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अन्ना हजारे के आंदोलन का प्रतिफल इतना खराब निकलेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था : कुमार विश्वास

Mon, 28 Jan 2019 11:40 PM IST
राजेश सैनी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बरेली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बरेली Published by: राजेश सैनी Updated Mon, 28 Jan 2019 11:40 PM IST
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Kumar Vishwas Says Anna Hazare movement regression will be so Bad
कुमार विश्वास

निराश और मायूस करने वाली राजनीति के दौर में अन्ना हजारे के आंदोलन में अपनी जगह बनाकर सियासी सफर की शुरुआत करने वाले कवि और साहित्यधर्मी डॉ. कुमार विश्वास को उम्मीद है कि देश एक बार फिर जागेगा और वह उसी वक्त की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वह कहते हैं कि हो सकता है कि अब जो आंदोलन हो, वह उसके नेतृत्व में न हों लेकिन उस आंदोलन को एक राह जरूर दिखाएंगे। कहते हैं, अन्ना के आंदोलन के वक्त लोगों ने जो सपना देखा था, वह पूरा न होने से उनमें निराशा जरूर है, लेकिन उन्हें पूरा यकीन है कि यह आंदोलन जाया नहीं होगा। इस आंदोलन ने एक जागृति पैदा की है और एक न एक दिन जरूर उसका असर सबको दिखाई देगा।

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अमर उजाला की स्थापना की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर बरेलीवासियों के लिए अपनी कविताओं की संगीतमय प्रस्तुतियों का तोहफा लेकर बरेली आए कुमार विश्वास ने अन्ना के आंदोलन के साथ अपने सियासी सफर के तमाम तजुर्बे अमर उजाला के साथ बातचीत में साझा किए। उन्होंने कहा कि सारे देश को अपने साथ खड़ा करने के बाद अन्ना के आंदोलन का प्रतिफल इतना खराब निकलेगा, यह उम्मीद किसी को नहीं थी। सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि नीचे तक जनता में जो आक्रोश पैदा हुआ था, उसे जैसे सेफ्टी वॉल्व खोलकर निकाल दिया गया। हालांकि इसका कुछ फायदा भी हुआ। वोट ऑफ परसेंटेज बढ़ गया, देश का यूथ पॉलिटिक्स पर बात करने लगा। सोशल साइट्स पर बहस शुरू हुई। एक बड़ी संख्या अब भी है जो सवाल पूछना चाहती है। दोबारा उस तरह का माहौल बनने में वक्त लगेगा, लेकिन बनेगा जरूर।

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सुरक्षा बोध से त्रस्त व्यक्ति ने पूरी पार्टी पर कब्जा कर लिया
अन्ना के आंदोलन से निकलकर सीधे दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे अपने पुराने साथी अरविंद केजरीवाल के नाम पर कुमार विश्वास तल्ख होने लगते हैं। सीधे उनका नाम नहीं लेते, लेकिन कहते हैं कि सुरक्षा बोध से त्रस्त एक व्यक्ति ने पूरी पार्टी पर कब्जा कर आंदोलन को निष्फल कर दिया। राजनीति को 2011 के उसी दौर में ले आया गया जहां से हम लोग उसे खींचखाच कर भ्रष्टाचार मुक्ति, पारदर्शिता और राजनेताओं की अहंकारशून्यता पर लेकर आए थे। चंदे में पारदर्शिता की बात की थी, लेकिन अब तो हमारी पार्टी का ही नेता कहता है कि चंदे का हिसाब नहीं दूंगा। लोकायुक्त को नहीं बताऊंगा कि कि कितना कमा लिया है। दूसरे नेता तो हैं ही ऐसे, उनका तो कहना ही क्या है।

जनता ज्यादा उम्मीद न करे, देश में कोई मुद्दा नहीं
देश के बड़े मुद्दों के सवाल पर कुमार विश्वास कहते हैं कि देश में फिलहाल कोई मुद्दा ही नहीं है। साढ़े चार साल बाद जिन्होंने सरकार चलाई उनके पास सिर्फ यह मुद्दा है कि नेहरू ने क्या किया था। कोई मुद्दा न होना, यही राजनेताओं की सफलता है। राजनीति में भरोसे का संकट हमेशा रहा है। गठबंधन की सरकारों में खूब ऐसा हुआ है। यूपी में लोगों ने कभी मुलायम को वोट दिया कभी मायावती को। 70 सालों से जिस देश की राजनीति जाति के समीकरणों से ऊपर न उठी हो, जहां पॉलिटीशियन की इस तरह की लॉबी और सेटअप हो, वहां इसके अलावा क्या उम्मीद कर सकते हैं।

साहित्य का हाल राजनीति जैसा नहीं
साहित्य का हाल राजनीति जैसा तो नहीं है। लेकिन प्रमाणिकता का खतरा तो हर तरफ है, चाहे वह राजनीति हो, साहित्य हो या फिर पत्रकारिता। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कला-संस्कृति, भाषा और पत्रकारिता अपनी राह ढूंढ ही लेते हैं। 

राजनीति न पकड़ी थी न छोड़ी है
राजनीति से क्या किनारा कर लिया, इस सवाल पर कुमार विश्वास कहते हैं कि राजनीति तो युगधर्म है, उन्होंने न पकड़ी थी न छोड़ी है, अभी पूरी तरह सब समाप्त नहीं हुआ है। लोकसभा चुनाव में क्या रुख होगा, इस सवाल पर कहते हैं, अभी यह सवाल बहुत अर्ली है। यह भी बोले कि फिलहाल बहुत निर्भार महसूस कर रहा हूं। उन्हें सरकारी सम्मान नहीं मिला, सरकारें उन्हें बुलाती नहीं। मगर कोई कमी नहीं है। टैक्स भी बहुत ज्यादा देते हैं। पिछले सत्र में 1.27 लाख टैक्स दिया था। यह परम निर्भार होने की अवस्था है।

अमर उजाला में छपा था मेरे पिता जी का लेख
कुमार विश्वास ने बातचीत के दौरान 1977 का वो दौर भी याद किया, जब अमर उजाला में उनके पिता जी का लेख छपा था ‘औरंगजेब बनाम इंदिरा गांधी’। उन्होंने बताया कि उस दौर में अमर उजाला के पास संसाधनों की इतनी कमी होती थी कि मोमबत्तियों की रोशनी में खबरें लिखी जाती थीं। अमर उजाला में इंदिरा गांधी के खिलाफ लेख छपने के बाद उनके पिताजी गिरफ्तार हो गए थे। बोले, वो दौर ऐसा था जब एक छोटी सी खबर छपने पर भी बड़ी कार्रवाई हो जाती थी।

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