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खरना बनाने से लेकर चखने तक लिया मौन व्रत

Thu, 26 Oct 2017 02:22 AM IST
बरेली
बरेली Updated Thu, 26 Oct 2017 02:22 AM IST
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छठ पर्व के दूसरा दिन विशेष अनुशासन के साथ बीता। बुधवार सुबह व्रती महिलाओं ने घर की छतों की सफाई करके नया चूल्हा बनाया। जिन घरों में चूल्हा उपलब्ध हो सका, वहां नौ ईंटें रखकर या रसोई गैस का छोटा सिलेंडर और चूल्हे पर खरना बनाया गया। सेठी के चावल और गुड़ से बनी खीर (बिहार में रसियाव नाम से जाना जाता है) बनाते समय महिलाओं ने मौत व्रत रखा। शुद्धता के ख्याल से चूल्हे को मुंह से फूंकने को लेकर भी सतर्क रहीं। रात दस बजे तक अमूमन घरों में व्रती के साथ सभी सदस्यों ने मौन रहकर खरना ग्रहण करके व्रत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।  
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डिफेंस कालोनी की सुशीला सिंह अपने घर की छत पर बने एक कमरे में लोहे की जाली वाला दरवाजा बंद करके खरना तैयार करती हैं। सुशीला बोलीं, बच्चे शैतानी करते हुए अंदर न आए जाए इसलिए सावधानी बरतनी पड़ती है। सविता गुप्ता ने खरना का पहला हिस्सा केले के पत्ते में गाय के लिए निकाला फिर अपने बच्चों को दिया। लाजपत नगर की जनकनंदनी ने बताया कि केले के पत्ते पर खरना का प्रसाद खाने के बाद पत्ते को गड्ढा खोदकर उसमें दबा दिया जाएगा। ताकि कोई जानवर उसे झूठा न कर दे। खरना ग्रहण करने के बाद कई घरों में ठेकुआ बनाने की तैयारी चलती रही। 
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फोटो 
एक दिन का व्रत रखने वाले नहीं बनाते खरना
जो महिलाएं एक दिन का ही व्रत रख रहीं है वे खरना नहीं बनाती। शिव मंदिर के पास रहने वाली प्रज्ञा राय ने बताया कि छठ कठिन व्रत है, इसलिए वह ढाई दिन तक व्रत नहीं रखती, वह बृहस्पतिवार को व्रत रखकर डलते सूर्य को अर्घ्य देंगी।  
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ढाई दिन के व्रत के पीछे ये है कथा 
बताते हैं कि छठ पर्व की कहानी भगवान सूर्य और उनकी पत्नी संध्या से जुड़ी है। जब संध्या सूर्य के तेज से नाराज होकर तपस्या को चली गई तो उन्होंने अपनी छाया को सूर्य के साथ छोड़ दिया। छाया से सूर्य को पुत्र शनि की प्राप्ति हुई। जब संध्या तपस्या करके आई तो सूर्य काफी क्रोधित हो गए। छाया को उन्होंने जाने को कह दिया, लेकिन छाया ने अपना स्थान मांगा तो सूर्य ने उन्हें छठी मईया के रूप में ढाई दिन के लिए अपने साथ रहने का वरदान दिया। यही कारण है कि ढाई दिन का छठ पर्व माना जाता है। छठी मइया को भगवान सूर्य की पत्नी माना गया है। 
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