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बैंक से कर्ज लेकर चुकाया था साहूकारों का कर्ज
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बदायूं। मुसीबतें आती हैं तो घर टूटता है, आमदनी के साधन धोखा देने लगते हैं। कोई राहत नहीं मिलती तो आदमी बेचैन हो जाता है कि उसे जान देने के ख्याल आने लगते हैं। हेमसिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उसने कर्ज तो आमदनी बढ़ाने के लिए लिया था लेकिन न तो उसकी आमदनी बढ़ी और न ही वह कर्ज चुका पाया। आखिर में उसने जान दे दी।
बिल्सी क्षेत्र के ग्राम बांस बरौलिया निवासी हेमसिंह ने वर्ष 2010 में भूमि विकास बैंक से मुर्गी पालन के लिए ऋण लिया था। परिवार वालों ने बताया कि बैंक से रुपये मिलते ही साहूकार आ गए, जिनसे हेमसिंह ने पहले कर्ज लिया था। मजबूरी में उन्हें बैंक से मिला रुपया देना पड़ा। कुछ रुपये शेष बच गए थे। वह बीमारी में खर्च हो गए। हेमसिंह के नाम दस बीघा जमीन है। उसके दो बेटे और दो बेटियां हैं। बड़ा बेटा अतर सिंह 27 साल का हो चुका है। वह कहीं बाहर मजदूरी करता है। उससे छोटा मुनेश (25) खेतीबाड़ी करता है। बेटी नीतू (16) और सनोदा (12) की परवरिश की जिम्मेदारी हेम सिंह पर थी। खेती में जो रुपया कमाते थे, उसमें से इतना नहीं बचता था कि वह एक किस्त भी जमा कर पाते। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गए, खर्चे भी बढ़ते गए। मुसीबतें भी आती गईं, जिससे हेमसिंह परेशान था। दूसरी ओर कर्ज नहीं चुकाने पर उसका ब्याज बढ़ता चला गया। 80 हजार रुपये लिए थे, उसकी जगह नौ साल में दो लाख 40 हजार रुपये हो गए थे। इतना कर्जा सुनकर हेम सिंह घबरा जाता था। जब भी राजस्व विभाग की टीम उसके घर पहुंचती थी तो मुंह छिपाने के सिवा उसके पास कोई चारा नहीं होता था। चार-पांच दिन पहले आई टीम देखकर वह इतना घबरा गया कि उसने जान देने की ठान ली। फिर अपने खेत में जाकर मौत को गले लगा लिया। उसकी मौत से पत्नी किताबश्री अपने होश खो बैठी है।
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बिल्सी क्षेत्र के ग्राम बांस बरौलिया निवासी हेमसिंह ने वर्ष 2010 में भूमि विकास बैंक से मुर्गी पालन के लिए ऋण लिया था। परिवार वालों ने बताया कि बैंक से रुपये मिलते ही साहूकार आ गए, जिनसे हेमसिंह ने पहले कर्ज लिया था। मजबूरी में उन्हें बैंक से मिला रुपया देना पड़ा। कुछ रुपये शेष बच गए थे। वह बीमारी में खर्च हो गए। हेमसिंह के नाम दस बीघा जमीन है। उसके दो बेटे और दो बेटियां हैं। बड़ा बेटा अतर सिंह 27 साल का हो चुका है। वह कहीं बाहर मजदूरी करता है। उससे छोटा मुनेश (25) खेतीबाड़ी करता है। बेटी नीतू (16) और सनोदा (12) की परवरिश की जिम्मेदारी हेम सिंह पर थी। खेती में जो रुपया कमाते थे, उसमें से इतना नहीं बचता था कि वह एक किस्त भी जमा कर पाते। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गए, खर्चे भी बढ़ते गए। मुसीबतें भी आती गईं, जिससे हेमसिंह परेशान था। दूसरी ओर कर्ज नहीं चुकाने पर उसका ब्याज बढ़ता चला गया। 80 हजार रुपये लिए थे, उसकी जगह नौ साल में दो लाख 40 हजार रुपये हो गए थे। इतना कर्जा सुनकर हेम सिंह घबरा जाता था। जब भी राजस्व विभाग की टीम उसके घर पहुंचती थी तो मुंह छिपाने के सिवा उसके पास कोई चारा नहीं होता था। चार-पांच दिन पहले आई टीम देखकर वह इतना घबरा गया कि उसने जान देने की ठान ली। फिर अपने खेत में जाकर मौत को गले लगा लिया। उसकी मौत से पत्नी किताबश्री अपने होश खो बैठी है।
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