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पापा कहते हैं थोड़ा इंतजार कर लो.. स्कूल से मिलेगा स्वेटर
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बरेली। योगी सरकार ने बेसिक स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों को सर्दी से बचाने को स्वेटर खरीदने के लिए अफसरों को 15 करोड़ का भारी-भरकम बजट देकर तो दे दिया लेकिन तमाम सख्त हिदायतों के बाद भी इस नेक काम को बदनीयती से नहीं बचा सकी। कमीशनखोरी का खेल कुछ ऐसा चला कि करीब आधी सर्दी गुजरने के बाद जरूरत के बमुश्किल 50 फीसदी ही स्वेटर स्कूलों तक पहुंच पाए, वह भी इतने घटिया जिनमें बच्चों को सर्दी से बचाने की कुव्वत ही नहीं है। बच्चों के साइज का भी ख्याल नहीं रखा गया। किसी को घुटने तक लटकने वाला स्वेटर दे दिया गया तो किसी की कोहनी में ही बांहें फंस गईं। अब दिसंबर गुजरने जा रहा है लेकिन फिर भी 50 फीसदी बच्चे स्वेटर आने का इंतजार कर रहे हैं।
शासन ने बजट जारी करने के साथ 31 अक्तूबर तक बच्चों को स्वेटर बांट देने का आदेश दिया था। स्वेटर की कीमत दो सौ रुपये निर्धारित की गई थी, साथ ही यह भी कहा गया था कि उपयुक्त गुणवत्ता के स्वेटर खरीदकर बच्चों को बांटें जाएं ताकि उन्हें वाकई राहत मिल पाए। अफसर पहले तो दो सौ रुपये की कीमत में उपयुक्त गुणवत्ता के स्वेटर न मिलने की बात कहते हुए टालमटोल करते रहे, कई बार चेतावनी जारी हुई तो कानपुर की एक फर्म से एग्रीमेंट किया गया। इस बीच बच्चों को स्वेटर बांटने की तारीख सर्दियां गुजरने के साथ आगे बढ़ती रहीं। इस बीच प्रमुख सचिव नवनीत सहगल और प्रभारी मंत्री श्रीकांत शर्मा ने भी स्वेटर न बांटने पर नाराजगी जताई। नवंबर के आखिर में स्वेटर बांटने शुरू किए गए लेकिन अब भी दशा यह है कि 50 फीसदी से ज्यादा बच्चों को स्वेटर नहीं मिल पाए हैं। जिन बच्चों को स्वेटर दिए गए हैं, उनकी हालत भी इतनी खराब है कि वे उनके लिए किसी काम के साबित नहीं हो रहे हैं। अमर उजाला टीम ने शहर के बेसिक स्कूलों में मासूम बच्चों की जुबानी ही उनकी समस्या जानी। ज्यादातर स्कूलों में बच्चों की शिकायत थी कि सुबह स्कूल आने में ठंड लगती है, उनके दोस्त को स्वेटर मिल गया है लेकिन उन्हें अब तक नहीं मिला।
प्राइमरी स्कूल सूफी टोला प्रथम में पता चला कि कुल 80 बच्चों में से 40 को ही स्वेटर मिले हैं। चौथी में पढ़ने वाली इरम, शफीना और पांचवी की शाजिया ने बताया कि ठंड से बचने के लिए वे पिछले साल के स्वेटर पहनकर आ रही हैं। बच्चों ने बताया कि जो स्वेटर इस बार मिले हैं, वे काफी छोटे हैं। ठंड से बचने के लिए पहनकर आते हैं तो दूसरे बच्चे मजाक बनाते हैं। स्कूल की प्रधानाध्यापक शालिनी गुप्ता ने बताया कि एक दिसंबर से स्वेटर बांटे गए हैं। 50 फीसदी बच्चों के लिए जो स्वेटर मिले, उन्हें भी वे फिट नहीं आ रहे हैं। बाकी बच्चों के स्वेटर कब तक आएंगे, यह पता नहीं है। बारादरी जूनियर हाईस्कूल नंबर एक में प्रभारी प्रधानाध्यापक सैय्यद असद अली ने बताया कि 105 में से 53 बच्चों को ही स्वेटर मिल पाए हैं। ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों के हैं जो ठिठुरते हुए स्कूल आते हैं तो बड़ा दयनीय लगता है।
