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खड़े-खड़े गल गई मृदा परीक्षण को आयी बस
बरेली
Updated Wed, 26 Jul 2017 01:12 AM IST
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सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए तमाम खाद, बीज, कीटनाशक पर अनुदान उपलब्ध कराने समेत तमाम योजनाएं चला रही है लेकिन कृषि विभाग के नकारेपन से हर साल मिलने वाले लाखों के बजट का फायदा किसानों न मिलकर सिर्फ बर्बाद हो रहा है। इसका सबसे ज्वलंत का नमूना लैब के बाहर खड़ी ये बस (इसका नाम मृदा परीक्षण रथ रखा गया था) है। दो दशक पहले गोरखपुर लैब से मृदा परीक्षण को आयी इस बस का काम गांव-गांव जाकर किसानों के खेत से मिट्टी के नमूने लाकर लैब में उनका परीक्षण कराना था। बस किसी गांव में न गई और न ही मिट्टी के नमूने लाकर उनका परीक्षण किया गया बल्कि लाखों की कीमत से खरीदी गई बस यूं ही खड़े-खड़े गल गई। किसी किसान की मिट्टी का परीक्षण नहीं किया गया। अफसर और कर्मचारियों की काहिली से किसानों को मृदा परीक्षण का फायदा नहीं मिल पाया।
18 साल पहले गोरखपुर लैब से मृदा परीक्षण के लिए बस मंगवाई गई। बिलवा स्थित कृषि विभाग की लैब के बाहर बस खड़े-खड़े गल गई। पूरी तरह कंडम हो चुकी बस की मरम्मत कराने के लिए बजट न होने की बात कही जा रही है। लैब कर्मचारियों का कहना है कि कृषि प्रसार विभाग की एजेंसियां किसान मित्र बनाकर मिट्टी के नमूने लाती हैं। लैब में उनका परीक्षण किया जाता है। मृदा परीक्षण रथ (बस) का कोई औचित्य नहीं है।
बरेली में नहीं, बदायूं में मिले नमूने
लैब कर्मियों की मानें तो इस साल बदायूं के एक हजार मिट्टी के नमूनों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। हालांकि कर्मचारी इस बात का जवाब नहीं दे पाए कि बरेली में कितने मिट्टी के नमूनों का लैब में परीक्षण हुआ। मतलब साफ है कि कृषि विभाग को बरेली में एक भी किसान मिट्टी परीक्षण के लिए नहीं मिला लेकिन बदायूं में एक हजार किसानों ने मिट्टी के नमूने लाकर परीक्षण करा लिया।
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कोट--
सरकार का जोर मृदा परीक्षण पर है। मृदा परीक्षण के लिए लाई गई बस (रथ) कंडम हो चुकी है। इसे ठीक कराकर गांव-गांव भेजा जाएगा ताकि किसानों के खेत से मिट्टी के नमूने लाकर लैब में उनका परीक्षण कराया जा सके। मिट्टी के नमूना परीक्षण अभी नहीं हो रहे हैं क्योंकि ठेकेदार ने टेंडर कम लागत में डाल दिए और परीक्षण पर लागत ज्यादा आ रही। विनोद कुमार, डिप्टी डायरेक्टर कृषि
स्प्रिंकलर सिंचाई बदल सकती है किसानों की किस्मत
बरेली। ‘वन ड्राप, मोर क्राप’ ये स्लोगन भले ही सिंचाई विभाग का है लेकिन सरकारी सिस्टम अब तक इसे मूर्त रूप नहीं दे पाया है। मगर, जैविक खेती करने वाले प्रगतिशील किसान अनिल साहनी ने बिना सरकारी सब्सिडी के 10 एकड़ धान और गन्ने के खेत में स्प्रिंकलर पद्धति से सिंचाई करते हैं। इसमें 80 फीसदी पानी की बचत होने के साथ लागत में भी कमी आई है। स्प्रिंकलर पद्धति में सिंचाई के लिए खेत में लाइन बनाकर पाइप लाइन बिछाई गई है। उसमें पंपिंग सिस्टम के ऊपर से चर्खी लगी है। पाइप लाइन में पानी छोड़ने पर चर्खी 90 मीटर के रेडियस में फसल के चारो ओर बारिश की बूंदों की तरह फसल की सिंचाई करती है। पौध में नमी होने पर पानी रोक दिया जाता है। आम, केला या अन्य ऊंचे पेड़ों में सिंचाई के लिए रेनगन और फाग सिस्टम से छिड़काव किया जाता है। ज्यादा ऊंचाई वाले पेड़ पौधों की सिंचाई के लिए फागर विधि प्रयोग में लायी जाती है। अनिल साहनी का कहना है कि सरकारी सिस्टम पुराने ढर्रे से बाहर नहीं निकल पा रहा। वह न तो खुद कुछ कर रहे हैं और न ही किसानों से राय ले रहे हैं। स्प्रिंकलर सिंचाई के लिए प्रेरित करें तो फसल की लागत में आधे से ज्यादा की कमी आएगी और उत्पादन भी 15 से 20 फीसदी तक बढ़ जाएगा।
