उपलब्धि: गाय-भैंस को अंडाशय में गांठ से निजात दिलाएगी स्वदेशी डिवाइस, IVRI के वैज्ञानिकों ने की विकसित
आईवीआरआई के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई स्वदेशी डिवाइस बाजार में बिक रही डिवाइस से 600 गुना सस्ती है। इसमें संवेदनशीलता 70 फीसदी से ज्यादा है और कहीं ले जाने के दौरान खराबी की आशंका नहीं है।
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गाय-भैंस को अंडाशय में बनने वाली गांठ (सिस्ट ओव्यूलेशन डिजनरेशन) से निजात के लिए भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) बरेली के वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है। संस्थान की ओर से विकसित की गई स्वदेशी डिवाइस बाजार में बिक रही डिवाइस से 600 गुना सस्ती है। इसमें संवेदनशीलता 70 फीसदी से ज्यादा है और कहीं ले जाने के दौरान खराबी की आशंका नहीं है।
पशु पुनरुत्पादन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बृजेश कुमार ने बताया कि सीओडी की चपेट में आने वाली गाय और भैंस में प्रजनन प्रक्रिया प्रभावित होती है। सिस्टिक ओवेरियन फॉलिकला (सीओएफ) से एक बार प्रजनन के बाद दोबारा गर्भधारण में कठिनाई होती है। दूध उत्पादन भी प्रभावित होता है। अंडाशय में गांठ बन जाती है।
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हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है। सांड़ या बैल जैसे शारीरिक लक्षण प्रकट होने लगते हैं। गाय या भैंस क्रमवार कृत्रिम गर्भाधान के बावजूद गाभिन नहीं होती। लिहाजा, हजारों रुपये खर्च कर खरीदे गए पशु से मुनाफा नहीं होता। अब संस्थान की ओर से विकसित पोर्टेबल डिवाइस से इस समस्या से काफी हद तक निजात मिलने की उम्मीद है।
वर्ष 2018 में शुरू हुआ था शोध, फील्ड ट्रायल सफल
डॉ. बृजेश कुमार के मुताबिक संस्थान निदेशक डॉ. त्रिवेणी दत्त के निर्देशन में शोध कार्य वर्ष 2018 में शुरू हुआ था। तीन साल बाद साल 2021 में डिवाइस विकसित हुई और फील्ड ट्रायल शुरू हुए। सीओडी की चपेट में रहीं 40 गाय और 40 भैंस खोजी गईं, फिर विकसित उपकरण से जरूरी इलाज किया गया। प्रयोग सफल होने पर पेटेंट कराया गया। 15 दिन पहले डिवाइस निर्माण के लिए तकनीकी का व्यवसायीकरण हो चुका है।पांच हजार में किसानों को मिलेगी डिवाइस
डॉ. बृजेश के मुताबिक संस्थान की ओर से विकसित पोर्टेबल डिवाइस का वजन 175 ग्राम है। यह ओवम पिकअप मशीन की तर्ज पर ही काम करती है, फिर हार्मोनल थेरेपी होती है। इसके प्रयोग से प्रजनन की संभावना 50 फीसदी तक बढ़ने की पुष्टि हुई है। इसे कई बार प्रयोग कर सकते हैं। हर बार महज सुई बदलने की जरूरत होती है जो पांच रुपये में मिल जाती है। शोध टीम में वैज्ञानिक डॉ. हरेंद्र कुमार, डॉ. एसके सिंह, डॉ. जेके प्रसाद, डॉ. एके तिवारी और इंजीनियर एचसी यादव शामिल रहे।
पहले हाथ से मसल देते थे गांठ, होता था रक्तस्राव
वर्षों पहले गाय और भैंस की सीओडी में गांठ बनने पर इसे हाथ से मसल दिया जाता था। इससे आंतरिक रक्तस्राव होता था। हार्मोन थेरेपी आने से इसमें सुधार हुआ, मगर यह सर्वसुलभ नहीं है। परिणाम भी शत-प्रतिशत नहीं मिलते। तीसरी पद्धति ओवम पिकअप मशीन रही। इसके सकारात्मक परिणाम मिलने लगे, मगर इसका बाजार मूल्य 25 लाख रुपये है। ज्यादातर किसान इसे खरीद नहीं सकते हैं। ऐसे में लोग गाय-भैंसों को उनके हाल पर लावारिस छोड़ देते हैं।