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खदना प्राइमरी स्कूल में चौथी में पढ़ने वाली मंतशा और पांचवी की सुबुही ने बताया कि उनके पास स्वेटर नहीं हैं। रोज सुबह ठंड में कंपकंपाते हुए स्कूल आना पड़ता है। उनके पापा भी सरकारी स्वेटर के इंतजार में हैं। कहते हैं थोड़ा इंतजार कर लो, स्वेटर आ जाएगा। सहायक अध्यापक सलमा बेगम ने बताया कि 113 में 57 बच्चों को स्वेटर मिले हैं लेकिन किसी भी बच्चे को स्वेटर फिट नहीं आ रहा है। बेसिक स्कूल एनई रेलवेके हेडमास्टर आमिर अली खान ने बताया कि सभी 34 बच्चों को दिसंबर के शुरुआत में स्वेटर तो मिल गए थे लेकिन साइज ठीक नहीं हैं।
प्रमुख सचिव के आदेश पर भी ब्लैकलिस्ट नहीं हुई फर्म
बरेली। नवंबर के आखिर तक स्वेटर की सप्लाई न करने पर जिले के नोडल अफसर के तौर पर आए प्रमुख सचिव नवनीत सहगल फर्म को ब्लैकलिस्ट कर नया टेंडर करने का आदेश दिया था लेकिन बेसिक शिक्षा विभाग के अफसरों ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया। स्वेटर सप्लाई का काम कानपुर की शुभम हैंडलूम फर्म को दिया गया था जो दो महीने बाद भी पूरी सप्लाई नहीं कर पाई है। अफसरों पर सवाल उठ रहा है कि उन्होंने ऐसी फर्म के साथ एग्रीमेंट क्यों किया। तय तिथि 30 नवंबर तक स्वेटरों की सप्लाई न करने पर प्रमुख सचिव ने इस फर्म को ब्लैकलिस्ट करने के निर्देश दिए थे। अफसरों ने इसे भी अनदेखा कर दिया। शिक्षकों का कहना है कि बाद में जो स्वेटर आए, वे सिर्फ काफी घटिया ही नहीं हैं, अलग-अलग साइज, रंग और पांच कंपनियों के नामों के भी हैं। इसके बावजूद सीडीओ ने सिर्फ 25 फीसदी भुगतान रोका है। सूत्रों के मुताबिक इस फर्म को 26 जिलों से स्वेटर सप्लाई का टेंडर मिला है।
शुरुआत में स्वेटर कम सप्लाई हुए इसलिए कई स्कूलों में वितरण नहीं हो सका। लेकिन अब 80 फीसदी से ज्यादा स्कूलों में तीन लाख बच्चों तक स्वेटर पहुंच गया है। शेष बच्चों को भी स्कूल खुलते ही दो दिन में स्वेटर उपलब्ध करा दिए जाएंगे। हमें सिर्फ वितरण की जिम्मेदारी सौंपी गई है। फर्म से सप्लाई हो रहे स्वेटर घटिया हैं या नहीं, इसकी जांच और कार्रवाई का निर्णय डीएम करेंगे। - देवेश राय, नगर खंड शिक्षाधिकारी
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शासन ने बजट जारी करने के साथ 31 अक्तूबर तक बच्चों को स्वेटर बांट देने का आदेश दिया था। स्वेटर की कीमत दो सौ रुपये निर्धारित की गई थी, साथ ही यह भी कहा गया था कि उपयुक्त गुणवत्ता के स्वेटर खरीदकर बच्चों को बांटें जाएं ताकि उन्हें वाकई राहत मिल पाए। अफसर पहले तो दो सौ रुपये की कीमत में उपयुक्त गुणवत्ता के स्वेटर न मिलने की बात कहते हुए टालमटोल करते रहे, कई बार चेतावनी जारी हुई तो कानपुर की एक फर्म से एग्रीमेंट किया गया। इस बीच बच्चों को स्वेटर बांटने की तारीख सर्दियां गुजरने के साथ आगे बढ़ती रहीं। इस बीच प्रमुख सचिव नवनीत सहगल और प्रभारी मंत्री श्रीकांत शर्मा ने भी स्वेटर न बांटने पर नाराजगी जताई। नवंबर के आखिर में स्वेटर बांटने शुरू किए गए लेकिन अब भी दशा यह है कि 50 फीसदी से ज्यादा बच्चों को स्वेटर नहीं मिल पाए हैं। जिन बच्चों को स्वेटर दिए गए हैं, उनकी हालत भी इतनी खराब है कि वे उनके लिए किसी काम के साबित नहीं हो रहे हैं। अमर उजाला टीम ने शहर के बेसिक स्कूलों में मासूम बच्चों की जुबानी ही उनकी समस्या जानी। ज्यादातर स्कूलों में बच्चों की शिकायत थी कि सुबह स्कूल आने में ठंड लगती है, उनके दोस्त को स्वेटर मिल गया है लेकिन उन्हें अब तक नहीं मिला।