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18 साल पहले गोरखपुर लैब से मृदा परीक्षण के लिए बस मंगवाई गई। बिलवा स्थित कृषि विभाग की लैब के बाहर बस खड़े-खड़े गल गई। पूरी तरह कंडम हो चुकी बस की मरम्मत कराने के लिए बजट न होने की बात कही जा रही है। लैब कर्मचारियों का कहना है कि कृषि प्रसार विभाग की एजेंसियां किसान मित्र बनाकर मिट्टी के नमूने लाती हैं। लैब में उनका परीक्षण किया जाता है। मृदा परीक्षण रथ (बस) का कोई औचित्य नहीं है।
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बरेली में नहीं, बदायूं में मिले नमूने
लैब कर्मियों की मानें तो इस साल बदायूं के एक हजार मिट्टी के नमूनों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। हालांकि कर्मचारी इस बात का जवाब नहीं दे पाए कि बरेली में कितने मिट्टी के नमूनों का लैब में परीक्षण हुआ। मतलब साफ है कि कृषि विभाग को बरेली में एक भी किसान मिट्टी परीक्षण के लिए नहीं मिला लेकिन बदायूं में एक हजार किसानों ने मिट्टी के नमूने लाकर परीक्षण करा लिया।
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सरकार का जोर मृदा परीक्षण पर है। मृदा परीक्षण के लिए लाई गई बस (रथ) कंडम हो चुकी है। इसे ठीक कराकर गांव-गांव भेजा जाएगा ताकि किसानों के खेत से मिट्टी के नमूने लाकर लैब में उनका परीक्षण कराया जा सके। मिट्टी के नमूना परीक्षण अभी नहीं हो रहे हैं क्योंकि ठेकेदार ने टेंडर कम लागत में डाल दिए और परीक्षण पर लागत ज्यादा आ रही। विनोद कुमार, डिप्टी डायरेक्टर कृषि
स्प्रिंकलर सिंचाई बदल सकती है किसानों की किस्मत
बरेली। ‘वन ड्राप, मोर क्राप’ ये स्लोगन भले ही सिंचाई विभाग का है लेकिन सरकारी सिस्टम अब तक इसे मूर्त रूप नहीं दे पाया है। मगर, जैविक खेती करने वाले प्रगतिशील किसान अनिल साहनी ने बिना सरकारी सब्सिडी के 10 एकड़ धान और गन्ने के खेत में स्प्रिंकलर पद्धति से सिंचाई करते हैं। इसमें 80 फीसदी पानी की बचत होने के साथ लागत में भी कमी आई है। स्प्रिंकलर पद्धति में सिंचाई के लिए खेत में लाइन बनाकर पाइप लाइन बिछाई गई है। उसमें पंपिंग सिस्टम के ऊपर से चर्खी लगी है। पाइप लाइन में पानी छोड़ने पर चर्खी 90 मीटर के रेडियस में फसल के चारो ओर बारिश की बूंदों की तरह फसल की सिंचाई करती है। पौध में नमी होने पर पानी रोक दिया जाता है। आम, केला या अन्य ऊंचे पेड़ों में सिंचाई के लिए रेनगन और फाग सिस्टम से छिड़काव किया जाता है। ज्यादा ऊंचाई वाले पेड़ पौधों की सिंचाई के लिए फागर विधि प्रयोग में लायी जाती है। अनिल साहनी का कहना है कि सरकारी सिस्टम पुराने ढर्रे से बाहर नहीं निकल पा रहा। वह न तो खुद कुछ कर रहे हैं और न ही किसानों से राय ले रहे हैं। स्प्रिंकलर सिंचाई के लिए प्रेरित करें तो फसल की लागत में आधे से ज्यादा की कमी आएगी और उत्पादन भी 15 से 20 फीसदी तक बढ़ जाएगा।