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Bareilly News: कूड़ा निस्तारण की व्यवस्था फेल, दुर्गंध झेल रहे शहरी

Sat, 21 Sep 2024 06:44 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 21 Sep 2024 06:44 AM IST
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Garbage disposal system failed, urban residents suffering foul smell
चार साल पहले लगाए गए एक करोड़ के कंपोस्टर ठप, गली-मोहल्लों में सड़ रहा कूड़ा
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बरेली। शहर की कूड़ा निस्तारण व्यवस्था फेल है। चार साल पहले लगाए गए एक करोड़ के कंपोस्टर सड़ रहे हैं। गली-मोहल्लों में कूड़ा बजबजा रहा है। शहरी दुर्गंध झेल रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो और स्वच्छ सर्वेक्षण में शहर और पिछड़ जाएगा। रैंकिंग में सुधार के लिए नए नगर आयुक्त के साथ नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
डेलापीर में पेट्रोल पंप के ठीक सामने कूड़ा ट्रांसफर स्टेशन पर गीले कूड़े से खाद बनाने के लिए वर्ष 2019-20 में कंपोस्टर लगाया गया था। इसकी क्षमता रोज एक हजार किलो कूड़े से खाद बनाने की है, लेकिन प्लांट चला ही नहीं। आसपास के क्षेत्र में रहने वाले लोग कूड़े की दुर्गंध झेल रहे हैं। डेलापीर मंडी से बड़ी मात्रा में खराब सब्जियां व फल आदि फेंके जाते हैं। कूड़ा उठने में देरी हो जाए तो सड़न से बदबू फैलती है। आसपास के लोगों ने जब-जब आवाज उठाई तो सिफ आश्वासन ही मिले। कोई ठोस पहल नहीं हुई।
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यही हाल स्वालेनगर, सीआई पार्क और बरेली काॅलेज के निकट लगाए गए प्लांट की है। राजेंद्रनगर की पार्षद शशि सक्सेना ने बताया कि वह पिछली नगर आयुक्त के सामने इस मुद्दे को उठा चुकी हैं, लेकिन कोई सुधार न हो सका। अब नए नगर आयुक्त से उम्मीद है कि वह समस्या का समाधान कराएंगे।
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नगर निगम और स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत कंपोस्टर लगाए गए थे। वोल्टेज में उतार-चढ़ाव की वजह से इनका संचालन ठप हो गया था। अब इन्हें दोबारा चलाने की तैयारी है। सात दिनों में प्लांट का संचालन शुरू हो जाएगा। - राजीव कुमार राठी, पर्यावरण अभियंता
रास्ता बदलकर टहलने निकलते हैं हम

सुबह-शाम टलहने निकलते हैं तो दुर्गंध की वजह से पेट्रोल पंप के सामने से गुजरना मुश्किल होता है। कई बार रास्ता बदल देते है। कूड़े से खाद बनाने की मशीन जब से लगी है, चली ही नहीं। कॉलोनी में रखे कूड़ेदान चार-चार दिन तक खाली नहीं होते। - दीपक कुमार, डेलापीर

दुर्गंध के बीच से होकर गुजरना मजबूरी है। सड़क के किनारे कूड़ा ट्रांसफर केंद्र है, लेकिन कूड़ा सड़़क और खाली जमीन पर पड़ा सड़ता रहता है। अधिकारी आते हैं और देखकर लौट जाते हैं। इस व्यवस्था में कब सुधार होगा, कुछ पता नहीं। - सूरज दिवाकर, डेलापीर
अमर उजाला ब्यूरो
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