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प्राइमरी स्कूल सूफी टोला प्रथम में पता चला कि कुल 80 बच्चों में से 40 को ही स्वेटर मिले हैं। चौथी में पढ़ने वाली इरम, शफीना और पांचवी की शाजिया ने बताया कि ठंड से बचने के लिए वे पिछले साल के स्वेटर पहनकर आ रही हैं। बच्चों ने बताया कि जो स्वेटर इस बार मिले हैं, वे काफी छोटे हैं। ठंड से बचने के लिए पहनकर आते हैं तो दूसरे बच्चे मजाक बनाते हैं। स्कूल की प्रधानाध्यापक शालिनी गुप्ता ने बताया कि एक दिसंबर से स्वेटर बांटे गए हैं। 50 फीसदी बच्चों के लिए जो स्वेटर मिले, उन्हें भी वे फिट नहीं आ रहे हैं। बाकी बच्चों के स्वेटर कब तक आएंगे, यह पता नहीं है। बारादरी जूनियर हाईस्कूल नंबर एक में प्रभारी प्रधानाध्यापक सैय्यद असद अली ने बताया कि 105 में से 53 बच्चों को ही स्वेटर मिल पाए हैं। ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों के हैं जो ठिठुरते हुए स्कूल आते हैं तो बड़ा दयनीय लगता है।
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खदना प्राइमरी स्कूल में चौथी में पढ़ने वाली मंतशा और पांचवी की सुबुही ने बताया कि उनके पास स्वेटर नहीं हैं। रोज सुबह ठंड में कंपकंपाते हुए स्कूल आना पड़ता है। उनके पापा भी सरकारी स्वेटर के इंतजार में हैं। कहते हैं थोड़ा इंतजार कर लो, स्वेटर आ जाएगा। सहायक अध्यापक सलमा बेगम ने बताया कि 113 में 57 बच्चों को स्वेटर मिले हैं लेकिन किसी भी बच्चे को स्वेटर फिट नहीं आ रहा है। बेसिक स्कूल एनई रेलवेके हेडमास्टर आमिर अली खान ने बताया कि सभी 34 बच्चों को दिसंबर के शुरुआत में स्वेटर तो मिल गए थे लेकिन साइज ठीक नहीं हैं।
प्रमुख सचिव के आदेश पर भी ब्लैकलिस्ट नहीं हुई फर्म
बरेली। नवंबर के आखिर तक स्वेटर की सप्लाई न करने पर जिले के नोडल अफसर के तौर पर आए प्रमुख सचिव नवनीत सहगल फर्म को ब्लैकलिस्ट कर नया टेंडर करने का आदेश दिया था लेकिन बेसिक शिक्षा विभाग के अफसरों ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया। स्वेटर सप्लाई का काम कानपुर की शुभम हैंडलूम फर्म को दिया गया था जो दो महीने बाद भी पूरी सप्लाई नहीं कर पाई है। अफसरों पर सवाल उठ रहा है कि उन्होंने ऐसी फर्म के साथ एग्रीमेंट क्यों किया। तय तिथि 30 नवंबर तक स्वेटरों की सप्लाई न करने पर प्रमुख सचिव ने इस फर्म को ब्लैकलिस्ट करने के निर्देश दिए थे। अफसरों ने इसे भी अनदेखा कर दिया। शिक्षकों का कहना है कि बाद में जो स्वेटर आए, वे सिर्फ काफी घटिया ही नहीं हैं, अलग-अलग साइज, रंग और पांच कंपनियों के नामों के भी हैं। इसके बावजूद सीडीओ ने सिर्फ 25 फीसदी भुगतान रोका है। सूत्रों के मुताबिक इस फर्म को 26 जिलों से स्वेटर सप्लाई का टेंडर मिला है।
शुरुआत में स्वेटर कम सप्लाई हुए इसलिए कई स्कूलों में वितरण नहीं हो सका। लेकिन अब 80 फीसदी से ज्यादा स्कूलों में तीन लाख बच्चों तक स्वेटर पहुंच गया है। शेष बच्चों को भी स्कूल खुलते ही दो दिन में स्वेटर उपलब्ध करा दिए जाएंगे। हमें सिर्फ वितरण की जिम्मेदारी सौंपी गई है। फर्म से सप्लाई हो रहे स्वेटर घटिया हैं या नहीं, इसकी जांच और कार्रवाई का निर्णय डीएम करेंगे। - देवेश राय, नगर खंड शिक्षाधिकारी