{"_id":"5a381d314f1c1bee6a8b4a69","slug":"medication-one-companies-differ-i-e-many-times-the-difference-in-price","type":"story","status":"publish","title_hn":"दवा एक.. कंपनियां अलग.. यानी दाम में कई गुना फर्क ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दवा एक.. कंपनियां अलग.. यानी दाम में कई गुना फर्क
बरेली।
Updated Tue, 19 Dec 2017 01:25 AM IST
विज्ञापन
दवा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
शुगर और ब्लड प्रेशर के मरीज सबसे अधिक हैं। इनकी दवाओं की खपत भी सबसे ज्यादा होती है इसलिए दवा बाजार में इनका अलग ‘कारोबार’ है। दो केस बताने के लिए काफी हैं कि भले ही सस्ती मिलने वाली दवा महंगी दवा से किसी मायने में कमतर न हो लेकिन मरीज को उसी सॉल्ट से बनी महंगी दवा ही लिखी जाएगी। मजे की बात तो यह कि सस्ती मिलने वाली दवा जेनेरिक नहीं है, बल्कि कंपनी निर्मित ही है लेकिन डॉक्टर उसे नहीं लिखेंगे। जाहिर है जिस कंपनी से डॉक्टरों को अधिक फायदा पहुंचेगा, वे उन्हीं दवाओं को लिखेंगे। कई मामलों में तो डॉक्टर एमआर के टार्गेट तक पूरा करते दिखते हैं।
तो इसलिए महंगी होती हैं दवाएं..
दवा व्यापार से जुड़े जानकार बताते हैं कि एक ही सॉल्ट की दवा अगर दो कंपनियां बना रही हैं तो उनमें अंतर रहने की कोई गुंजाइश नहीं होती है। बस ब्रांड का फर्क होता है। जैसे एक कंपनी उसी सॉल्ट की दवा को खूब प्रचारित करती है और उसके ब्रांडिंग पर पैसा खर्च करती है तो जाहिर है कि वह दवा भी महंगी बेचेगी, जबकि दूसरी कंपनी सिर्फ दवा निर्माण तक सीमित है तो उसकी दवा सस्ती होगी। इसके अलावा डॉक्टरों का कमीशन, टूर और गिफ्ट पैकेज के चलते भी कंपनियाें की दवाएं महंगी हो जाती हैं। यह सारा खर्च मरीजों के जेब से ही निकाला जाता है।
मरीज वही लेते हैं जो डॉक्टर लिखते हैं
शहर के दवा कारोबारी ने बताया कि भले ही उनके पास एक ही सॉल्ट की दो अलग-अलग कंपनियाें की दवा हो लेकिन बिकती ब्रांडेड दवा ही है, क्योंकि डॉक्टर वही लिखते हैं और मरीज को जो दवा लिखी है, वही लेने की हिदायत भी देते हैं। कुछ मेडिकल स्टोर संचालक मानते हैं कि अधिकतर डॉक्टर महंगी दवाएं ही लिखते हैं और मरीज को उसकी जल्दी फायदा होना बताते हैं। मरीज इसके अलावा कोई और दवा लेते भी नहीं हैं क्योंकि उनका डॉक्टर पर विश्वास बहुत होता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि जिस डॉक्टर का कंपनी से पैकेज तय हो जाता है वह उसी कंपनी की दवाएं लिखता है।
विज्ञापन
एक नजर: दवाओं के दामों पर
बीमारी दवा दाम (सॉल्ट नेम) दाम (ब्रांड नेम)
कोलेस्ट्रोल एटोरवैस्टिन 2.50 12.00
एसिडिटी पेंटाप्राजोल 3.00 9.00
एलर्जी लीवोसिट्रिजिन 2.00 5.50
डायबिटीज मेटाफॉरमिन 2.00 12.00
बीपी टेलमिसारटन 2.00 6.50
(नोट- दवाआें के दाम रुपये में हैं। दोनों दाम बाजार में अलग-अलग कंपनियाें के अनुसार हैं।)
कोट
बाजार में ऐसी कई दवाएं हैं जिनके दामों में काफी फर्क है। इनकी कंपनियां भले ही अलग हों लेकिन सॉल्ट एक ही है। बिक्री में भी बहुत बड़ा अंतर है। कम महंगी दवाएं न तो मांगी जाती हैं और न ही कोई इन्हें लिखता है।
- विनय कुमार, मेडिकल स्टोर संचालक
एसोसिएशन की ओर से सरकार को लगातार पत्र भेजा गया है कि अधिक से अधिक सॉल्ट को डीपीसीओ यानी ड्रग प्राइस कंट्रोल अथॉरिटी में लेकर आया जाए ताकि दवा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश लगे। इस पर अभी तक कोई काम नहीं हुआ है।
- सुधीर सेठी, सचिव, महानगर केमिस्ट एसोसिएशन
तो इसलिए महंगी होती हैं दवाएं..
