{"_id":"57a0f6454f1c1b675d2b9b67","slug":"it-is-the-battle-of-the-principal-and-teacher-leader","type":"story","status":"publish","title_hn":"ये तो प्राचार्य और शिक्षक नेता की लड़ाई है!","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
ये तो प्राचार्य और शिक्षक नेता की लड़ाई है!
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
Updated Wed, 03 Aug 2016 01:10 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कामर्स के रिटायर शिक्षक डॉ. गिरीश कुमार की सर्विस बुक से छेड़छाड़ को लेेकर बरेली कालेज में हुए हंगामे के पीछे सीधे-सीधे प्राचार्य बनाम शिक्षक नेता का विवाद सामने आ रहा है। प्रशासनिक कार्रवाई से निपटाए जा सकने वाले इस मामले को पुलिस केस बना कर कालेज को एक और विवाद में डाल दिया गया। सर्विस बुक में जन्मतिथि परिवर्तन की प्रक्रिया निश्चित रूप से गलत थी लेकिन इसमें शिक्षक संघ के महामंत्री डॉ. वीपी सिंह अकेले नहीं थे। गवाह के तौर पर दूसरे शिक्षक ने भी हस्ताक्षर किए। जन्मतिथि में संशोधन करने वाले डॉ. गिरीश कुमार खुद थे लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। प्राचार्य ने सिर्फ एक शिक्षक नेता के खिलाफ मामला बना कर शिक्षक संघ को आंदोलन की राह पर ला दिया।
सर्विस बुक का यह प्रकरण नया नहीं है। डॉ. गिरीश कुमार ने सर्विस बुक में अपनी जन्मतिथि 30 दिसंबर 1955 से संशोधित करके शैक्षिक रिकार्ड के मुताबिक, 30 दिसंबर 1953 करने के लिए अक्टूबर 2015 में तत्कालीन प्राचार्य डॉ. आरबी सिंह को प्रार्थनापत्र दिया था। जाहिर है वह अपनी नौकरी दो साल कम ही कर रहे थे और इसमें उनका कोई लाभ लेने का इरादा भी नहीं था। सिर्फ एक त्रुटि ठीक कराना चाहते थे। उनसे साक्ष्य बतौर सारे शैक्षिक प्रमाणपत्रों की प्रतियां मांगी गई थीं। ये उपलब्ध कराने के बाद 14 दिसंबर 2015 को हुई मैनेजमेंट कमेटी की बैठक में संशोधन के लिए सहमति मिल गई थी। इसके बाद डॉ. सोमेश यादव ने ही उनका रिटायरमेंट 29 दिसंबर 2015 मान लिया था और बाकायदा रिटायरमेंट समारोह के लिए उनको बुलाया भी। उन्होंने 16 मई को हुई मैनेजमेंट कमेटी की बैठक में अपनी ओर से प्रस्तुत अनुपालन आख्या में गलत लिखा था कि डॉ. गिरीश की सर्विस बुक में संशोधन कर दिया गया है जबकि संशोधन तब तक हो नहीं पाया था। जब डॉ. गिरीश के पीएफ और पेंशन का मामला सर्विस बुक में संशोधन न होने से अटका गया तो उन्होंने तत्कालीन कार्यवाहक प्राचार्य डॉ. एके सक्सेना को प्रार्थनापत्र देकर संशोधन करने की अनुमति मांगी। उन्होंने उस पत्र पर पहले अनुमति लिखी लेकिन उसको काटकर फिर स्थापना प्रभारी के लिए वह पत्र मार्क कर दिया। इसके बाद जिस तरह से वीपी सिंह और एक अन्य शिक्षक को गवाह बनाकर डॉ. गिरीश ने सर्विस बुक में संशोधन किया, वह कायदे के मुताबिक नहीं है लेकिन गलत प्रक्रिया से किए गए संशोधन को प्राचार्य ने बड़ा मुद्दा बना लिया और बात वीपी सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने तक पहुंच गई।
शिक्षक संघ के नेता सवाल उठा रहे हैं कि जब सोमेश यादव ने बतौर प्राचार्य कागजों में संशोधन पहले ही मान लिया था और मैनेजमेंट कमेटी ने संशोधन की अनुमति दे दी थी तो ऐसा किया क्यों नहीं गया। हालांकि कुछ लोग इस निजी लड़ाई में डॉ. वीपी सिंह की ओर से कालेज के सारे शिक्षकों को शामिल करने को भी गलत बता रहे हैं। बहरहाल, कार्रवाई अपनी जगह है लेकिन प्राचार्य बनाम शिक्षक नेता की लड़ाई में बरेली कालेज जैसी एतिहासिक संस्था की साख प्रभावित हो रही है।
विज्ञापन
कोट...
