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Bareilly News: अतिकुपोषित बच्चों की मां भी कुपोषण की चपेट में
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बरेली। कुपोषण कुछ दिन या महीनों में नहीं पनपता। कई मामलों में इसकी शुरुआत गर्भावस्था से हो जाती है। पोषण पुनर्वास केंद्र में पहुंच रहे अतिकुपोषित बच्चों की मां इसकी पुष्टि कर रही हैं। काउंसलिंग में गर्भवतियों की नियमित जांच, पौष्टिक भोजन व दवा का अभाव मिला है।
जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र में जनवरी से अब तक 93 अतिकुपोषित बच्चे भर्ती हो चुके हैं। डायटीशियन रोजी जैदी के मुताबिक सभी केस निम्न आय वर्ग के रहे। काउंसलिंग में पता चला कि अब तक जो भी बच्चे भर्ती हुए हैं, सभी अपने माता-पिता की दूसरी, तीसरी या चौथी संतान हैं। 60 फीसदी केस में बच्चों के बीच अंतराल महज 10 माह या सालभर का ही है।
आशंका जताई है कि कमजोर शरीर पर दोबारा गर्भधारण के चलते आवश्यक गतिविधियां प्रभावित रहीं। गर्भावस्था के दौरान सही पोषण नहीं मिलने से गर्भ में पल रहे शिशु के जीवन पर दूरगामी प्रभाव होता है। इससे शिशु की लंबाई, मानसिक विकास और वजन प्रभावित होने का पता चला है। ज्यादातर महिलाओं ने बातचीत में नियमित दवा, जांच से दूर रहने की बात कही है। इनमें 70 फीसदी गर्भवतियों के प्रसव के दौरान हीमोग्लोबिन भी कम था।
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गर्भावस्था के शुरुआती सौ दिन बेहद अहम
डायटीशियन रोजी जैदी के मुताबिक गर्भावस्था में महिला को प्रतिदिन आयरन, फोलिक एसिड सही मात्रा में लेना जरूरी है। गर्भधारण के बाद शुरुआती सौ दिन काफी अहम होते हैं। आरंभिक अवस्था में उचित पोषण नहीं मिलने से बच्चे का विकास प्रभावित हुआ तो उसकी भरपाई बाद में नहीं हो पाती है।
इस तरह लें दवाएं
महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. पुष्पलता के मुताबिक गर्भावस्था के शुरुआती 180 दिनों तक आयरन, फोलिक एसिड की एक गोली के साथ कैल्शियम की दो गोलियां लेनी चाहिए। गर्भवती के आहार में सभी जरूरी पोषक तत्व होने चाहिए। माता के वजन से गर्भस्थ शिशु की सेहत पर असर पड़ता है। इसलिए निश्चित अंतराल पर गर्भवती का वजन मापना जरूरी है।
योजनाओं के संचालन पर भी सवाल
एनआरसी में ज्यादातर मामले देहात क्षेत्र के होते हैं। गर्भवतियों को पौष्टिक आहार देने के लिए शासन की ओर से चलाई जा रही योजनाओं पर भी सवालिया निशान लग रहा है। परिवार नियोजन, परिवार कल्याण, जननी सुरक्षा योजना समेत आशा कार्यकर्ता की ओर से निगरानी पर भी सवाल उठ रहे हैं। साथ ही, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की ओर से गर्भवतियों के लिए पोषाहार वितरण पर भी प्रश्न चिह्न है।
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जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र में जनवरी से अब तक 93 अतिकुपोषित बच्चे भर्ती हो चुके हैं। डायटीशियन रोजी जैदी के मुताबिक सभी केस निम्न आय वर्ग के रहे। काउंसलिंग में पता चला कि अब तक जो भी बच्चे भर्ती हुए हैं, सभी अपने माता-पिता की दूसरी, तीसरी या चौथी संतान हैं। 60 फीसदी केस में बच्चों के बीच अंतराल महज 10 माह या सालभर का ही है।
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आशंका जताई है कि कमजोर शरीर पर दोबारा गर्भधारण के चलते आवश्यक गतिविधियां प्रभावित रहीं। गर्भावस्था के दौरान सही पोषण नहीं मिलने से गर्भ में पल रहे शिशु के जीवन पर दूरगामी प्रभाव होता है। इससे शिशु की लंबाई, मानसिक विकास और वजन प्रभावित होने का पता चला है। ज्यादातर महिलाओं ने बातचीत में नियमित दवा, जांच से दूर रहने की बात कही है। इनमें 70 फीसदी गर्भवतियों के प्रसव के दौरान हीमोग्लोबिन भी कम था।
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गर्भावस्था के शुरुआती सौ दिन बेहद अहम
डायटीशियन रोजी जैदी के मुताबिक गर्भावस्था में महिला को प्रतिदिन आयरन, फोलिक एसिड सही मात्रा में लेना जरूरी है। गर्भधारण के बाद शुरुआती सौ दिन काफी अहम होते हैं। आरंभिक अवस्था में उचित पोषण नहीं मिलने से बच्चे का विकास प्रभावित हुआ तो उसकी भरपाई बाद में नहीं हो पाती है।
इस तरह लें दवाएं
महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. पुष्पलता के मुताबिक गर्भावस्था के शुरुआती 180 दिनों तक आयरन, फोलिक एसिड की एक गोली के साथ कैल्शियम की दो गोलियां लेनी चाहिए। गर्भवती के आहार में सभी जरूरी पोषक तत्व होने चाहिए। माता के वजन से गर्भस्थ शिशु की सेहत पर असर पड़ता है। इसलिए निश्चित अंतराल पर गर्भवती का वजन मापना जरूरी है।
योजनाओं के संचालन पर भी सवाल
एनआरसी में ज्यादातर मामले देहात क्षेत्र के होते हैं। गर्भवतियों को पौष्टिक आहार देने के लिए शासन की ओर से चलाई जा रही योजनाओं पर भी सवालिया निशान लग रहा है। परिवार नियोजन, परिवार कल्याण, जननी सुरक्षा योजना समेत आशा कार्यकर्ता की ओर से निगरानी पर भी सवाल उठ रहे हैं। साथ ही, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की ओर से गर्भवतियों के लिए पोषाहार वितरण पर भी प्रश्न चिह्न है।