दवा व्यापार से जुड़े जानकार बताते हैं कि एक ही सॉल्ट की दवा अगर दो कंपनियां बना रही हैं तो उनमें अंतर रहने की कोई गुंजाइश नहीं होती है। बस ब्रांड का फर्क होता है। जैसे एक कंपनी उसी सॉल्ट की दवा को खूब प्रचारित करती है और उसके ब्रांडिंग पर पैसा खर्च करती है तो जाहिर है कि वह दवा भी महंगी बेचेगी, जबकि दूसरी कंपनी सिर्फ दवा निर्माण तक सीमित है तो उसकी दवा सस्ती होगी। इसके अलावा डॉक्टरों का कमीशन, टूर और गिफ्ट पैकेज के चलते भी कंपनियाें की दवाएं महंगी हो जाती हैं। यह सारा खर्च मरीजों के जेब से ही निकाला जाता है।
विज्ञापन
मरीज वही लेते हैं जो डॉक्टर लिखते हैं
शहर के दवा कारोबारी ने बताया कि भले ही उनके पास एक ही सॉल्ट की दो अलग-अलग कंपनियाें की दवा हो लेकिन बिकती ब्रांडेड दवा ही है, क्योंकि डॉक्टर वही लिखते हैं और मरीज को जो दवा लिखी है, वही लेने की हिदायत भी देते हैं। कुछ मेडिकल स्टोर संचालक मानते हैं कि अधिकतर डॉक्टर महंगी दवाएं ही लिखते हैं और मरीज को उसकी जल्दी फायदा होना बताते हैं। मरीज इसके अलावा कोई और दवा लेते भी नहीं हैं क्योंकि उनका डॉक्टर पर विश्वास बहुत होता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि जिस डॉक्टर का कंपनी से पैकेज तय हो जाता है वह उसी कंपनी की दवाएं लिखता है।
विज्ञापन
एक नजर: दवाओं के दामों पर
बीमारी दवा दाम (सॉल्ट नेम) दाम (ब्रांड नेम)
कोलेस्ट्रोल एटोरवैस्टिन 2.50 12.00
एसिडिटी पेंटाप्राजोल 3.00 9.00
एलर्जी लीवोसिट्रिजिन 2.00 5.50
डायबिटीज मेटाफॉरमिन 2.00 12.00
बीपी टेलमिसारटन 2.00 6.50
(नोट- दवाआें के दाम रुपये में हैं। दोनों दाम बाजार में अलग-अलग कंपनियाें के अनुसार हैं।)
कोट
बाजार में ऐसी कई दवाएं हैं जिनके दामों में काफी फर्क है। इनकी कंपनियां भले ही अलग हों लेकिन सॉल्ट एक ही है। बिक्री में भी बहुत बड़ा अंतर है। कम महंगी दवाएं न तो मांगी जाती हैं और न ही कोई इन्हें लिखता है।
- विनय कुमार, मेडिकल स्टोर संचालक
एसोसिएशन की ओर से सरकार को लगातार पत्र भेजा गया है कि अधिक से अधिक सॉल्ट को डीपीसीओ यानी ड्रग प्राइस कंट्रोल अथॉरिटी में लेकर आया जाए ताकि दवा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश लगे। इस पर अभी तक कोई काम नहीं हुआ है।
- सुधीर सेठी, सचिव, महानगर केमिस्ट एसोसिएशन