया।
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बीमारी की अनदेखी कर बिटिया को बनाया इंजीनियर

लोक निर्माण विभाग की असिस्टेंट इंजीनियर स्नेहलता श्रीवास्तव अपने माता-पिता के संघर्षों को याद कर भावुक हो उठती हैं। उन्होंने बताया कि अर्थराइटिस की वजह से मां बृजेश श्रीवास्तव चलने फिरने में असमर्थ हो गईं थीं। घर पर काम करने वाला कोई नहीं था। मेरे लिए घर पर रहना और मां की मदद करना जरूरी था। रिश्तेदार भी कह रहे थे कि बेटी को बाहर मत भेजो। पिता एसपी श्रीवास्तव अध्यापक थे। मां ही घर संभालती थीं। उन्होंने बीमारी की अनदेखी कर मुझे पढ़ने के लिए प्रतापगढ़ से प्रयागराज भेजा। वहां से इंटरमीडिएट कराया फिर लखनऊ से बीटेक। इस दौरान मां के हाथ पैर जाम हो गए। पिता ने नौकरी के साथ घरेलू काम किए। रसोई भी संभाली। जब मैं पुरानी यादों में जाती हूं तो वे दिन भी सामने आते हैं। पिता के लिए मेरी और तीनों भाइयों की पढ़ाई का खर्च मुश्किल हो रहा था। माता-पिता ने सबसे पहले खुद की खुशियों को कुर्बान किया। लोन लेकर सबको पढ़ाया। मां ने तकलीफ की अनदेखी की। पिता ने जरूरी खर्चों में कंजूसी की। आखिरकार उनके संघर्षों की वजह मैं इंजीनियर बन पाई।
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