शिक्षक नेता होने के नाते शिक्षकों की लड़ाई लड़ता आया हूं इसलिए प्राचार्य ने द्वेषभावना से इस मामले में मुझे घसीटकर कानूनी कार्रवाई की है। सर्विस बुक प्रकरण में भी मैंनेे शिक्षक के हक के लिए काम किया। आगे भी करूंगा। प्राचार्य के दबाव में बिल्कुल नहीं झुकूंगा।
-डॉ. वीपी सिंह, शिक्षक संघ महामंत्री
किसी को निजी द्वेषभावना का भ्रम हो गया है तो मैं क्या कर सकता हूं। हो सकता है उन्होंने कोई द्वेष पाल रखा हो, मैंने नहीं। कार्रवाई जांच आख्या के आधार पर और प्रबंध समिति के आदेश पर की गई है। सर्विस बुक में कटिंग और परिवर्तन का अधिकार नियोक्ता को ही है। उसकी प्रक्रिया में देरी हो जाती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी मनमानी करने लगेगा।
-डॉ. सोमेश यादव, प्राचार्य
विज्ञापन
सर्विस बुक का यह प्रकरण नया नहीं है। डॉ. गिरीश कुमार ने सर्विस बुक में अपनी जन्मतिथि 30 दिसंबर 1955 से संशोधित करके शैक्षिक रिकार्ड के मुताबिक, 30 दिसंबर 1953 करने के लिए अक्टूबर 2015 में तत्कालीन प्राचार्य डॉ. आरबी सिंह को प्रार्थनापत्र दिया था। जाहिर है वह अपनी नौकरी दो साल कम ही कर रहे थे और इसमें उनका कोई लाभ लेने का इरादा भी नहीं था। सिर्फ एक त्रुटि ठीक कराना चाहते थे। उनसे साक्ष्य बतौर सारे शैक्षिक प्रमाणपत्रों की प्रतियां मांगी गई थीं। ये उपलब्ध कराने के बाद 14 दिसंबर 2015 को हुई मैनेजमेंट कमेटी की बैठक में संशोधन के लिए सहमति मिल गई थी। इसके बाद डॉ. सोमेश यादव ने ही उनका रिटायरमेंट 29 दिसंबर 2015 मान लिया था और बाकायदा रिटायरमेंट समारोह के लिए उनको बुलाया भी। उन्होंने 16 मई को हुई मैनेजमेंट कमेटी की बैठक में अपनी ओर से प्रस्तुत अनुपालन आख्या में गलत लिखा था कि डॉ. गिरीश की सर्विस बुक में संशोधन कर दिया गया है जबकि संशोधन तब तक हो नहीं पाया था। जब डॉ. गिरीश के पीएफ और पेंशन का मामला सर्विस बुक में संशोधन न होने से अटका गया तो उन्होंने तत्कालीन कार्यवाहक प्राचार्य डॉ. एके सक्सेना को प्रार्थनापत्र देकर संशोधन करने की अनुमति मांगी। उन्होंने उस पत्र पर पहले अनुमति लिखी लेकिन उसको काटकर फिर स्थापना प्रभारी के लिए वह पत्र मार्क कर दिया। इसके बाद जिस तरह से वीपी सिंह और एक अन्य शिक्षक को गवाह बनाकर डॉ. गिरीश ने सर्विस बुक में संशोधन किया, वह कायदे के मुताबिक नहीं है लेकिन गलत प्रक्रिया से किए गए संशोधन को प्राचार्य ने बड़ा मुद्दा बना लिया और बात वीपी सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने तक पहुंच गई।
विज्ञापन
शिक्षक संघ के नेता सवाल उठा रहे हैं कि जब सोमेश यादव ने बतौर प्राचार्य कागजों में संशोधन पहले ही मान लिया था और मैनेजमेंट कमेटी ने संशोधन की अनुमति दे दी थी तो ऐसा किया क्यों नहीं गया। हालांकि कुछ लोग इस निजी लड़ाई में डॉ. वीपी सिंह की ओर से कालेज के सारे शिक्षकों को शामिल करने को भी गलत बता रहे हैं। बहरहाल, कार्रवाई अपनी जगह है लेकिन प्राचार्य बनाम शिक्षक नेता की लड़ाई में बरेली कालेज जैसी एतिहासिक संस्था की साख प्रभावित हो रही है।
विज्ञापन
कोट...
शिक्षक नेता होने के नाते शिक्षकों की लड़ाई लड़ता आया हूं इसलिए प्राचार्य ने द्वेषभावना से इस मामले में मुझे घसीटकर कानूनी कार्रवाई की है। सर्विस बुक प्रकरण में भी मैंनेे शिक्षक के हक के लिए काम किया। आगे भी करूंगा। प्राचार्य के दबाव में बिल्कुल नहीं झुकूंगा।
-डॉ. वीपी सिंह, शिक्षक संघ महामंत्री
किसी को निजी द्वेषभावना का भ्रम हो गया है तो मैं क्या कर सकता हूं। हो सकता है उन्होंने कोई द्वेष पाल रखा हो, मैंने नहीं। कार्रवाई जांच आख्या के आधार पर और प्रबंध समिति के आदेश पर की गई है। सर्विस बुक में कटिंग और परिवर्तन का अधिकार नियोक्ता को ही है। उसकी प्रक्रिया में देरी हो जाती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी मनमानी करने लगेगा।
-डॉ. सोमेश यादव, प्राचार्य